अपनों से अपनी बात – Oct 2015

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
शुभाशीर्वाद,
आज कुछ मन की लिखता हूं –

 

बोलने से अधिक मौन रहना सीखना कठिन है, जब हम बोलते हैं तो हमारी सारी शक्ति बहिर्मुखी हो जाती है लेकिन जब हम मौन रहते हैं अथवा श्रवण करते हैं, किसी बात को सुनते हैं तो निश्‍चित रूप से हमारे भीतर विचार शक्ति तीव्र होती है। दो घंटे बोलते रहने की अपेक्षा दो घंटे मौन रहना अधिक (ज्यादा) कठिन है। इसे आप आजमा करके देखिए, मौन रहकर अपने अन्तर्मन को देखिए, अपने अन्तर्मन की आवाज सुनिए दूसरों की बात सुनिए लेकिन तत्काल प्रतिक्रिया व्यक्त मत कीजिए

 

यहां पर हमको दो शब्दों का सम्बन्ध और उनका प्रभाव जानना चाहिए, जिनमें से पहला शब्द है ीशरलींळेप (त्वरित, तत्काल प्रतिक्रया अर्थात् बिना सोचे समझे की गई प्रतिक्रिया) और दूसरा शब्द है ीशीिेपीश (सोच, विचार, समझ एवं दूर दृष्टि के द्वारा तर्क संगत ढंग से दिया गया उत्तर) जब हम ीशरलींळेप अर्थात् प्रतिक्रिया करते हैं तो ज्यादातर हम (असुर) पाशविक वृत्ति के वाहक, बनकर प्रतिक्रिया करते हैं जबकि ीशीिेपीश में हम सुरों (देवताओं, योद्धाओं) की भांति देववृत्ति को साधते हुए उत्तर देते है। ीशीिेपीळलश्रश बनिये।

 

हमारा मन ही तो विश्‍व का सबसे बड़ा फिल्टर हाउस है जो अपने आप श्रेष्ठ बातों को ग्रहण कर लेता है और न्येष्ट बातों को बाहर का बाहर ही रख देता है, लेकिन इस क्रिया के लिए मौन रहना आवश्यक है। जब आप मौन रहकर सुनते हैं तो आपका रोम प्रतिरोम, नेत्र, कर्ण, चर्म सब इन्द्रियां जाग्रत हो जाती हैं और किसी भी बात, मुद्दे पर उसके लाभ-हानि, उचित-अनुचित भविष्य में उस बात से पड़ने वाले प्रभावों को सोच समझकर निर्णय करते हैं और इस प्रकार आप शक्ति तत्व को पूर्ण रूप से ग्रहण करते हैं। उतना ही बोलो जितना आवश्यक है, अपने शब्दों का चयन बहुत सावधानी से करो। शब्द रूपी बाण का प्रहार बड़ा ही तीव्र होता है, इसलिये आप अपने वचनों के द्वारा किसी को आघात पहुंचाने का प्रयत्न कभी भी नहीं करें। आपको तो अपनी शक्ति का, अपने ही विकास (उन्नति) के लिए उपयोग करना है।

 

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आप क्या काम करते हैं? आपका लक्ष्य क्या है? यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण नहीं है उस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए आप जिस प्रक्रिया को अपनाते हैं, वह महत्वपूर्ण है। अतः साध्य नहीं साधन का महत्व अधिक है अर्थात क्रिया (साधना) का महत्व ही सर्वसिद्ध है। आपके और लक्ष्य के बीच में दूरी तय करने के लिए प्रक्रिया ही साधन है। आपको प्रक्रिया में आनन्द आना चाहिए। ज्यादातर लोग जीवन में हताश, निराश, उदास क्यों दिखाई देते हैं? उसका एकमात्र कारण उनको अपने कार्य की प्रक्रिया में ही आनन्द नहीं आ रहा है। यदि आपको अपने रलींळेप पर आनन्द नहीं आएगा तो लक्ष्य प्राप्ति हो भी जाएगी तो भी आनन्द कैसे आएगा? मंजिल प्राप्त करनी है लेकिन मंजिल तक पहुंचने के मार्ग का भी पल-पल आनन्द लेना है। यदि श्‍वास भी ले रहे हो तो श्‍वास लेने की प्रक्रिया में भी आनन्द आना चाहिए, यदि आपने अपनी जिन्दगी में अपने आप से जोर जबरदस्ती की तो आनन्द समाप्त हो जाएगा। आपको ही अपनी सारी क्रिया करनी है तो इस क्रिया की जो विधि है अर्थात् जो िीेलशीी, विधान है, उस िीेलशीी में आनन्द का तत्व डाल दीजिए। क्रिया में आनन्द आ गया तो काम अपने आप आनन्द पूर्वक सम्पन्न हो जाएगा।

 

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तुम्हारी श्रद्धा तुम्हारी अपनी निधि (सम्पत्ति) है, तुम्हारी सबसे मूल्यवान वस्तु है, तुमने उसे अपने मन में धारण किया है। यह श्रद्धा जन्म से तुम्हारे साथ नहीं आई है किसी ने भी श्रद्धा के लिए तुम्हें विवश नहीं किया है। श्रद्धा तो बड़ा ही प्यारा भाव है जो हृदय और मन में बहुत-बहुत गहरे से आता है।

 

तुम्हें मालूम है कि यह श्रद्धा तो कर्त्तव्य से भी बड़ी मूल्यवान वस्तु है, सबसे अमूल्य भाव है। इसे हर समय संभाल के रखना, इसका ध्यान रखना। यदि किसी के कहने से, कुछ सुनने से, कुछ देखने से तुम्हारी श्रद्धा टूटती है तो तुम्हारी श्रद्धा कच्ची है फिर वह क्षण बड़ा ही भयावह हो सकता है। उस दिन तुम्हारा मन खण्ड-खण्ड हो सकता है, फिर कुछ नहीं बचेगा। जिस प्रकार अर्न्तमन की आवाज किसी दूसरे को सुनाई नहीं देती, ठीक उसी प्रकार श्रद्धा के टूटने की आवाज भी किसी दूसरे को सुनाई नहीं देती और हो सकता है तुम पूर्ण रूप से विचलित हो जाओ। जीवन खण्ड-खण्ड न हो जाए इसलिये श्रद्धा को संभाले रखना एवं श्रद्धा बनाए रखना ही जीवन का अमृत है। 

 

श्रद्धा में बहुत गहरी शक्ति है, श्रद्धा में कोई भार नहीं होता, श्रद्धा से तो मन हल्का हो जाता है, श्रद्धा से मन का बोझ उतर जाता है। श्रद्धा तुम्हारा व्यक्तिगत भाव है, जहां-जहां तुम जाओगे यह श्रद्धा तुम्हारे साथ-साथ चलेगी। हर समय तुम्हारे साथ रहेगी। बड़ा ही प्यारा भाव है यह श्रद्धा।

 

तन थक सकता है, बाधाएं आ सकती हैं लेकिन श्रद्धा कभी थकती नहीं है। वह तो तन और मन को सम्बल, सहारा ही देती रहती है। श्रद्धा ही कठिनाईयों के दल-दल से निकालकर तुम्हें गहरे स्वच्छ आनन्ददायक अमृत सरोवर में ले जाती है। 

 

तुम्हें याद है कि तुम अकेले कब थे? तुम अकेले तब थे जब तक श्रद्धा तुम्हारे साथ नहीं थी। अब कहां अकेले हो जहां भी जाओगे, जो भी करोगे यह श्रद्धा तुम्हारे साथ-साथ चलती रहेगी। श्रद्धा तुम्हारा ही प्रतिरूप है, तुम्हारे ही मन का दर्पण है और यह दर्पण इतना मजबूत है कि इसे कोई तोड़ ही नहीं सकता है। पल-पल मन के भावों से तुमने इसे सजाया है, संवारा है अपने मन के केन्द्र में इसे भव्यता के साथ मन के सिंहासन पर बिठाया है। तुम्हारी वास्तविक आनन्दानुभूति तो इस श्रद्धा के चारों ओर ही भ्रमण करती है। जीवन का सबसे सुखद भाव, श्रद्धा ही है।

 

श्रद्धावान लभते ज्ञानम् – श्रद्धा में ही लाभ है परमानन्द है

 

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तुम समय का इन्तजार करते हो, उसकी प्रतीक्षा करते हो लेकिन विचित्र बात है कि वो समय तो आता ही नहीं है। जिसके लिए तुम इतने अधीर होते हो, समय तो अनवरत तुम्हारे सामने चल रहा है। अधीरता से नहीं, इंतजार से नहीं बस इस वर्तमान क्षण को तत्काल पकड़ना पड़ता है। उसे तत्काल, इसी क्षण अपने अधीन करना पड़ता है। 

 

जो समय का इंतजार करते रहते हैं, उन्हें समय कोई भाव ही नहीं देता है। समय भी सोचता है कि यह तो मेरे इंतजार में ही बैठा है, मैं इसके पास क्यों जाऊं? और जो समय को तत्काल पकड़ लेते हैं, क्षण को पकड़ लेते हैं, समय उनके अधीन हो जाता है।

 

जिन्दगी में कोई भी काम, कोई भी शौक, इच्छा, कामना को कभी भी किसी भी समय पूरा कर सकते हो, शक्ति का और उम्र का कोई लेना देना ही नहीं है। पांच साल के बच्चे में जितनी ताकत होती है, साठ साल के व्यक्ति में भी उतनी ही ताकत होती है। अन्तर केवल उत्साह का है। बच्चे में हर समय उत्साह होता है और वृद्ध में हर समय उत्साहहीनता होती है। मैंने तो कई युवाओं को बैठे ठाले समय का इंतजार करते देखा है और उनका समय कभी आता ही नहीं है। क्योंकि वे उत्साह से परिपूर्ण नहीं होते हैं, जहां उत्साह है वहां आनन्द को आना ही पड़ेगा।

 

इसलिये जो तुमने निश्‍चय कर लिया है, उसके लिये उम्र का, तथाकथित् सामाजिक मर्यादा का बहाना मत ढूंढ़ों, अपने आपको छलावे में डालने की कोशिश मत करो। सदैव याद रखो कि समय कम है और तुम्हें अपने मन के मुताबिक कई काम करने हैं। तो फिर इंतजार किसका कर रहे हो? कौन तुम्हें आज्ञा देने आएगा? कौन तुम्हें जबरदस्ती र्िीीह करेगा, धक्का देगा? कौन तुम्हें समझाने आएगा। कोई नहीं, बस तुम तत्काल समय को पकड़ लो और उसका उपयोग करो। जो भी करो पूर्ण उत्साह के साथ करो।

 

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नवरात्रि आ रही है, दीपावली आ रही है। उत्सव हैं तो उनको पूर्ण उत्साह के साथ पूर्ण रूप से उल्लासित होकर मनाओ। यह उत्सव का भाव, उत्साह और उल्लास का भाव कहीं दूसरी जगह नहीं मिलेगा, उत्साह का भाव, उत्सव का भाव उल्लास का भाव तो तुम्हारे अन्दर ही बैठा है। तुमने इसे दबा-दबा कर रख दिया है।

 

अपनी नकली गंभीरता में अपने मन के उत्साह भाव को तुमने दबा दिया है, खोलो, मन को खोलो। अब तो इस उत्साह को बाहर आने दो, इस उत्साह को अपने रोम-रोम से प्रकट होने दो। उत्साह आया तो निश्‍चित रूप से काया-कल्प हो जाएगा। तुम्हारी वृद्धता समाप्त हो जाएगी, जब मन में मुस्कान आएगी तो वह ऊपर उठते-उठते चेहरे पर भी अवश्य आएगी। 

 

सस्नेह आपका अपना

 

नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with loved ones …

Dear Loved one,

Divine Blessings,

Today I am penning some thoughts on mind –

It is more difficult to learn to stay silent than to speak; when we speak, all of our energy flows outwards; but when we remain silent or  listen, then certainly the energies of our inner thought  intensify. It is much more difficult to remain silent for two hours rather than speaking for two hours. You try and check it yourself, watch your inner-self by staying quiet, silently listen to the voice of your conscience, listen to others but without exhibiting any reaction.

At this point, we should study the relation and effect of two words – the first word is reaction (quick, immediate response  that occurred  involuntarily) and the second word is response (reply given after considerable thinking, thoughts, understanding and foresight). When we exhibit reaction, then generally we demonstrate animalistic (demonic) instincts, while during response, we act sensibly  (like the Gods and  warriors). Become responsible.

Our mind is the world’s largest filter which automatically  assimilates the finest thoughts and throws out the coarse thoughts; but it is necessary to stay silent for this. When we listen silently, then all your nerves, pores, eyes, skin, ears, all senses get active and we make thoughtful decisions after examining the justifications, benefit-cost analysis, possible future impact and  implications of the said issue; and you combine all your imbibed energies to arrive at a well thought of  decision. Speak only as much as is required, and choose your words very carefully. The effect of the word-arrow is highly acute, so do not try to injure anyone with your words. You should utilize your energies towards your own self development.

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What work do you perform? What is your goal? This is not important, rather the method and processes you used to achieve that goal is much more significant. Hence instead of the tool, the practical application is more important, i.e. the activities of the process are highly significant. This process is the bridge between you and your goal. You should obtain joy during the process. Why do most people appear  desperate, frustrated and sad in life? The only reason is that they do not obtain any joy in their work processes and activities. If you do not rejoice during your actions, then will you be happy even if you achieve your aims. We have to reach our goal, but we should also enjoy and savor every moment of our efforts strived towards achieving that goal. Even a simple act of breathing should be done delightfully; however  if you coerce yourself forcefully, then this joy will disappear from your life. You have to perform all the activities, and you should pour in joyfulness element into the process, the method, and the tasks. If you perform all tasks cheerfully, then the work will automatically get accomplished jubilantly.

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Your faith is your own asset (property), it is your most valuable possession, which you have imbibed in your mind. You were not born with this faith, and nobody has forced you to have faith. Trust is a very lovely feeling, which originates from very deep recesses of the heart and mind.

You know that this faith is more valuable than the duty, this is a priceless emotion. Take care of it at all times, preserve it cautiously. If your faith breaks due to someone’s opinion, or due to listening or seeing something, then this trust is very delicate. Such a moment can be very frightening. Your mind can get completely shattered on that day, and nothing will remain. Just as the inner-voice is completely private and cannot be overheard by anyone else, similarly, the sound of broken faith is also completely private, and it is possible that you may get completely crushed  at such a moment. This life should not get devastated, and so preservation and maintenance of faith is the elixir of life.

Faith has immense powers, there is no burden in faith, rather faith leads to clarity in mind, and reduces the load on mind. Faith is your personal sense, it accompanies you wherever you go. It will always stay with you. It is a very sweet sensation.

You body may get tired, obstacles may arise, but the faith never gets exhausted. It supplements and supports the body and the mind. Only the faith can extract you from the trenches of obstacles towards the joyous lake  of nectar.

Do you remember when you were alone? You were alone when this faith was not with you. Now you are not alone, wherever you go, whatever you do, this faith will accompany you. This conviction is your own image, it is a reflection of your own self, and this reflection is so resilient that nothing can damage it. You have adorned it from your feelings of each moment, decorated it, you have embellished it in full grandeur on a golden throne within the center of your mind. Your real ecstasy surrounds this trust.  The most joyous sensation is this – the feeling of faith.

Shraddhawaan Labhate Gyanam – The real value, the Providence resides in the faith.

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You keep on waiting for the opportune time, keep expecting it, but the strange fact is that that time never arrives. Whatever you are so impatient for, that time is running continuously in front of you. Neither impatience, nor endless wait; rather you just need to catch the current moment urgently. You have to bring it under your control, at this very moment.

Those who keep waiting for the opportune time, time doesn’t accord them any value. The “Time” also thinks that this person is waiting for my arrival, why do I go to him? And those who immediately clasp the time, catch the moment, the time becomes their slave.

You can perform any task in the life, fulfill any desire, wish or aspiration at any time, there is no relevance of power or age. The strength of a five-year-old child is similar to a person of sixty years age. The only difference is of enthusiasm. A child is always full of excitement and the elderly is full of indolence. I have seen many young people sitting idle waiting for the opportune time and their favourable time never comes. Because they lack enthusiastic drive; the joy has to come wherever the passionate excitement is.

Therefore, whatever you have decided, do not look for excuse in the form of age or so-called social conformance, do not throw yourself in an illusion. Always remember that the time is short and you have to accomplish many desirous tasks. Then what are you waiting for? Who will come to command you? Who will coerce you, force you, or push you? Who will enlighten you? No-one, you just need to catch the current moment and utilize it. Whatever you do, do it full-fledged enthusiasm.

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Navraatri is arriving, Diwali is arriving. Celebrate these festivals with full enthusiasm and gusto. You will not get this feeling of celebration, excitement and rejoicing elsewhere, these passions of celebration, the emotions of excitement, the sensations of joy are all residing within you yourself. You have strongly suppressed it.

You have suppressed your original sensations of excitement in this mock seriousness of your mind. Open this mind, free it. Let this excitement come out, let this enthusiasm fill each and every pore of your-self. This passion will certainly transform you. Your oldness will disappear, when the smile  enters your mind, it will also surely appear on your face.

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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