अपनों से अपनी बात – October 2016

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

नवरात्रि के शक्ति पर्व की आपको हार्दिक शुभकामनाएं और आशीर्वाद, आप यह शक्तिपर्व उत्साह, उमंग और साधना के साथ सम्पन्न कर रहे है। इसकी जानकारी पूरे भारतवर्ष के साधक-शिष्य मुझे भेज रहे है। कभी आप पत्र लिखते हो, कभी संदेश भेजते हो, आप अपने भावों का उद्गार करते हो। आपके भावों को जानकर परम तृप्ति की अनुभूति होती है। जब तुम अपनी अनुभूतियां लिखते हो, साधना के बारे में लिखते हो, मुझे मेल करते हो, उस प्रत्येक पत्र को मैं अवश्य पढ़ता हूं। तुम अपने संसार में अपना-अपना कार्य कर रहे हो, इस कार्य से तुम्हें क्या अनुभव हो रहा है? क्या अनुभूति हो रही है, इस पर भी अवश्य विचार करना। तुम अपने कार्य को कर्म कहते हो, तुम अपने कार्य को जिम्मेदारी कहते हो, तुम अपने कार्य को प्राप्ति का माध्यम समझते हो तो निश्‍चित रूप से कुछ बाधाएं, कुछ विपरीत परिस्थितियां, कुछ अनुकूलता, कुछ प्रतिकूलता अवश्य आयेगी।

 

तत् कर्म यत् न बन्धाय सा विद्या या विमुक्तये। 
आयासाय अपरं कर्म विद्या अन्याशिल्पनैपुणम्॥

 

कर्म वह है जो बंधन में नहीं डाले, विद्या वह है जो मुक्त कर दे अन्यथा कर्म श्रम मात्र है और विद्या केवल यांत्रिक निपुणत्ता।

 

तुम कर्म कर रहे हो और तुम्हारे मानसिक बंधन और अधिक बढ़ते ही जा रहे है तो वह कर्म तुम्हें किस ओर ले जा रहा है? तुम तो और अधिक दलदल में फंसते जा रहे हो, जबकि तुम्हारा लक्ष्य कुछ और है। तुम विद्या प्राप्त कर रहे हो, तो वह विद्या तुम्हें मुक्ति की ओर ले जानी चाहिए। यदि विद्या प्राप्त कर तुम अपने कर्म बंधन को बढ़ाते जा रहे हो तो यह कर्म और विद्या का सही उपयोग नहीं है। सब बातों के मूल में मुक्ति का भाव अवश्य ही होना चाहिए। मूल आधार मुक्ति है, उस बिन्दु पर पहुंचना जहां परमानन्द है।
तुम संसार में नित्य प्रति कर्म करते हो तो यह भी जान लो कि कर्म करना किसे कहते है? कर्म तुम्हारे लिये वृत्ति है, आजीविका है, अथवा कोई और स्थिति है?

 

वृत्ति मूलमर्थ लाभः… अर्थ मूलौ धर्म कामौ… अर्थ मूलं कार्यम्…

 

तुम्हारे दैनिक क्रियाकलाप का मूल अर्थ ‘लाभ’ प्राप्त करना है। यह बात भी सही है तो यह भी जान लो कि तुम्हारे धर्म और काम का आधार भी अर्थ ही है। तुम्हारे प्रत्येक कार्य का आधार अर्थ ही है। यह अर्थ शब्द बड़ा ही महान् है। अर्थ अर्थात् केवल आजीविका नहीं, अर्थ अर्थात् केवल संग्रह नहीं, अर्थ अर्थात् केवल वृत्ति नहीं। तुम्हारी जीवन वृत्ति अर्थ के लिये है, मूलभाव ‘अर्थ’ अर्थात् समझ, चेतना; जिससे तुम्हें आनन्द की प्राप्ति होती है। अन्यथा तुम्हारी सारी क्रियाएं केवल शरीर को संजाने की क्रिया है, पेट भरने की क्रिया है। कुछ जिम्मेदारियां तुम्हें मिलगई है और कुछ जिम्मेदारियां जबरदस्ती तुमने अपने ऊपर ओढ़ ली है। उन जिम्मेदारियों को निभाते-निभाते तुम सोच रहे हो कि तुम बड़े ही कर्मशील व्यक्ति हो। धर्म हो या कर्म हो, कार्य हो या वृत्ति हो, मूल भाव अर्थ प्राप्त करना है। इस जीवन का अर्थ जिसके लिये तुम इस संसार में प्रकट हुए हो, आये हो। तुम्हारी स्वयं की अपनी श्‍वास है, तुम्हारे स्वयं के अंग है, तुम्हारे स्वयं के प्राण है और तुम्हारे स्वयं की ‘जान’ है। तुम अपनी ‘जान’ का अर्थ समझो। यह ‘जान’ बड़ी ही बेशकीमती है।
मैं भी कहता हूं कि इस संसार में नित्य प्रति कर्म करते रहो लेकिन कालचक्र को अपने अधीन रखकर। कर्म वह है जब हम कालचक्र को भूल जाए, घड़ी को भूल जाए। कालचक्र तो टिक-टिक करता निरन्तर चलता ही रहेगा लेकिन जब मन से काम करेंगे, आनन्द से काम करेंगे तो तुम कालचक्र पर हावी रहोगे और तब तुम्हारे आनन्द जीवन के क्षणों में निरन्तर और निरन्तर वृद्धि होती रहेगी। उम्र का तुम्हारे ऊपर प्रभाव नहीं आयेगा। उम्र का प्रभाव तो उन पर आता है, जो कालचक्र के अधीन काम करते है। जब मन से किया तो मन आनन्द से युक्त हो गया, तो काल भी अपने आप रुक जायेगा।

 

अपने मन को कार्य में लगा दो, अपने मन को साधना में लगा दो, अपने मन को सद्गुरु में लगा दो, बार-बार समय चक्र की ओर मत देखो। काल का प्रयास तुम्हें नियन्त्रण करना है, इसीलिये कई बार हताशा-निराशा में तुम कहते हो कि मैं तो काल के अधीन हूं, समय चक्र बड़ा बलवान है।

 

नहीं… नहीं… समय चक्र बलवान नहीं होता, काल बलवान नहीं होता, मृत्यु बलवान हो नहीं सकती, सबसे बलवान तो तुम हो। सबसे बलवान तो जीवन है जो काल को रोक सकता है। इसके लिये सदैव और सदैव अपने मन की आवाज सुनते रहो। यह मन की आवाज बहुत तेज-तेज चिल्ला-चिल्लाकर तुम्हारे दिमाग तक पहुंचती है। इसमें ध्वनि नहीं होती इसलिये यह किसी दूसरे को सुनाई नहीं देती। लेकिन तुम्हें अवश्य ही स्पष्ट सुनाई देती है। इस मन की आवाज को निरन्तर और निरन्तर पकड़े रहना। इसे किसी कीमत पर मत छोड़ना। यही जीवन का सबसे बड़ा अर्थ है, तुम्हारे जीवन का अमृत कुण्ड है।

 

तुम अपने आदर्श तो कृष्ण, बुद्ध, महावीर, शंकराचार्य, सद्गुुरु निखिल को मानते हो लेकिन क्या उनके समान पथ पर चलने का थोड़ा भी प्रयास करते हो? क्या अपनी मन की सुनकर चलते हो या केवल और केवल ‘काल’ तुम्हें निर्देशित करता है। जिस मानसिक स्वतंत्रता के मार्ग पर शंकराचार्य चले, सद्गुरु चले उस मार्ग पर चलने का साहस कर चार कदम तो उठाओं। आगे के चार क्या, चार हजार योजन भी पूरे हो जायेंगे। एक बार बहुत बड़े प्रयास और साहस की आवश्यकता है।

 

इसीलिये गुरु और शिष्य का सम्बन्ध मन का सम्बन्ध है। तुम्हारे मन में उत्साह, उमंग गुरु की आवाज से आती है। वही सम्बन्ध है, जो प्रेम से भरा हुआ है। यही तो सद्गुरु ने कहा कि गुरु और शिष्य का सम्बन्ध बड़ा ही संवेदनशील सम्बन्ध है, जिसका आधार केवल और केवल प्रेम हे।

 

मनहिं दिया निज सब दिया, मन से संग शरीर…

 

मन दे दिया तो सब कुछ अपने आप समर्पित हो गया। मैंने भी आरोग्यधाम के लिये अपने मन की बात सुनी और इस कर्म पथ पर क्रियाशील रहा। मुझे गर्व है कि मेरे इस कार्य में आप जैसे हजारों शिष्य सहयोगी बन रहे है और आगे यह विराट् यात्रा चलती रहेगी।

 

हम सब मिलकर जीवन में विजय की यात्रा करते है, अपने जीवन में विराट् अश्‍वमेघ यज्ञ सम्पन्न करते है, अपने तत्वमसि को जाग्रत करते है और हमारी यात्रा सम्राटाभिषेक की यात्रा है।

 

मानसिक रूप से तुम स्वतंत्र होने की निरन्तर क्रिया करो…

 

स्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with loved ones …
 
Dear loved one,
 
Divine Blessings,
 
My heartiest wishes and blessings to you on the auspicious Shakti Navratri festival. You are celebrating this Shakti-festival with full enthusiasm, energy and Sadhanas. I have been getting messages from Sadhak-disciples all across the country. You express your emotions through letters or phone messages. I get immense satiation upon knowing your emotions and thoughts. I definitely read every letter or email which you send about your divine experiences or your Sadhana. You are engaged in doing your own worldly occupations. You should also think about your own feelings and experiences in pursuing these tasks. If you consider your work as your Karma, if you do your work with responsibility and think of it as a medium of your progress, then definitely you will encounter some obstacles, adversities, and favourable-unfavourable circumstances while doing these Karmas.

 

Tat Karma Yat Na Bandhaaaya Saa Vidhyaa Yaa Vimuktaye |

Aayaasaaya Aparam Karma Vidhyaa Anyaashilpaneipoonama ||

 

i.e True Karma does not tie you in bondages, and Vidhya (wisdom) liberates you; else Karma degenerates into toils and Vidhya into literal-learning.

 

If you are working, and your mental bondages keep on increasing, then where is this work or Karma taking you to? You are getting more struck within this  whirlpool, even though your basic objective is something else. If you are obtaining knowledge, then this knowledge should lead you towards freedom. Utilizing your knowledge to increase your Karma-bondages, is not an appropriate usage of either knowledge or Karma. The root sense of liberation should always be present. The core objective is to obtain liberation, to reach the stage of Divine joy, the Paramanand.
 
As you perform Karmas daily in your own world, you should clearly understand what Karma is? Is it your habit, or occupation or is it something else?

 

Vritti Moolmartha LaabhaH … Artha Moolou Dharma Kaamou … Artha Moolam Kaaryam …

 

The basic reason of your daily occupation is to obtain some profit or gain. It is correct that money is the basis for both spiritualism and materialism. Money (Artha) is the basis of your each and every action. This Artha word is very significant. Artha is not just the occupation, savings, or habits-duties. Artha drives the basic nature of your life. Artha directs you towards Comprehension and Chetna-Consciousness directs you towards joy.
 
The purpose of all other life processes is to either fill the stomach or to beautify your body. You have inherited some responsibilities and you have imposed some more responsibilities upon yourself. You think of yourself as very dynamic action-oriented person while fulfilling those responsibilities. The basic objective is to obtain Artha through the religion or Karma, or through work or habits. We need to understand the meaning (Artha) of our life, for which we have come into this world, in this life. You have your own breaths, your own body, your own soul, and your own life. Try to understand the meaning of your own life. This life is very valuable.
 
I also advise you to continue to perform Karmas in this world, but by controlling the time-cycle. A real Karma is the one, in which we forget about the time, lose track of the duration. The clock will continue to tick-tick, but you will control this time by working with full dedication and joy. This will enhance the joyous quality of your life. Age will not be able to impact you. The age impacts only those who let the time-cycle control their work. When we work with full mental dedication, then the mind gets filled with joy, and the impact of time will disappear.

Focus your mind in your actions, focus it on your Sadhanas, focus it on your SadGurudev, do not keep watching the ticking clock. The time will always try to control you, and therefore, sometimes in despair you exclaim-  I am under the control of time, the Time is very powerful.

No… No… The time is not that powerful, the death cannot be powerful, only you yourself are the most powerful entity. Life is the most powerful, as it can stop the death. Continue to hear the inner voice of your mind. This inner voice reaches your senses very loudly. It is inaudible, so others cannot hear it. However, you can listen to it very clearly. Keep on listening to this inner voice. Do not ignore it under any circumstance. This is the most important Artha (meaning) of your life, this is the divine nectar of your life.

You consider Krishna, Buddha, Mahavir, Shankaracharya or SadGuru Nikhil as your ideals, but do you ever try to walk on the same path as they did? Do you do as per your inner voice, or does the time controls you. Try to walk a few steps on the path of mental freedom, which Shankaracharya, or SadGurudev took. Take the initial four steps, and you will automatically take the thousands of future steps. It only requires the initial energy and courage.

Therefore, the Guru and the disciple are connected through the mind. You obtain the energy and enthusiasm in your mind through Guru. This is the only relationship which is completely filled of love. SadGuru also stated that the vibrant divine relationship of Guru and disciple is based only and solely upon love.

 

Manhin Diyaa Nija Saba Diyaa, Mana Se Sanga Sharira …

 

Offering of mind, results in total dedication. I also listened to my inner voice on Arogyadhaam and continued on this Karma-path. I feel proud that thousands of disciples like you are participating in this divine task, and this great journey will continue ahead.
 
We are together in this journey of Victory in life, accomplishing the Viraat Ashwamedha Yagya in our life, awakening our Tatvamasi and our journey is towards Samraatabhishek.

 

Continue to act for mental freedom…
 
Cordially your own

Nand Kishore Shrimali

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