अपनों से अपनी बात – Sep 2015

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
शुभाशीर्वाद,

 

बहुत-बहुत बधाई… गुरु पूर्णिमा महोत्सव में बड़ा ही आनन्द आया। पुरी में समुद्र के किनारे भव्य पंण्डाल, भगवान जगन्नाथ की छत्र-छाया और आप सभी शिष्यों से मिलना, मेरे जीवन का सबसे आह्लादकारी क्षण था। जिस श्रद्धा से, तन्मयता से आप जगन्नाथपुरी आए उसके लिये मैं अपने हृदय से, मन से, भावों से आपको कोटि-कोटि आशीर्वाद प्रदान करता हूं।

 

घनघौर वर्षा के मौसम में जहां बार-बार मौसम विभाग तूफान की चेतावनी दे रहा था, उसके बीच आप सभी आए और शायद भगवान जगन्नाथ की भी यही इच्छा थी कि निखिल भक्तों को, शिष्यों को किसी प्रकार की कोई तकलीफ नहीं हो इसीलिये तीन दिन प्रकृति ने भी हमारा पूरा-पूरा साथ दिया और बरसात थमी रही। प्रकृति का तो तूफान नहीं आया लेकिन शिष्यों के मन में जो जज्बा, जो तूफान और जो भाव थे वे बड़े ही प्रभावशाली और तीव्र थे। हर शिष्य की एक ही पुकार – ‘हे! सद्गुरुदेव निखिल इस जीवन में पल-पल आपका सान्निध्य मिले इस भाव के साथ आपको श्रद्धा से अपने आपको समर्पित करने के लिये हम यहां जगन्नाथपुरी आए हैं।’ वास्तव में पुरी यात्रा तो एक बहाना थी, मूल भाव तो निखिल शिष्य और गुरु का मिलन ही था।

 

हर कार्य में भव्यता, परिपूर्णता, शांति और एक यह अहसास कि हम अपने जीवन में एक नव अध्याय जोड़ रहे हैं। जिस प्रकार इस वर्ष भगवान जगन्नाथ ने 19 वर्षों के उपरान्त नव कलेवर धारण किया है, नवरूप धारण किया है। उसी प्रकार हम भी अपने जीवन में नव कलेवर, नवीन स्वरूप धारण कर रहे हैं।

 

जहां तक भक्ति, श्रद्धा और समर्पण की बात है, मेरा विचार है कि जीवन में हर स्थिति में इन तीन तत्वों का समावेश होना आवश्यक है। सामान्य व्यक्ति भक्ति, समर्पण और श्रद्धा के मूल भाव को नहीं समझ पाता इसलिये वह सदैव अधूरा-अधूरा ही रहता है। प्रत्येक कार्य की पूर्णता के लिये, उस कार्य में आपकी पूर्ण भक्ति होनी चाहिए। ऐसी भक्ति कि आप अपने आपको भूल जाओ, जिस प्रकार भक्त अपने इष्ट का ध्यान करते-करते निमग्न हो जाता है। वह भक्ति रस में डूब जाता है, उसी प्रकार कार्य के लिये भी पूर्ण भक्ति चाहिए और यह भक्ति पूर्ण समर्पण और पूर्ण श्रद्धा से युक्त होनी चाहिए। यदि जीवन में पूर्णता प्राप्त करनी है, अपने अधूरे कार्य पूर्ण करने हैं तो पूर्ण भक्ति, पूर्ण श्रद्धा, पूर्ण समर्पण आवश्यक है।

 

जहां आपने गुरु को धारण किया है तो वहां भी पूर्ण भक्ति, श्रद्धा और समर्पण आवश्यक है। जीवन में हम कोई सम्बन्ध स्थापित करते हैं, मित्रता करते हैं, पारिवारिक सम्बन्ध बनाते हैं, गृहस्थ जीवन के सम्बन्ध होते हैं उन सभी प्रकार के सम्बन्धों में पूर्णता के लिये भक्ति, समर्पण और श्रद्धा परम आवश्यक तत्व हैं। इनमें से किसी एक तत्व की भी कमी होने पर सम्बन्धों में हल्की सी दरार आ जाती है और जब एक बार दरार आ जाती है तो विखण्डन की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। इसलिये मैं कहता हूं कि हर सम्बन्ध को पूर्ण समर्पण और श्रद्धा के साथ वहन करो।

 

जब-जब आप अपने सामाजिक बन्धनों की और बेड़ियों की बात करते हो तो मुझे बड़ा आश्‍चर्य होता हैं अरे भाई! ज्यादात्तर बंधन मानसिक होते हैं। एक बार आपके मन और बुद्धि में स्वतंत्र होने का भाव आना चाहिए। इस समाज की देशकाल परिस्थिति की मर्यादा में रहते हुए भी मानसिक रूप से स्वतंत्र हुआ जा सकता है।

 

मैं आपको मानसिक रूप से, भाव रूप से स्वतंत्र होने का आह्वान करता हूं, जागो, जागो, जागो और अपने मन में छाई हुई मानसिक परतंत्रता के बंधन से अपने-आपको मुक्त करो।

 

हमारा कार्य क्या है और जिस कार्य की पूर्णता के लिये हम आगे गतिशील हैं, उसके लिये एक विशाल संगठन को बनाना ही है और सदैव याद रखो कि किसी भी संगठन का निर्माण दूसरों द्वारा कार्य करने से नहीं हेाता है। संगठन का निर्माण आपके स्वयं के द्वारा किए गए कार्यों से होता है। मेरे  साथ-साथ आपको भी बिना थके और अहर्निश कार्य करना है।

 

उस सद्गुरु निखिल को धन्यवाद दो, जिनकी कृपा से तुम्हें केवल एक परिवार नहीं, बहुत विशाल परिवार, निखिल मंत्र विज्ञान परिवार मिला है। अब तक तुमने अपने दो चार रिश्तेदारों को, अपने दो-चार सम्बन्धियों को ही अपना परिवार समझा था। अब यह विशाल परिवार जहां हर तरह के लोग हैं लेकिन सबकी विचारधारा एक है और यह निखिल विचारधारा, सद्गुरु विचारधारा सबको जोड़े हुए है।

 

इस विशाल निखिल मंत्र विज्ञान परिवार में सभी के अपने-अपने छोटे-छोटे परिवार हैं, सबके अपने-अपने कार्य हैं, गृहस्थी हैं, रोजगार है लेकिन कुछ ऐसे सदस्य भी हैं जो अपने घर-परिवार के अलावा इस विशाल निखिल मंत्र विज्ञान परिवार के बारे में सोचते हैं और उसके लिये कार्य कर रहे है। अपने जीवन में भरण-पोषण और आर्थिक उन्नति के लिये तो सभी कार्य करते हैं लेकिन समाज के लिये, दूसरों के लिये इस निखिल मंत्र विज्ञान के लिये कार्य करने के लिये एक विशेष हिम्मत चाहिए। मन में एक जुनून होना चाहिए।

 

काम तो तुम्हें करना ही है। एक सुन्दर श्‍लोक है –
न हि कश्चित्क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत्।
कार्यते ह्यवश: कर्म सर्व प्रकृतिजैर्गुणै:॥

 

यह प्रकृति तुमसे निरन्तर काम तो करवाती रहेगी, बिना कर्म के तो किसी भी प्रकार की गति नहीं है तो फिर क्यों न हम ऐसे श्रेष्ठ कर्म करें, जिससे हमारी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और आध्यात्मिक उन्नति हो। क्यों न हम उस श्रेष्ठ मार्ग का चयन करें जिस मार्ग पर चलने से हमें सन्तुष्टि प्राप्त होती हो, श्री और यश में वृद्धि होती हो। इसके लिये एकमात्र उपाय समाजिक कार्य, संगठन का कार्य और गुरु कार्य का बीड़ा तुम्हें उठाना है। बड़ा आश्‍चर्य होता है कि तुम अपने शहर के ही पचास गुरु भाईयों को, निखिल मंत्र विज्ञान के सदस्यों को नहीं जानते हो? इसका सीधा-सा अर्थ है कि सम्पर्क शक्ति कमजोर है। समान विचार वाले व्यक्तियों से आपको मिलना है। इस निखिल मंत्र विज्ञान परिवार में वृद्धि करनी है। इसके लिये आपको और अधिक मेहनत करनी पड़ेगी। खुद के लिये तो सभी जीते हैं, कुछ ऐसा सामजिक कार्य करें जिससे श्री और यश की प्राप्ति हो। ईश्‍वर ने तुम्हें हजारों अधिकार दिये हैं तो उसके साथ कर्त्तव्य भी दिये हैं। कर्त्तव्य का अर्थ है – लक्ष्य को जानकर कर्म करना। गुरु पूर्णिमा महोत्सव और निरन्तर गुरु से सम्पर्क कर्त्तव्य और अधिकार में सामंजस्य स्थापित करने के लिये ही होता है।

 

सद्गुरु का दिव्य वचन है – साधक का मन कल्पतरू है, मन के समुद्र में उठती हुई भावनाएं आत्मिक शक्ति में परिवर्तित  हो जाती हैं। यदि साधक का मन पूर्ण विश्‍वास, निर्भय, आशा और कल्याणकारी भावों से भरा होता है तो उसे अनंत वरदान मिलते हैं। यदि वह विपरीत स्थितियों से भयभीत हो जाता है और अमूल्य विश्‍वास खो बैठता है तो वह स्वयं को ही खो देता है तथा सदा के लिए नष्ट हो जाता है।

 

मैं आपके जीवन में आनन्द अमृत प्रवाहित करने के लिये सदैव आपके साथ हूं। आप अपने जीवन में स्वयं अपने हाथों से हजारों श्रेष्ठ कार्य सम्पन्न कर सकें। आपके हाथों में ही लक्ष्मी, सरस्वती और शक्ति का स्थान है।

 

कराग्रे वसते लक्ष्मी करमध्ये सरस्वती।
करपृष्ठे स्थितो ब्रह्मा प्रभाते करदर्शनम्॥

 

आपको नवरात्रि में चामुण्डा शक्ति पूजन और दीपावली की रात्रि को महालक्ष्मी की विशेष साधना और पूजन सम्पन्न करना है। अपने आपको स्वाभिमान से भरपूर रखिए और गुरु के ज्ञान पथ पर निरन्तर गतिशील रहें।

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with loved ones…

 

Dear loved one,

 

Divine Blessings,

 
Deep Heartiest Congratulations … Guru Poornima festival was full of joy. The magnificent tent on the beach in Puri, Lord Jagannath’s divine shade, and congregation with all you disciples, this was an exhilarating moment of my life. The faith, the devotion, which you brought to Puri, I bless you a million times with deep sentiments in my heart and mind.
 
During the raging rainy monsoon season when the meteorological department was repeatedly issuing storm warnings, you arrived within such inclement surroundings, and perhaps Lord Jagannath also desired that the Nikhil devotees, the disciples should not face any problems. So the mother nature cooperated fully with us for three days, and the rains ceased. The natural storm did not arrive, but the passion, the emotions and sensations in the minds of the disciples, were exceedingly intense and forceful. Every disciple had only one call – “Hey! SadGurudev Nikhil, with a heartfelt desire of your presence at every moment in life, to express and offer complete-self, we have come here to Jagannathpuri.” In reality, the Puri travel was just an excuse, the real purpose was the merger of Nikhil disciple and Guru.
 
Every one of our tasks should have a sense of brilliance, perfection, peace and a realization of an addition of a new chapter in life. Like Lord Jagannath has adorned a new form, a new design this year after 19 years, similarly, we are also changing to a new format, a new flavor in our lives.
 
As far as devotion, faith and dedication are concerned, I think that these three elements should be included in every situation of life. A normal person is not able to understand the basic essence of devotion, dedication and reverence; and so remains incomplete in his life. To accomplish any task, there should a full devotion towards the task. The devotion should be of such a scale  that you forget yourself, akin to a devotee engaging himself completely in devotion to his God. He submerges himself in Bhakti-rasa, similarly full devotion is a mandatory requirement to accomplish any task; and this devotion should be accompanied with the full faith and complete commitment. If you wish to attain perfection in life, if you wish to complete the pending tasks, then full devotion, full faith and full dedication is required.
 
If you have imbibed a Guru, then full devotion, faith and dedication is needed there as well. Whatever relationships we build in this life, friendships, fraternal bonds, familial ties, all of these relationships require a full dose of devotion, faith and dedication elements for fulfillment. Reduction of any of these elements cause slight strain in the ties, and once a crack appears, the disruption process initiates. Therefore, I emphasize that each relationship should be nurtured with full dedication and devotion do.
 
Whenever you talk about your social constraints and shackles, I get amazed that – Oh brother! Majority of these ties are mental. You should imbibe a sense of freedom in your mind and intellect. One can be mentally free even while living within the current location-time limitations of the society.

I exhort you to become independent, from your mind and your senses, arise, awake, stir and free yourself from the mental shackles of psychological dependencies.

What is our task, and what we are moving forward to complete, we need to build  a huge organization to accomplish this. And always remember that an organization doesn’t get created by actions of others, it gets nurtured by the actions of self. You have to wholeheartedly work with me without any fatigue or pause round-the-clock.

You should be grateful to our SadGurudev Nikhil, who has blessed you with not just a simple family but a wonderfully splendid organization, the Nikhil Mantra Vigyan family. Until now you had considered only 2 relatives, your 2-4 brethren as your family. This is a vast magnificent family, having all sorts of people, but everyone has only one ideology and this Nikhil ideology, SadGuru ideology binds everyone together.

This huge Nikhil Mantra Vigyan family comprises of many tiny families of yours, everyone is engaged in their own work, running their household or fulfilling their duties; but there are some members who think about this great Nikhil Mantra Vigyan family and are working for it apart from fulfilling their family obligations. Everyone works for self-sustenance and economic development, but one needs a special courage to work for others, for the society, for Nikhil Mantra Vigyan. Your mind should be full of passion and energy.

You have to accomplish the tasks.  A beautiful verse –

Na Hi Kashritkshanamapi Jaatu Tishthatyakarmakrit |

Kaaryate HamavashaH Karma Sarva PrakritiJegurneH||

 

The providence will continuously enforce you to do tasks, there is no existence without work, then why don’t we perform tasks which lead to our physical, mental, financial and spiritual development. Why don’t we choose the best trail which grants satisfaction and grows our wealth and fame. This sole path of social efforts, organization setup and work of Guru; has to be borne by you. It is a matter of big surprise that you don’t even know 50 Guru-brothers, Nikhil Mantra Vigyan members in your own city? This only means that the interaction force is very weak. You should meet like-minded individuals. The Nikhil Mantra Vigyan family should grow. You will need to put more efforts and exertions into this field. Everyone lives for self, we should do some community service which also grants wealth and fame. God has gifted thousands of rights, but He has specified many duties and responsibilities. Responsibility means – Performing tasks after understanding the overall goal. The Guru Poornima mahotsava and continuous interaction with Gurudev provides this balance between the rights and duties.

The divine words of SadGurudev –  The mind of sadhak is like Kalptaru boon-gifting tree, the emotions rising in the mental ocean transform into spiritual prowess. If a Sadhak’s mind is full of complete faith, courage, optimism and charitable thoughts, then he attains infinite boons. If he gets afraid of adverse situations and loses the valuable trust, then he loses his own self, and destroys self for ever.

I am always with you to pour the joyous nectar into your life. You should accomplish thousands of great tasks in your life with your own hands. The Mother Lakshmi, Saraswati and Shakti resides in your hands.

Karagre Vasate Lakshmi Karmadhye Saraswati |

Karprishte Sthito Brahma Prabhate Kardarshanam ||

 

You should accomplish Chamunda Shakti Poojan during Navratri and special Sadhana and Poojan of MahaLakshmi on Deepawali night. Fill yourself with self-respect and continue on this divine knowledge track of Gurudev.

 

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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