कर्म और फल सिद्धान्त (The Principle of Karma and its Results)

क्या कर्म का फल प्राप्त होता है?
कर्म और फल सिद्धान्त
वर्तमान कर्म, क्रियमाण कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म
कर्म में निश्‍चित् सात है
मनुष्य का जिन सब शक्तियों के साथ सम्बन्ध आता है, उनमें से कर्म की शक्ति ही सबसे प्रबल है।
सब कर्म द्वारा ही नियमित होता है, यह सनातन नियम है।

निम्नलिखित प्रश्‍न प्रत्येक मनुष्य के मन में सदैव आते ही रहते हैं।
1. क्या मुझे कर्म करना आवश्यक है?
2. मैं किस प्रकार का कर्म करूं?
3. मेरे कर्मों का प्रवाह किस दिशा में हो?
4. मेरे कर्मों का फल कब और किस प्रकार प्राप्त होता है?

 

इन चार प्रश्‍नों पर पूरी सृष्टि टिकी हुई है और ये प्रश्‍न बार-बार उभरते ही हैं। यह तो सत्य है कि कर्म निश्‍चित रूप से करना ही पड़ता है। आपके न चाहते हुए भी कर्म अपनी गति से आपसे कर्म करवा ही लेता है। इस संसार में निष्क्रिय तो कोई रह ही नहीं सकता है। कोई क्षण ऐसा नहीं जाता है जिस क्षण कर्म नहीं हो रहा हो।

 

इतिहास के एक पृष्ठ का अवलोकन करते हैं, एक बहुत बड़ी सभा चल रही थी। देश-विदेश से बड़े-बड़े विद्वान आये हुए थे। सभी अपने-अपने क्षेत्रों में, अपने-अपने देश में मूर्धन्य विद्वान गिने जाते थे। प्रत्येक विद्वान के हजारों-हजारों अनुयायी, लाखों-लाखों प्रशंसक थे। प्रत्येक विद्वान ने अपने-अपने धर्म शास्त्रों का विशद् अध्ययन किया हुआ था। प्रत्येक विद्वान सभा में मंच पर जाकर अपना अभिभाषण करता और सैकड़ों की संख्या में श्रोता उनका अभिभाषण सुनकर जय-जयकार करते। प्रत्येक विद्वान अपने पांडित्य पर, अपने अनुसंधान पर, अपनी विद्वता पर गर्व से भरा हुआ था और यह गर्व उनके चेहरों पर छलक रहा था। सब कोई अपनी बात को जोरदार ढंग से प्रस्तुत कर रहे थे। सब अपने धर्म, अपने धर्म ग्रंथ, अपनी विद्वता के बारे में प्रदर्शन कर रहे थे। सबको ऐसा लग रहा था कि विश्‍व में अपने आपको सर्वश्रेष्ठ साबित करने का यह सबसे बड़ा अवसर है। सबको बोलने के लिये निश्‍चित समय दिया गया था।

 

इन सबके बीच में सामान्य गेरूआ वस्त्र पहने, पगड़ी पहने हुए एक व्यक्ति चुपचाप, शांत बैठा हुआ था। अपने ही विचारों में खोया हुआ था। ऐसा लग रहा था कि वह किसी गहन चिन्तन में है। कभी-कभी उसके होठों से एक स्मित हास्य उभरता था। जैसे वह अपने गुरु के बारे में, अपने विचारों के बारे में, अपने लक्ष्य के बारे में सोच-सोच कर प्रसन्न हो रहा था।

 

एकाएक उस युवक का नाम मंच से पुकारा गया, युवक शांत भाव से उठा। अपनी धीर-गंभीर चाल से मंच तक पहुंचा। चारों और देखा चेहरे पर न कोई उत्सुकता, न कोई आवेश, न कोई चिन्ता, न कोई गर्व, एकदम शांत भाव। उसने मंच पर पहुंचकर चारों ओर देखा सभा अध्यक्ष को प्रणाम किया और श्रोताओं की ओर उन्मुख होकर उन्हें कहा – ‘मेरे भाईयों और बहनों’ और अपनी बात प्रारम्भ कर दी। उसके पास में न कोई कागज, न पत्र, न कोई नोट्स बनाये हुए थे। केवल और केवल श्रोताओं की ओर देखते हुए उसने अपना अभिभाषण प्रारम्भ कर दिया, समय था केवल 10 मिनट बोलने के लिये और जब एक बार अभिभाषण प्रारम्भ हुआ तो ऐसा लगा मानों समय रुक गया है, सारे श्रोता मधुर ध्वनि, ओजस्वी ध्वनि सुनते हुए खो गये। यहां तक की अध्यक्ष के हाथ में समय की घंटी थी, उसे बजाना भी भूल गये और डेढ़ घन्टे तक ज्ञान की अजस्र धारा बहती गई। जब अभिभाषण समाप्त हुआ तो मंच पर आसीन गणमान्य व्यक्तियों के साथ पूरा पंडाल, सभागार खड़ा हो गया और दस मिनट तक तालियों की गड़-गड़ाहट के साथ उनके भाषण का पुरजोर स्वागत किया गया। यह सम्मेलन था, विश्‍व धर्म संसद का और दिन था 11 सितम्बर 1893…

 

यह युवा था ‘विवेकानन्द’ और विवेकानन्द ने कहा कि – ‘मेरी शक्ति, आत्मबोध शक्ति है। सारे ईश्‍वर के रूप ब्रह्माण्ड में व्याप्त हैं। वही ईश्‍वर का साकार-निराकार स्वरूप मेरी आत्मा में समाहित है। उसी आत्म भाव से, आत्म बोध से मैंने अपनी छोटी सी बात कही है।’

 

यही शक्ति जो आत्म बोध कहलाती है, सबसे बड़ी शक्ति है, सबसे बड़ा प्रवाह है, यही हमें कर्म के लिये प्रेरित करती है। यही हमें इस जगत में चलाती है। यही हमारा मानस निर्धारित करती है। भारतीय दर्शन में यह स्पष्ट है कि मनुष्य प्रकृति का एक ऐसा सशक्त भाग है जिसमें अपरिमित शक्ति है। मनुष्य ही ब्रह्माण्ड का सबसे गतिशील और परिवर्तनशील तत्व है। धर्म क्या है? अपने कर्म द्वारा आत्मा से अमरत्व प्राप्त करना और अपने कर्मों का स्वयं निर्धारण करना। भारतीय संस्कृति में यह स्पष्ट विवेचन है कि वह परम शक्ति जिसे ब्रह्म कहते हैं, वही ब्रह्म शक्ति प्रत्येक जीव में स्थित है। इस जीव का, मनुष्य का, जन्म-मरण का चक्र निरन्तर और निरन्तर चलता रहता है और यह तब तक चलता रहता है जब तक वह पूर्ण मोक्ष प्राप्त नहीं कर लेता है।

 

प्रत्येक मनुष्य अपने कर्म चक्र को चार अवस्थाओं में जीता है।
1. वर्तमान कर्म,  2. क्रियमाण कर्म,  3. संचित कर्म  और 4. प्रारब्ध कर्म
भारतीय संस्कृति, दर्शन और धर्म का मूल भाव यही है कि इन चारों कर्म चक्र की पूर्ति करते हुए, इन चारों कर्मों को भोगते हुए मनुष्य को अपने मोक्ष की ओर जाना है।

 

आज क्या हो रहा है?
विकास और उन्नति के लिये सम्पूर्ण विश्‍व क्रियाशील है। हर व्यक्ति अपने आपको श्रेष्ठ साबित करने की दिशा में एक होड़ में दौड़ रहा है। उसने अपने ज्ञान, अपने साधन, अपने परिवार, अपने समाज और अपनी सभ्यता के नाम पर मनुष्य-मनुष्य में एक प्रतियोगिता खड़ी कर दी है। हर व्यक्ति अपने आपको ऊंचा सिद्ध करने की चेष्टा में दूसरों को छोटा साबित करने में लग गया है। उसका ऐसा विचार बन गया है कि उसके बड़े होने के लिये सामने वाले को छोटा सिद्ध करना आवश्यक हो गया है। मनुष्य के चारों ओर अनन्त कामनाओं के जाल बढ़ते ही चले जा रहे हैं और वह इस जाल में फंसता ही चला जा रहा है। मनुष्य यह मान बैठा है कि कामनाओं की आपूर्ति ही सबसे श्रेष्ठ है। उसके जीवन से शांति दूर चली गई है।

 

वर्तमान युग में मनुष्य ने यह भ्रम पाल लिया है कि धन, बल, ऐश्‍वर्य और भौतिक श्रेष्ठता के आयाम से पूर्ण होकर ही वह श्रेष्ठ बन गया है। इस क्रिया में, इस दौड़ में शामिल होकर उसका स्वयं का अस्तित्व एक खिलौने जैसा हो गया है, जिसमें चाबी भरो तो वह भागने लगता है। अब इस तरह निरन्तर भाग कर विकास होगा या पतन होगा यह वह स्वयं नहीं जानता है क्योंकि वह जीवन में सामान्य आदर्शों से भी दूर हो गया है।

 

आत्मबोध जगाइये –
इसका एक मात्र कारण है, आत्मबोध का अभाव। आत्मबोध के अभाव में कामनाएं और अधिक प्रबल होने लगती हैं। भविष्य के प्रति भय उत्पन्न होने लगता है। जीवन में संभावनाएं दुःसंभावनाएं बन जाती हैं। वह सदैव चिन्तातुर रहता है। उसके आत्म विश्‍वास में कमी आने लगती है। हर पल उसे ऐसा लगता है कि किसी दूसरे के पास मेरे से अधिक साधन-सौन्दर्य, बल, ऐश्‍वर्य न हो जाए। कहीं मैं गरीब न हो जाऊं? कहीं मेरे सम्बन्धी मुझसे ज्यादा अर्थवान न बन जाएं? ये सब मानसिकताएं मनुष्य को नकारात्म्क चिन्तन की ओर मोड़ देती हैं। इस कारण एक अजीब सी क्रिया होती है, उसमें समय का चक्र इतना अधिक प्रभावशाली हो जाता है कि जिस लक्ष्य पर पहुंचकर उसे संतोष का परम तत्व मिलना चाहिए, वह लक्ष्य ही हट जाता है।
तुम खुद ईश्‍वरीय सत्ता का अंश हो –
इस स्थिति में आत्मबोध किस प्रकार से किया जाए, स्वयं को कैसे जाना जाए, स्वयं को कैसे पहचाना जाए? इस पर विचार करना अति आवश्यक है। हमारा भारतीय दर्शन यह स्पष्ट रूप से कहता है कि एक काल पुरुष जिसमें सम्पूर्ण और अनन्त ब्रह्माण्ड समाया हुआ है, उसे पूर्ण ब्रह्म कहा गया है। प्रत्येक धर्म और उनके अनन्त सम्प्रदाय यह मानते है कि सम्पूर्ण प्रकृति और संसार में ईश्‍वर समाया हुआ है। जबकि भारतीय संस्कृति का आधार यह है कि यह काल पुरुष ब्रह्म अखण्ड है और सबको धारण किये हुए है। प्रकृति का प्रत्येक जीव पेड़-पौधे, पशु-पक्षी, मनुष्य उस काल पुरुष के चैतन्य स्वरूप के छोटे-छोटे शक्ति केन्द्र हैं। जब यह शक्ति किसी आवरण स्वरूप में और सुरक्षा में होती है तब उसकी शक्ति को ‘ज्ञान’ कहा जाता है और जब यह जीव उस आवरण को छोड़ देता है तो उसकी जीव शक्ति सर्वोच्च सत्ता से जुड़ जाती है।

 

कर्म के बिना शक्ति निष्प्रभावी
जब ईश्‍वरीय शक्ति जीव के रूप में संसार में गतिशील होती है तो उसे अपने विकास, अपनी उन्नति के लिये कर्म करना आवश्यक हो जाता है। कर्म के बिना यह शक्ति निष्प्रभावी है और यह कर्म का चक्र निरन्तर और निरन्तर चलता रहता है। जिस प्रकार दिन और रात होते हैं, पक्ष, महीने, वर्ष, दशाब्दी, शताब्दी, युग होते हैं और यह क्रम निरन्तर चलता रहता है। इसी प्रकार कर्म का यह चक्र भी निरन्तर चलता रहता है। इसे समझाने के लिये वर्तमान कर्म, क्रियमाण कर्म, संचित कर्म और प्रारब्ध कर्म का नाम दिया है।

 

कर्म से मत हटो
जिस प्रकार कर्म नहीं रुक सकता है, उसी प्रकार कर्म की गति भी और कर्म का प्रभाव भी रुक नहीं सकता है। कर्म कभी नष्ट नहीं होता है। कर्म कभी उत्पन्न नहीं होता है। यह तो मनुष्य के जन्म से मृत्यु तक और मृत्यु से पुनःर्जन्म तक और उसके उपरान्त पुनः नये जीवन तक निरन्तर और निरन्तर चलता रहता है। ईश्‍वर को इसीलिये कालपुरुष कहा गया है जो हमारे सारे कर्म को केवल देखता है, वह हमारे कर्म में किसी भी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करता है। इस कर्म गति को समझ कर हम अपने वर्तमान कर्म को श्रेष्ठ केवल और केवल अपने आत्मबोध के द्वारा ही बना सकते हैं। कुछ क्षण रुकिये… सोचिये… और इस काल पुरुष की गति को देखने, सुनने, समझने का प्रयास करें और इस काल पुरुष की गति के साथ, कालचक्र के साथ, समय चक्र के साथ अपने कर्म चक्र को श्रेष्ठ बनाएं।
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:॥
याद करो, श्रीकृष्ण ने अर्जुन को क्या कहा? अरे! अर्जुन इस संसार में कोई भी मनुष्य किसी भी समय किसी भी क्षण बिना कर्म किये रह ही नहीं सकता है। ईश्‍वरीय प्रकृति का विधान ही ऐसा है कि वह मनुष्य को कर्म करने के लिये बाध्य कर ही देती है।
इसलिये कर्म तो हम करते ही रहते है, चाहे हम इच्छा से कर्म करें, चाहे हम अनिच्छा से कर्म करें। तो फिर क्यों न सद्इच्छा के साथ ही कर्म करें।

 

तुम शक्ति का केन्द्र हो –
मनुष्य का जिन सब शक्तियों के साथ सम्बन्ध है, उनमें से कर्मों की वह शक्ति सबसे प्रबल है, जो मनुष्य के चरित्रगठन पर प्रभाव डालती है। मनुष्य तो मानो एक प्रकार का केन्द्र है और वह संसार की समस्त शक्तियों को अपनी ओर खींच रहा है तथा इस केन्द्र में उन सारी शक्तियों को आपस में मिलाकर उन्हें फिर एक बड़ी तरंग के रूप में बाहर भेज रहा है। यह केन्द्र ही ‘प्रकृत मानव’ (आत्मा) है। यह सर्वशक्तिमान् तथा सर्वज्ञ है और समस्त विश्‍व को अपनी ओर खींच रहा है।

 

संसार में हम जो सब कार्यकलाप देखते हैं, मानव-समाज में जो सब गति हो रही है, हमारे चारों ओर जो कुछ हो रहा है, वह सब केवल मन का ही खेल है, मनुष्य की इच्छाशक्ति का प्रकाश मात्र है। मनुष्य की यह इच्छाशक्ति चरित्र से उत्पन्न होती है और वह चरित्र कर्मों से गठित होता है। अतएव जैसा कर्म होगा, इच्छाशक्ति का विकास भी वैसा ही होगा। संसार में प्रबल इच्छाशक्ति सम्पन्न जितने महापुरुष हुए हैं, वे सभी धुरन्धर कर्मी थे। उनकी इच्छा शक्ति ऐसी जबरदस्त थी कि वे संसार को भी उलट-पुलट कर सकते थे और यह शक्ति उन्हें युग-युगान्तर तक निरन्तर कर्म करते रहने से प्राप्त हुई थी। इसे हम आनुवंशिक शक्तिसंचार भी नहीं कह सकते।

 

कर्म ही आधार सत्य है –
यह सब कर्म द्वारा ही नियमित होता है। यह सनातन नियम है कि जब तक कोई मनुष्य किसी वस्तु का उपार्जन न करे, तब तक वह उसे प्राप्त नहीं हो सकती। हम अपने भौतिक सुखों के लिए भिन्न-भिन्न चीजों को भले ही एकत्रित करते जायें, परन्तु वास्तव में जिसका उपार्जन हम अपने कर्मों द्वारा करते हैं, वही हमारा होता है। हम किसके अधिकारी हैं, हम अपने भीतर क्या-क्या ग्रहण कर सकते हैं, इस सबका निर्णय कर्म द्वारा ही होता है। अपनी वर्तमान अवस्था के जिम्मेदार हम ही हैं और जो कुछ भी हम होना चाहें, उसकी शक्ति भी हमीं में है। यदि हमारी वर्तमान अवस्था हमारे ही पूर्व कर्मों का फल है, तो यह निश्‍चित है कि जो कुछ हम भविष्य में होना चाहते हैं, वह हमारे वर्तमान कार्यों द्वारा ही निर्धारित किया जा सकता है। अतएव हमें यह जान लेना आवश्यक है कि कर्म किस प्रकार किये जायें। सभी कर्मों का उद्देश्य है-मन के भीतर पहले से ही स्थित शक्ति को प्रकट कर देना-आत्मा को जाग्रत कर देना।

 

हमारा पहला कर्त्तव्य यह है कि हम अपने प्रति घृणा न करें; क्योंकि आगे बढ़ने के लिए यह आवश्यक है कि हम पहले स्वयं में विश्‍वास रखें और फिर ईश्‍वर में। जिसे स्वयं में विश्‍वास नहीं, उसे ईश्‍वर में कभी विश्‍वास नहीं हो सकता।

 

प्रत्येक मनुष्य का कर्त्तव्य है कि वह अपना आदर्श लेकर उसे अपने जीवन में ढालने का प्रयत्न करें। बजाय इसके कि वह दूसरों के आदर्शों को अपनी सफलता का मार्ग बनाएं। क्योंकि सम्भव है, दूसरे का आदर्श वह अपने जीवन में ढालने में कभी समर्थ न हो। किसी समाज के सब स्त्री-पुरुष न एक मन के होते हैं, न एक ही योग्यता के और न एक ही शक्ति के। अतएव उनमें से प्रत्येक का आदर्श भी भिन्न-भिन्न होना चाहिए और इन आदर्शों में से एक का भी उपहास करने का हमें कोई अधिकार नहीं। अपने आदर्श को प्राप्त करने के लिए प्रत्येक को जितना हो सके, यत्न करने दो। फिर यह भी ठीक नहीं कि मैं तुम्हारे अथवा तुम मेरे आदर्श द्वारा जांचे जाओ।

 

चलना है कर्म पथ पर
उपार्जन होगा कर्म पथ पर
प्रयोजन सिद्ध होगा कर्म पथ पर
परम आनन्द प्राप्त होगा कर्म पथ पर
कर्म की जय… कर्म की जय…
Does one receive the results of his Karmas?

The Principle of Karma and its Results

Current karma, Kriymaan karma, Accumulated karma and Destined Karma

Karma is Certain

Of all the powers which man has connection with, the power of the Karma is the strongest.

It is the eternal truth that Everything flows through Karma.


The following questions arise in every human mind :

  1. Is it necessary for me to take action?
  2. What type of action should I take?
  3. What should be the direction of my deeds?
  4. When and How will I receive the results of my deeds?

These four questions create the basis for this whole creation, and these questions emerge repeatedly. It is divine truth that a person has to perform a Karma (Deed). The Karma gets you to perform the deed, even if you don’t wish to. Nobody can stay action-less passive in this world. There is not a single action-less moment.

Let us analyze a page from the history. A huge gathering was taking place. Many scholars had come from afar. Everyone of those scholar was an accomplished expert in his own field, in his country. There were thousands of followers and millions of fans of each scholar. Every scholar had completed a detailed study of their texts. Each scholar would make his speech on the stage, and the audience would cheer his speech in their hundreds. Every scholar was full on pride on his knowledge, research &  scholarship; and this pride was plainly visible on their faces. Everyone was emphatically putting forth his points and arguments. Everyone was praising their own religion, their texts and their knowledge. It seemed that this was the best opportunity to prove oneself as the best. Everyone had been given a definite time-slot for their speech.

A turban wearing person clad in simple ochre robes was quietly peacefully sitting among them. He was lost in his own thoughts. It seemed that he was in deep meditation. Sometimes a slight smile escaped his lips. It seemed that he was happily thinking about his Guru, his thoughts and his goals.

Suddenly this person’s name was called out from the stage, and the young man calmly got up. He walked slowly and seriously to the stage. He looked around quiet calmly without any evidence of any curiosity, agitation, anxiety or pride. He greeted the chairman upon reaching the stage, and looking at the audience, greeted them thus – “My brothers and sisters”, and started his speech. He did not have any paper, letters or notes for reference. He started his speech facing the audience. He had been allocated ten minutes for his speech, and when the speech started, it seemed that the time had stopped. The entire audience got lost in the mellow strong voice. Even the chairman forgot to ring the time-alarm and the flow of wisdom continued for one and a half hour. At the completion of the speech, the entire audience along with the distinguished dignitaries stood up and applauded with resounding claps for full ten minutes. This conference was – The World Parliament of Religions and the date was September 11, 1893…

The youth was “Vivekananda” and Vivekananda said – “My strength is my  knowledge about my own self. It pervades the entire universe in the form of Providence. This same form-formless nature of God-realization is contained within my soul. I have made my small speech using the same sense of self-realization.

This force, which is known as  self-realization, is the greatest power. It is the biggest force which motivates us to act. This makes us drive our world. It determines our mental psyche. The Indian philosophy clearly states that within this universe, man is the entity having unlimited power. The human is the most dynamic and adaptable entity in the universe. What is the religion? Obtaining the immortality of the soul through actions and to determine the deeds on his own. The Indian Philosophy is very clear that the ultimate power called Divinity is within each organism. The cycle of birth and death of each organism, each human continues until salvation.

Each man lives his Karma cycle in four stages-

  1. Present Karmas
  2. Kriyamaan Karmas
  3. Accumulated Karmas
  4. Destined Karmas

The root foundation of the Indian culture, philosophy and religion is that the person should attain salvation by transitioning through these four Karmas in the birth-death cycles.

 

What is happening today?

The entire world is working towards development and progress. Every person is running in a race to prove his superiority. There is competition everywhere for knowledge, amenities, family and society  within the civilization. Everyone wants to belittle others to prove his superiority. It has become necessary these days to belittle others to elevate himself. The infinite net of desires has trapped the person from all sides, and he is tightly enveloped within this net. The fulfilment of desires seems to be main goal of everyone. The peace has drifted away from the life.

In the present age, everyone has illusions of superiority due to wealth, strength, luxury and amenities. Joining this race has turned him into a toy of his own existence, which starts running by pressing of a button. He himself doesn’t know whether the end-result of this running will be progress or degradation, since he has wandered away from the noble ethics.

 

Awaken your Self-realization –

The sole reason of this sorry state of affairs is – Absence of self-realization. The desires enhance in absence of self-realization. The possibilities in life become nightmares. He is always full of worry. His self-confidence begins to decline. He is always envious of enhancement of beauty-strength, luxury or amenities of his peers. He gets scared about poverty. He gets worried about his relatives becoming more richer than him. All of these mental thoughts increase negativity in his psychology. A strange process starts, the cycle of time becomes so influential that the very target at which he ought to have become satiated, that target itself vanishes.

 

You yourself are part of a Divine power –

How to realize your own self, in such situations, how to recognize the self itself? It is very important to consider this point. Our Indian philosophy clearly talks about a Time-entity, which constitutes the entire infinite universe. Every religion and community of this world believes the presence of God in the entire nature and world. However, the Indian culture is based on the eternal universal time-entity (Kaal-Purush), which contains everything. Every organism of this nature, the entire flora and fauna are little power centres of the conscious Kaal-Purush. This Shakti power is termed as wisdom when it is wrapped within a specific form within a safety circle, and it merges with the Divine power when the organism leaves the current form.

 

The Shakti power is ineffective without Karma

The dynamic divine power within the organisms pushes the creature to start doing actions for his development and growth. This Shakti power is useless in the absence of actions, and this Karma-cycle continues eternally.

This Karma cycle continues in the similar fashion as Day-Night, throughout the  Fortnight-Month-Year-Decade-Century-Era. We have classified them into Current Karmas, Kriyamaan Karmas, Accumulated Karmas and Destined Karmas.
Do not Wander away from Karma actions

The pace and effects of the Karmas cannot stop just like the Karmas cannot stop. Karma is never destroyed. Karma is never generated. It continues constantly dynamically throughout the birth-death to death-birth to new birth-death and so on. God has been termed Kaal-Purush because He constantly witnesses all our Karmas. He does not interfere in any of our Karma deeds. Comprehension of this Karma-cycle can help us to convert our present Karmas into excellence only and only through self-realization. Stop for a while… Think… and try to see, hear and understand the pace of this Kaal-Purush.  And excel in your Karma-cycle by aligning your Karma-cycle with the time-cycle through the dynamism of Kaal-purush.

Na Hi Kaschitkshanamapi Jaatu Tishthatyakarmakrit |

Kaaryete HraavashaH Karma Sarva PrakratijeirguneiH ||

 

Remember, what did Shree Krishna advise Arjuna?  Hey! Arjun, Nobody can survive in this world for even a single second without performing any Karma. The Divine natural rule enjoins a person to perform Karma.

So we keep on performing karma (actions), whether we wish to or not. Then why not perform Karmas with good noble intentions.

 

You are the centre of power –

The Karma Shakti power is the strongest power of all the powers with which a human being is associated with, and it deeply influences the personality of the person. The person is like a centre which attracts-pulls all the universal energies towards him, and then sends out these energy waves after merging all of these energy components. This centre is the “Prakrat Manav” (soul). It is  omnipotent and omniscient, and draws the entire world towards itself.

Whatever activities we see in the world, whatever society dynamics we operate within, whatever is happening all around us, it is all a play of the mind, it is the manifestation of the human will. The will-power rises from the  character of the individual and the character is created by his karma deeds. So the will-power develops according to his or her Karmas. All the great personalities in the world have been strong action focused persons. They were able to change the world order through their strong will-power, and they obtained this strong determination by performing Karmas throughout various eras. We cannot term it as a genetic energy transfer.

 

Karma is the basic truth –

Everything is regulated by karma. It is an  eternal rule that a man does not acquire an object, until he makes efforts to obtain it. We may accumulate a number of physical objects to fulfil our desires, but in reality we procure only what we obtain through our Karma deeds. What do we deserve, what can we imbibe within ourselves, all of it is dictated only through the Karmas. Only we ourselves are responsible for our present situation, and only we have the power to become whatever we wish to become. If our current situation is the result of our past Karmas, then it is certain that our current Karmas will dictate our future. Therefore, it is necessary to understand what type of Karmas we should perform. The primary goal of each Karma is to – activate the dormant mental energy, and to awaken the soul.

Our first duty is to ensure that we do not hate ourselves. It is vital for future progress to have faith in ourself and in God. One who lacks faith in self, can never have faith in God.

It is the duty of every person to mould his life according to his ideal. He should not use anyone else’s ideal to shape his own life. It might be possible that he will never gain the required capability to assimilate someone else’s ideal. Everyone is different, no two men or women have same mind, abilities or powers. So everyone’s ideal should be different, and no one has right to mock anyone else’s ideal. Let a person exert as much effort as possible, to obtain his ideal. It is not proper to evaluate anyone with some other’s ideal.

Walk on the path of action

On the path to earning good Karma

We will achieve success on this Karma path

and will receive ultimate joy on treading this Karma path

Hail Karma … Hail Karma

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