अपनों से अपनी बात – September 2016

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

गुरु पूर्णिमा महोत्सव में बड़ा ही आनन्द आया। एक महीना बीत गया है लेकिन अभी भी लगता है कल की ही घटना है। पूरे महोत्सव की मधुर स्मृतियां चलचित्र की भांति हृदय पटल पर दृश्यमान हो रही हैं। हर दृश्य याद आ रहा है। आपकी अनुभूतियां, आपका प्रेम, आपकी योग्यताएं, आपकी सेवा भावना और कर्त्तव्य परायणता सब देख, अनुभव कर मन हर्षित और पुलकित है। ऐसे उत्सव नियमित रूप से घटित होते रहें, उपनिषद् हमारे जीवन का अंग बन जाए। आप मेरे पास बैठें और मैं आपके पास बैठूं, ऐसे मधुर क्षण निरन्तर और निरन्तर हमारे जीवन में आते रहें।

 

जीवन के इस कालचक्र में मधुर क्षण ही तो हमारी सबसे बड़ी पूंजी है, जिन्हें हम बार-बार स्मरण कर हर्षित होते हैं। जो अनुभूति हमारे हृदय में प्रवेश कर जाती है। वह अनुभूति ही हमारी भावनात्मक एवं आध्यात्मिक पूंजी बन जाती है। जिस पूंजी को कोई छीन नहीं सकता है, जो कभी समाप्त नहीं हो सकती हैं। जिसे अक्षय कहा गया है। गुरु और शिष्य का सम्बन्ध भी अक्षय सम्बन्ध है, अनुभूतियों का प्रवाह है जो शिष्य रूपी नदियों के रूप में प्रवाहित होता है और गुरु रूपी समुद्र में समाहित हो जाता है और फिर यह क्रम अविरल रूप से चलता रहता है।

 

आज मैं तुम्हें तप के सम्बन्ध में कुछ बात कहना चाहूंगा। तप का शाब्दिक अर्थ है, जलाना जिससे उष्मा और ऊर्जा बनती है। तप का अर्थ है, कठोर अनुशासन। भोग और ऐश्‍वर्य से परहेज और त्याग की भावना। यही एक ऐसी प्रक्रिया है – जिससे जीवन की सारी त्रुटियां दूर होती हैं और आंतरिक व्यक्तित्व (चित्त या चरित्र) निर्मल हो जाता है। केवल और केवल ज्ञान की अग्नि ही कर्म के भण्डार को समाप्त कर सकती है। तुम अपने इस जीवन में ज्ञानाग्नि में जितना तप रहे हो यह ज्ञानाग्नि ही संचित प्रारब्ध और क्रियमाण सभी प्रकार के कर्मों को समाप्त कर देगी। तप का उद्देश्य अपने चित्त को उन संस्कारों से मुक्त करना है, जिनके कारण और अधिक दुःख और दूषित संस्कार उत्पन्न नहीं हो सकें। यही क्रिया तो तपस्या कहलाती है, साधना कहलाती है। साधना का अर्थ है, लक्ष्य की प्राप्ति और यह लक्ष्य तभी प्राप्त हो सकता है जब चित्त का पूर्ण शुद्धिकरण हो जाता है।

 

तपस्या एक प्रकार की साधना है, जो मन की अविद्या रूपी समस्त अशुद्धियों को जला देती है, भस्म कर देती है और उसके बाद कुंदन रूपी शुद्ध चित्त या सत्चित्त ही शेष बचा रहता है। इसी से जीवन में ऊर्जा का संचार होता है। उस ऊर्जा के संचार के लिये ही उपनिषदों की रचना हुई है, गुरु और शिष्य का मिलन हुआ ताकि शिष्यों के जीवन में जो ऊर्जा का संचार हुआ उसे शिष्य गुरु के निर्देशन एवं सान्निध्य में संचित करना भी सीख जाएं। गुरु केवल और केवल शिष्य में स्वाध्याय की क्रिया करते हैं। स्वाध्याय का शाब्दिक अर्थ है – आत्मविश्‍लेषण लेकिन स्वाध्याय का मूल भाव है, अपने मन के विभिन्न पक्षों का दर्शन करना। जब आप स्वयं अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व, भौतिक, मानसिक, संवेदनात्मक और आध्यात्मिक पक्ष का विश्‍लेषण करते हैं तो आप पाते हैं कि मैं वह नहीं हूं जो बाहर से दिखाई देता हूं। मैं तो कुछ अलग ही गहन व्यक्तित्व हूं। हर व्यक्ति की भौतिक, मानसिक, संवेदनात्मक और आध्यात्मिक स्थितियां अलग-अलग होती हैं। शिष्य के द्वारा गुरु के साथ संवाद एवं अपने व्यक्तित्व के विभिन्न पहलुओं का निरीक्षण करना और उसे समझना ही तो साधना है, तप है।

 

हेयं दुखमनागतम्…, द्रष्टृदृश्यययोः संयोगो हेयहेतुः…॥

 

जो दुःख अभी आया ही नहीं है, उसे तो टाला जाना चाहिए। जो दुःख वर्तमान में मिल रहा है उसे तो सह कर समाप्त किया जा सकता है। आपके जो कर्म परिपक्व हो गये हैं, वे दुःख देते हैं और इनसे छुटकारा पाने का उपाय इन्हें किसी भी तरह से भोग कर समाप्त करना ही है लेकिन जो अभी आया ही नहीं है, उसके आगमन को अवश्य रोक सकते हैं। जब तक यह शरीर विद्यमान है, सुख-दुःख तो लगे रहेंगे लेकिन भविष्य को बदलना हमारे हाथ में होता है। जो आपने बोया है, उस फसल को तो काटना अनिवार्य है। उसे बदल पाना आपके हाथ में नहीं होता है लेकिन जहां तक भविष्य की फसलों का सवाल है, आप पूरी तरह से स्वतंत्र हैं कि किन परिस्थितियों में कैसी फसल हो। भविष्य के कर्मों के फल को बदला जा सकता है। इसके लिये अपने वर्तमान कर्मों के फल को सही ढंग से इच्छित फल के अनुरूप यानि कर्मों के बीजों को विवेक पूर्ण तरीकों से बोना (झर्श्रेीसळपस) करना आवश्यक हैं।

 

यही तो मानसिक स्वतंत्रता है। गुरु की शिक्षा का आधार ही मानसिक स्वतंत्रता होता है। गुरु का कार्य आपको वह भावना देना है, जिससे आप मानसिक रूप से स्वतंत्र हो सकें। आपका स्वयं का तंत्र खुल सके, विकसित हो सके। मानसिक स्वतंत्रता ही हमें सुख दे सकती है जबकि सामान्यतया हम इसके बहुत विपरीत कार्य करते हैं। जब हमें किसी वस्तु से सुख और प्रसन्नता होती है तो मन बार-बार उस अनुभव को पाने के लिये, उस वस्तु के पीछे भागता है। मन की इसी भाग-दौड़ को राग कहा गया है। राग को दूर करना, कोई कठिन कार्य नहीं है। एक हल्के झटके द्वारा व्यक्तित्व से राग दूर किया जा सकता है। यह झटका प्रकृति से मिल सकता है और व्यक्ति स्वयं अपने आपको राग से मुक्त कर सकता है। राग और उसका विरोधी द्वेष दोनों ही बंधनकारक हैं, आपको परतंत्र बनाते हैं। इन बंधनों, परतंत्रताओं – राग, द्वेष से मुक्ति का उपाय मानसिक निरीक्षण, आत्म निरीक्षण और अपने मन, व्यक्तित्व को बार-बार परखना ही है। 

 

अपने जीवन को, अपनी चेतना को निम्न स्थिति से उच्च स्थिति की ओर ले जाने का एकमात्र मार्ग साधना है, तपस्या है जो निरन्तर चलने वाली प्रक्रिया है।

 

नवरात्रि और दीपावली तो उस मार्ग में आने वाले सोपान हैं, जिनको स्पर्श करते हुए आगे के लक्ष्यों को प्राप्त करना है। यदि तुम साधना नहीं कर सकते हो तो पूर्ण व्यक्तित्व होते हुए भी अपने मानस में अपूर्ण मन से संचालित हो रहे हो, अपूर्ण मन से अपने संपूर्ण व्यक्तित्व को कैसे अनुभव किया जा सकता है?

 

इसके लिये आवश्यक है कि तुम साधना के मार्ग को शक्ति के मार्ग को कभी भी मत छोड़ो। लक्ष्मी, लक्ष्य सिद्धि का स्वरूप है। तुम्हें अपने जीवन में, लक्ष्य को स्पष्ट रखते हुए कर्म पथ पर गतिशील होना है। निरन्तर और निरन्तर साधक बने रहना है। यही तुम्हारे जीवन की उच्चता होगी, श्रेष्ठता होगी, तब तुम आत्म विभोर हो सकोगे। तुम्हें अपने भीतर ही परमानन्द की प्राप्ति हो सकेगी।

 

तुमने मेरा हाथ पकड़ा है, मैंने तुम्हारा हाथ पकड़ा है। अब हम सब साथ-साथ इस मार्ग पर ‘ॐ सह नाववतु… सह नौ भुनक्तु…’ की वैदिक भावना के साथ-साथ आगे बढ़ें, चलते रहें…।

 

स्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with loved ones …

Dear loved one,

Divine Blessings,

The Guru Poornima festival was very joyful. A month has passed but it still feels that the event occurred yesterday. My heart is still vividly feeling all the sweet memories of the entire festival. Every scene is memorable. My mind is joyously delightfully filled with your experiences, your love, your abilities, your sense of service and your dedication to duty. Such events should regularly occur, the Upanishads should become a part and parcel of our lives. You sit besides me, and I sit besides you, may such sweet moments unceasingly come into our lives.

The sweet moments in the cycle of life are our greatest assets, we repeatedly delight in remembering them. This sweet sensation enters our hearts. This becomes our emotional and spiritual asset. Nobody can snatch away this capital, and it can never die away. This is ever-living. The relationship between the Guru and the disciple is also ever-living, it is a continuous flow of experiences, which flow out in the form of innumerable disciple rivers and merges within the Guru ocean. This pure cycle continues unceasingly.

Today I would like to state some facts about asceticism. The literal meaning of asceticism is tenacity, which kindles heat and energy. Tenacity signifies rigorous discipline. It means complete avoidance of indulgence and  luxury, and a sense of sacrifice. This is the only process – which eliminates all defects of life, and purifies the inner personality (mind or character). Only and only the flame of wisdom can eliminate the repository of karma. The raging fire of wisdom in this life of yours, will terminate all the accumulated, destined and current karmas. The purpose of asceticism is to liberate your soul from the sanskaars, so that new painful and defective sanskaars do not emerge again. This process is called the penance, it is called the Sadhana. Sadhanas mean, achievement of goals, and the goals can be achieved only after purification of the soul.

Asceticism is a kind of Sadhana penance, which burns all the ignorant impurities of the mind, consumes it completely, and only the Sattchit or gold like pure soul remains behind. This initiates the flow of energy in life. The Upanishads were composed to communicate this energy. The union-merger of Guru-disciple took place, so that the disciples could learn to accumulate the flow of energy under guidance and direction of Gurudev. Guru only initiates the process of understanding the self (Swaadhyaye). The literal meaning of Swaadhyaye is self-analysis. However the root concept of Swaadhyaye is to view various sides of your mind. When you yourself perform the complete analysis of your personality, physical, mental, sensory and spiritual aspects, then you realize that you are not what you are visible from the outside. You realize that you have a different intense personality. The physical, mental, sensory and spiritual situations are different for each person. The dialog by the disciple towards his Guru, and the inspection and understanding of different aspects of personality is the Sadhana itself, it is the penance.

 

Heiyam Dukhamanaagatam …, Drashtridrishyayayoah Sanyogo HeyahetuH … ||

Whatever sorrow hasn’t arrived, it should be averted. The anguish which one is suffering currently, should be borne. The karmas which have matured, give sorrow, and the only way to relieve them is to finish them by bearing the suffering. However, we can certainly stop the arrival of what has not yet started. The happiness-sorrows are part and parcel of this life, but the control of future is in our hands. Whatever we have sown, we certainly have to bear it. It is not in our control to change it, however regarding the future crop, you are at full liberty to decide how the future crop should be conditioned. The fruits of a person’s karmas can be changed. One needs to pursue the current karmas according to the desired fruits, i.e. it is necessary to plough the seeds of actions through conscious actions.

This is the mental freedom. The basis of Guru’s teaching is the mental freedom. The Guru’s task is to give you the sensation so that you can become mentally free. Your own system should open up, it should grow and develop. Only the mental freedom can grant us happiness, however generally we perform completely opposite acts. When any object gives us pleasure and happiness, then our mind runs over and over again to repeat that experience. This mental race is called as  indulgence. It is not a difficult task to eliminate indulgence. A small shock can remove the indulgence from the personality. Both indulgence and its opponent – envy,  cause bondage, both of them tie you in bondages. The way to liberate yourself from these chains and bondages of indulgence and envy is to repeatedly perform the mental, self analysis of our mind and personality.

The only way to take your life, your consciousness from low level to high position is the Sadhana, the penance, which is a continuous running process.

Navratri and Diwali are the stages in that journey, using which we can achieve the goals. If you cannot practice Sadhanas, then you are controlling yourself with imperfect mind in-spite of having a full personality. How can one experience the complete personality with an imperfect mind.

It is essential that you should not leave the Shakti path on the Sadhana path. Lakshmi is the essence form of the goal achievement. You should continue on the path of dynamic actions in your life, with the goal in full sight. You should continuously and unceasingly remain as the Sadhak. This will be highest level of your life, the superior excellence, then you will realize your self. You will achieve the Supreme bliss within you.

You have held my hand, I have grabbed your hand. Now we should continue along on this path with the Vedic sense of “Om Saha Naavavatu … Saha Nau Bhunaktu..”

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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