नारी शक्ति (Women Power)

या देवी सर्व भुतेषु स्त्री रुपेण संस्थिता
नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमस्तस्यै नमो नमः॥

 

नारी शक्ति रुप में स्त्री शक्ति
नारी शक्ति आधार शक्ति 

 

धार्मिक संदर्भ में, हिन्दुओं ने स्त्रियों को देवत्व के स्तर तक उन्नत किया है। भारत के बारे में संसार की एक भूल है कि यह पुरुष प्रधान समाज है तथा धर्म पर पुरुषों का वर्चस्व है तथा तथा सच्चाई यह है कि वास्तव में ऐसा नहीं है। 
यह वह धर्म है जो स्त्री की ताकत और बल को सूचित करता है। ‘शक्ति’ का तात्पर्य ‘बल’ और ‘ताकत’ पुरुष में समस्त शक्तियों का कारण स्त्रियां है। त्रिमूर्ति (ब्रह्मा, विष्णु, शिव) अपने नारी सहायक अंग के बिना शक्ति विहीन है। 
हे स्त्री शक्ति! तुम्हारे द्वारा ही यह सार्वभौम उत्पन्न हुआ है। तुम्हारे द्वारा इस सृष्टि की रचना हुई है। तुम्हारे द्वारा ही रक्षित है। अंत में तुम्हारे द्वारा ही यह विनष्ट होती है। हे नारी शक्ति!  आप परम विदुषी हो तथा समान रुप से समझदार तथा भाव पुंज हो

 


वेदों में नारी को समाज में ऊंचा स्थान दिया गया है । उसे जननी कहा गया है, जननी उसे कहते हैं – जो निर्माण करे। जननी संतान को पैदा ही नहीं करती, उसका निर्माण भी करती है। जननी ही संतान को सुसंतान बना कर उन्नत मार्ग पर अग्रसर करती है। जननी संतान को ऊंचे आसन तक पहुंचाने के लिए तप करती है, सुख सुविधाओं को त्याग, भूखे रह कर भी उसके सुखों में कमीं नहीं आने देती, इस कारण ही वह जननी है ।

 

इस कारण ही विश्‍व में नारी का सम्मान है किन्तु मध्य युग में नारी सम्मान का ह्रास हुआ। जिसका कारण गुलामी तथा वेद विद्या का अभाव ही कहा जा सकता है। वेद में नारी को जगत् की जननी तथा त्याग की मूर्ति कहते हुए उसे उच्च आसन देने का आदेश दिया है। नारी को प्रशस्ति पूर्ण स्थान देने के लिए वेद में अनेक स्थानों पर नारी का गुणगान किया गया है।
ऋग्वेद (3.53.4) में कहा गया है कि – गृहिणी अर्थात नारी ही गृह है, घर है। नारी के बिना गृह की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

 

जायेदसत्न मघवन त्सेदु योनी: 
तदित तवा युक्ता हरयो वहन्तु । 
यदा कदा च सुनवाय सोमम 
अग्निष्ट्वा दूतो धन्वात्यच्छ ॥
– ऋग्वेद 3.53.4

 

शब्दार्थ : – हे ऐश्‍वर्य युक्त इंद्र! पत्नी ही घर है और वह ही संतान उत्पादन का आधार है, उसी घर में तेरा रथ घोड़े तुझ को लेकर जावें और वहीं आनन्द अमृत सोमरस प्राप्त होगा, वहीं अग्नि देव भी तुम्हारे पास आएंगे।
यह मंत्र हमें बताता है कि – गृहस्थ का आधार क्या है? उसका मूल क्या है? तथा उसके मूल में क्या पदार्थ डालने की आवश्यकता है? इन बातों का उत्तर देते हुए मन्त्र कहता है कि – पत्नी ही घर का आधार है।

 

संस्कृत में भी कहा है कि –

 

न गृहं गृहमित्याहू:, गृहिणी गृहमुच्याते  

 

अर्थात घर को घर नहीं कहते अपितु गृहिणी को ही घर कहते हैं। कहा भी है कि गृहिणी के बिना घर में भूत का डेरा होता है।

 

गृह में क्या कार्य होता है? गृह में मुख्य कार्य होता है गृह की सुरक्षा, गृह की व्यवस्था, गृह का संचालन, गृह का निरीक्षण तथा समुन्नयन। यह सब कार्य गृहपत्नी अथवा नारी ही करती/कराती है।

 

पुरुष तो गृह व्यवस्था के साधन अर्थात धनोपार्जन के लिए प्राय अधिकांश समय गृह से बाहर ही रहता है । इस कारण इन सब कार्यों को वह नहीं कर सकता। इन कार्यों को करने के लिए अधिक समय वहां उपस्थित होना आवश्यक होता है, किन्तु पुरुष के लिए ऐसा संभव न हो पाने के कारण यह सब व्यवस्था पत्नी ही देखती है।

 

यदि गृहिणी न हो तो गृह की – यह सब व्यवस्था छिन-भिन्न हो जाती है । मंत्र न केवल पत्नी के कर्त्तव्यों पर ही प्रकाशः डालता है अपितु उसके महत्व का भी वर्णन करता है। यदि हम गृहस्थ को एक वृक्ष मानें तो पत्नी उस वृक्ष का मूल अर्थात जड़ होती है। जब तक मूल नहीं है, तब तक वृक्ष का अस्तित्व ही नहीं होता। मूल अर्थात् जड़ ही समग्र वृक्ष का भार वहन करता है। इस आधार पर हम कह सकते हैं कि नारी गृह का मूल आधार होती है। उसके कन्धों पर ही पूरा परिवार खड़ा होता है। नारी के बिना यह स्वप्न साकार नहीं हो सकता। वृक्ष की जड़ तो केवल वृक्ष को खड़ा रखने तथा उसे भोजन पहुंचाने का कार्य करती है किन्तु नारी न केवल जड़ का अर्थात परिवार का आधार अथवा परिवार के खड़े होने की परिकल्पना को साकार करने वाली होती है अपितु संतानोत्पति का कार्य अर्थात बीज व भूमि का कार्य भी करती है।

 

नारी ही गृह की समृद्धि सरसता और वृद्धि का आधार है। नारी के बिना संतानोत्पति संभव नहीं। नारी के बिना परिवार की समृद्धि भी संभव नहीं। अत: नारी परिवार की अच्छी समृद्धि का कारण होती है। एक उत्तम नारी ही परिवार में सुखों की वर्षा करती है। तभी तो इसे योनि अथवा मूल कहा गया है। यह परिवार का मूल कारण होती है। परिवार के सुखों की वृद्धि का चिंतन नारी का ही होता है। नारी के बिना किसी प्रकार के सुख व समृद्धि की कल्पना ही नहीं की जा सकती ।

 

ससिक्ता कहां से आती है? 

 

ऊपर कहा गया है कि – नारी गृह की ससिक्ता होती है। इसका उत्तर देते हुए मंत्र है कि यह सोम से आती है, ससिक्ता  के लिए सौम्य गुणों का होना आवश्यक है सौम्य गुण ही इस का मूल आधार है। यह सौम्यगुण ही परिवार की श्रीवृद्धि करते हैं, क्योंकि यह कार्य नारी करती है, इसलिए नारी का सौम्यगुणों से युक्त होना आवश्यक है ।

 

इंद्र तथा जीवात्मा की उपस्थिति भी सौम्यगुण के साथ ही होती है। वहीं आत्मिक बल होता है तथा जहां इंद्र वा जीवात्मा तथा आत्मिक बल हो वहां श्रीवृद्धि भी निरंतर होती रहती है।

 

अत: इस मंत्र के आधार पर संक्षेप में कह सकते हैं कि – नारी ही गृह का आधार है, गृह अथवा परिवार का मूल भी नारी ही है, सौम्य गुण इस मूल को पुष्ट करते हैं। यह पुष्टि का ही परिणाम होता है कि आत्मबल, सात्विकता, पवित्रता, सुशीलता, तथा विनय आदि गुणों का आगमन होता है।

 

अत: परिवार के निर्माण व पुष्टि के लिए सौम्यता का होना आवश्यक है और यह सौम्यता नारी में विपुल मात्रा में होने के कारण ही नारी को ही गृहिणी और गृह अर्थात घर कहा गया है। नारी के बिना घर की कल्पना भी संभव नहीं, इसलिए परिवार में नारी का सम्मान हो ताकि वह खुश रहते हुए सौम्यगुणों को बढ़ाती रहे।

 

आश्रम अवस्था

 

 गृहस्थाश्रम एक ज्येष्ठ ही नहीं सर्वश्रेष्ठ आश्रम है। इसमें उत्तरदायित्वों का निर्वाह अत्यधिक गंभीरता एवं कुशलता के साथ करना पड़ता है। इसमें सृजन का आनन्द तो है ही पर कर्म का आनन्द अनुभूत कर अधिक सुखी रहा जा सकता है।

 

सभी आश्रमों में गृहस्थ आश्रम सबसे बड़ा और ज्येष्ठ आश्रम है। तीनों आश्रमवासी – ब्रह्मचारी , वानप्रस्थी और संन्यासी सभी गृहस्थों से उपकृत होते हैं। इन्हीं गृहस्थियों के द्वारा पूजा -दान आदि धार्मिक कृत्य संपन्न होते हैं।

 

गृहस्थेनैव धार्यन्ते तस्मात् ज्येष्ठाश्रमो गृही। 

 

जैसे वायु का आश्रय पाकर सब प्राणी जीते हैं, वैसे ही सब आश्रम गृहस्थाश्रम का आश्रय लिए रहते हैं।

 

 गृहस्थ  वही  है, जो अपने परिवार के सभी नाते-रिश्तों का  पालन-पोषण सही ढंग से करता है, परिवार का सहायक है। गृहस्थ जीवन की सार्थकता प्रेम पूर्ण व्यवहार में है और अनुशासन पूर्ण कर्म में है।

 

तपस्वी के जीवन से अति श्रेष्ठ जीवन गृहस्थ जीवन है जो धर्म पथ पर चलता है और अन्यों को भी धर्म पथ से हटने नहीं देता।

 

गृहस्थ धर्म जीवन का एक पुनीत, आवश्यक एवं उपयोगी अनुष्ठान है। नारी और पुरुष के एकत्रित होने से दो अपूर्ण जीवन संपूर्ण जीवन का रूप धारण करते हैं। पक्षी के दो पंखों की तरह, रथ के दो पहियों की तरह स्त्री और पुरुष का मिलन एक दृढ़ता एवं स्थिरता की सृष्टि करता है।

 

शारीरिक और मानसिक तत्त्व के आचार्य जानते हैं कि – कुछ तत्त्वों की पुरुष में अधिकता और नारी में न्यूनता होती है। इसी प्रकार कुछ तत्त्व नारी में अधिक और पुरुष में कम होते हैं। इस अभाव की पूर्ति दोनों के सहचरत्व से होती है। स्त्री-पुरुष में एक-दूसरे के प्रति जो असाधारण आकर्षण होता है, उसका कारण वही क्षतिपूर्ति है। मन की सूक्ष्म चेतना अपनी क्षतिपूर्ति के उपर्युक्त साधनों को प्राप्त करने के लिए विचलित होती है, तब उसे संयोग की अभिलाषा कहा जाता है।

 

प्राचीन शक्ति स्त्रोत में यह कहा गया है – ‘‘स्त्रयै देवः स्त्रयै प्राणः’’ नारियां देव हैं, नारियां स्वयं जीवन है।

 

भगवान शिव शक्ति के संग जुड़े हुए एक ही शरीर में प्रकट होते हैं। पति या पत्नी के रुप में वह दायीं तरफ तथा उनकी पत्नी बांयी तरफ है। स्पष्ट रुप से वे अर्द्धनारीश्‍वर के रुप में जाने जाते हैं, आधे पुरुष एवं अर्द्धनारी के रुप में भगवान का अवतार। उनमें से प्रत्येक भगवान ब्रह्मा सृष्टिकर्त्ता, विष्णु रक्षक तथा शिव विनाशक के रुप में हिन्दुओं के सब देवताओं के मंदिर में शक्ति के साथ विद्यमान है। वह उनका नारी के रुप में दुगना तथा शक्ति के रुप में स्पष्ट है।

 

ॠग्वेद भी नारी के उच्च गौरव का आधार प्रदान करता है; ‘यत्र नार्यस्तु पूजयन्ते रमन्ते तत्र देवता’ जहां नारियों की पूजा हेाती है, वहां देवता निवास करते हैं।

 

वास्तव में इस संसार में शिव और शक्ति के मिलन से ही पूर्णता प्राप्त होती है, संसार में वृद्धि होती है। उसी प्रकार पुरुष का सौभाग्य श्रेष्ठ सहयोगी स्त्री है और स्त्री का सौभाग्य श्रेष्ठ सहयोगी पुुरुष है। पुरुष एवं स्त्री विवाह के माध्यम से एक-दूसरे से युक्त होते हैं। उनका युक्त होना, आपस में सहयोग करना, एक-दूसरे के साथ अपना भाग्य जोड़ना है। स्त्री के बिना पुरुष का भाग्य अधूरा है क्योंकि चाहे कितनी भी आर्थिक उन्नति हो जाये, यदि घर में शांति नहीं है तो वह सौभाग्यकारी स्थिति नहीं है। इसी प्रकार यदि स्त्री के जीवन में पति का प्रेम नहीं है, तो उसके लिये जीवन में सौभाग्यकारी स्थिति नहीं है।

 

सद्गुरुदेव सदैव कहा करते थे कि – गृहस्थ जीवन में स्त्री-पुरुष को एक-दूसरे की भावनाओं को समझते हुए सदैव मित्र रूप में रहना चाहिए और एक-दूसरे के लिये त्याग और सहयोग करने की भावना होनी चाहिए।

 

इसलिए प्रत्येक पुरुष और स्त्री को सौभाग्य सिद्धि दिवसों में जिन्हें अमृत रस दिवस भी कहा जाता है। चन्द्र सौभाग्य साधना अवश्य सम्पन्न करनी चाहिये।

Yaa Devi Sarv Bhuteshu Stree Roopen Sansthitaa

Namastasyei Namastasyei Namastasyei Namo NamaH ||

 

Feminine Power as Woman Power

Woman Power – Basic Power

 

The Hindus have, in the religious context, elevated the status of women to the Divine level. It is a mistaken belief that India is a male-dominated society, while the real truth points otherwise.

The religion itself signifies the strength and power of the women. The word “Force” is derived from the word “Strength” and similarly, the basis of the “Power” of the men is their woman-folk. The Trimurti (Brahma, Vishnu and Shiva) are completely powerless in absence of Their female assistants.

Hail! Woman power! This entire universe is borne out from you. You produced this creation. You are its protector. You only destroy it in the end.

Hail! Woman power! You are the supreme scholar and are the wisest and the smartest.


The holy Vedas have granted very high status to the women in the society. They have termed her as the mother, mother is the one – who creates. The mother does not only produce offspring, she also grooms and develops them. The mother motivates the child on the growth path by nurturing him. The mother sacrifices a lot to progress the child on this path, she gives him all the comforts while staying hungry herself, without caring for any comfort or pleasure for herself.

The entire world respects the woman for these reasons, but her position deteriorated in the middle ages due to slavery and lack of Vedic wisdom. The Vedas have enjoined to grant her the highest pedestal by terming her as the mother of the world and the model for supreme sacrifice. The Vedas have lauded woman at multiple places to grant the highest honour to woman.

Rig Veda (3.53.4) states that – the woman as housewife is the real home. We cannot imagine a home without any woman.

 

Jaayeidsatna Madhavana Tsedu YoniH

Tadita Tavaa Yuktaa Harayo Vahantu |

Yadaa Kadaa Cha Sunavaaye Somama

Agnishtvaa Duto Dhanvaatyaccha ||

– Rigveda 3.53.4

Meaning: – Hey blessed Indra! The wife constitutes the real home and she is the basis of child offspring. Your chariot horses should take you to that home and you will obtain the joyous nectar there. The divine Fire-God, Agni will also visit you there.

This mantra explains – What is the basic foundation of domestic harmony? what is its basic origin, and what should we pour into this root? This Mantra states that – The woman is the basis of the home.

 

A saying in Sanskrit states that –

Na Griham GrihamityaahuH, Grihini Grihamuchyaate

 

i.e. the home is not made of brick-mortar, rather the wife makes the household. It is also said that the spirits haunt the house in absence of a wife.

What is the primary function of the home? The primary function of the home is security, organization, management, inspection and progress. Only the wife controls and looks after these aspects.

The husband generally stays outside the home to earn money to live on. So, he cannot perform these tasks. One needs to stay there for a dedicated time to do these operations, and the wife takes care of these in absence of the husband.

The entire organization of the home withers away in absence of the wife. The Mantra does not only spells the wife’s responsibilities, rather it also describes its importance. If we consider a domestic-life as a tree, then the wife is the basic root of that tree. The tree cannot exist in absence of the root. The root bears the entire weight of the tree. Therefore, we can easily state that the woman is the basic foundation of the home. She bears the entire weight of the household on her shoulders. This dream cannot become a reality without the woman. The roots of the tree only function to bear it and provide food, while the wife not only bears all responsibilities for the family, rather she is also responsible for the child production and rearing, i.e. the ground and the seeds.

The woman is the basis of the prosperity and growth of the family. Reproduction is not possible without woman. The prosperity of the family is also not possible without the woman. Therefore the woman is the basic foundation for the prosperity of the family. Only a noble lady showers pleasures in the family. That is why she is termed as the “Yoni” or origin. She is the root foundation of the family. Only the lady thinks about enhancement of pleasures in the family. We cannot imagine any pleasure or prosperity in absence of the woman.

 

Where does Virtue (Sasiktaa) come from?

As stated above – the woman is the basis of virtues within the family. The Mantra states that this comes from the divine nectar, i.e. moral ethical qualities are essential to develop noble values. These noble virtues are its foundation. These noble values enhance the Shree wealth of the family. It is essential for the woman to have noble virtues, since she performs these functions.

The Indra and the individual are also present through noble virtues. The presence of the spiritual force, i.e the presence of the spiritual force within the individual and Indra, causes continuous enhancement of the Shree wealth.

Therefore, we can summarise on the basis of this Mantra that – the woman is the core basis of the home, the woman is the root of the house or the family, the noble virtues also support these foundations. The consequence of these growths lead to enhancement of noble qualities like spiritual strength, piety, purity, gentleness and modesty etc.

Hence these noble values are essential for the growth and prosperity of the family, and the presence of high quantity of these noble values in the woman motivate us to term her as the “Grihani” of the “Grih”, i.e. the chief of the house. It is impossible to even imagine a household without the woman, so we should continue to respect the woman to enhance these noble values in the home.

 

The Ashram organization

The Grihasthaashram is not only the biggest ashram, rather it is the best Ashram of life. One needs to discharge the responsibilities very carefully, seriously and efficiently. It has the joy of the creation, and one can become more happy by experiencing the joy of Karma-actions.

The Grihasth Ashram is the biggest and the best ashram among the four ashrams of life. The three other Ashramvasis – Brahmaachari, Vaanprasthi and Sanyaasi are dependent on the Grihasthaashram. These Grihasths perform the ritual worship, charitable deeds etc.

 

Grihastheneva Dhaaryante Tasmaat Jyeshthaashramo Grahi |

 

All living beings survive due to air, similarly all ashrams live due to Grihasthaashram.

 

The Grihastha (Householder) properly raises and nurtures his entire family-relatives, and assists his family. The relevance of the domestic life lies within love, and disciplined Karma-actions.

The Grihasth life is better than the life of an ascetic, since he not only  leads a moral life himself, he also encourages others to lead a life full of moral and noble values.

The Grihastha stage is an important, sacred and essential part of life. Two incomplete lives of man and woman merge together to form a complete life. The merger of the man and the woman, like that of the two wings of the birds or two wheels of the chariot, signifies determination and stability.

The learned scholars of the physical and mental elements know that – some attributes are higher in man and lesser in woman. Similarly, some attributes are more in woman and lesser in man. This deficiency gets removed by the merger of the two. Fulfilment of these deficiencies drive the attraction between the two sexes. The subtle consciousness of the mind becomes active to complete its deficiencies, and this is termed as the union.

The ancient Shakti Strotas state that – “Strayei DevaH Strayei PranaH” i.e the women are Divine, the women are life itself.

Lord Shiva appears in one physical form merged with Shakti. He appears on the right side, and His wife on the left. He is clearly known as Ardhanaarishwar, i.e. an incarnation avataar of God in half male and half female form. All Gods of the Hindus, Brahma the creator, Vishnu the preserver and Shiva the destroyer exist in all Hindu temples along with Mother Shakti. This is the clear form which is double in female and completely clear in Shakti form.

Rigveda also accords high distinction to woman : “Yatra Naaryastu Poojyante Ramante Tatra Devataa”, i.e. Gods reside only where women are worshipped.

In fact, in this world, perfection comes only from the union of Shiva and Shakti, this is source of development of the universe. The best fortune of a man is a perfect woman partner, and similarly the best fortune of a woman is a perfect man partner. The man and the woman unite through the marriage. Their union, assisting each other, is the joint merger of their fortunes. The fate of the man is incomplete in absence of wife, even if he earns enormous wealth, the absence of peace in house is not a fortunate situation. Similarly absence of husband’s love, causes a unfortunate situation for the woman.

SadGurudev used to say that – Both man and woman should stay as best friends with complete understanding of each other’s feelings and both should have the spirit of sacrifice and cooperation towards each other.

Therefore every man and woman should perform Chandra Soubhagya Sadhana during the Soubhagya Siddhi Diwas days, which are also called as Amrit Rasa Diwas.

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