अपनों से अपनी बात – Nov 2015

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
तुम मेरी कुछ बातों को जान लो, समझ लो।

 

सबसे पहले तुम यह समझ लो, तुम निश्‍चय ही कुछ अलग हो, भीड़ का हिस्सा नहीं हो इसीलिये तो तुमने कुछ परम्पराएं तोड़ी हैं, तुम्हारे पूर्वज, बाप-दादा जिस पथ पर चले, उस पथ को छोड़कर तुमने गुरु का हाथ थामा है, तुममें कुछ बात अवश्य है इसीलिए तो तुम कोरी भक्ति का मार्ग छोड़कर गुरु शक्ति के मार्ग पर चल रहे हो। श्रद्धा उनमें भी थी और श्रद्धा तुम्हारे अन्दर भी है लेकिन तुम्हारी श्रद्धा तपस्या से युक्त है, इस श्रद्धा में दीनता-दासता नहीं। एक साहस का भाव है।

 

लोग कहते हैं कि जो साहसी और वीर होते हैं वे अपना मार्ग अलग बनाते हैं। शायद उन लोगों ने साहसी और वीर लोगों के बारे में ढंग से पढ़ा नहीं और समझा ही नहीं। साहसी और वीर उन मार्गों पर चलते हैं, जिन मार्गों पर चलकर लक्ष्य अवश्य ही प्राप्त हो जाए। साहसी और वीर लक्ष्यहीन मार्ग पर नहीं चलते, वे किसी का अंधानुकरण भी नहीं करते। वे अपनी मानसिक शक्ति से यह पहचानते हैं, यह निश्‍चय करते हैं कि मेरा मार्ग मुझे कहां ले जाएगा और क्या मैं उस मार्ग पर चल रहा हूं? जो मेरा लक्ष्य है। जब वे एक बार निश्‍चय कर लेते हैं तो वे उस पर अडिग रहते हैं, शायद इसीलिये संसार को लगता है कि उनके मार्ग में ज्यादा कठिनाईयां आती हैं।

 

जब निश्‍चय अटल होता है, सिद्धान्त अटल होते हैं, भावनाएं शुद्ध होती हैं, विचार तीव्र होते हैं, कर्म का आधार होता है तो लक्ष्य तो उन साहसी वीर लोगों को अवश्य ही प्राप्त होता है। कौन रोक सकता है, कौन झुका सकता है उन्हें?
इतिहास से केवल तुम सफलता और प्रेरणा की कहानियां मत पढ़ो, ये कहानियां बड़ी ही भ्रमित कर देने वाली हैं। सफल व्यक्तियों ने कष्ट उठाया है तो इसका मतलब यह नहीं है कि तुम भी उसी मार्ग पर चलकर कष्ट उठाओ। तुम विचार करो कि उनके जीवन में कठिन और दुःसाध्य स्थितियां क्यों आईं? कैसे आईं और कब आईं? और उन समस्याओं पर विजय पाने के लिये उन्होंने क्या निर्णय लिया?

 

तुम स्वयं अपना निर्णय लो और तय करो कि यदि मेरे जीवन में कोई दुःसाध्य स्थिति आ गई तो मैं उस परिस्थिति में कैसा निर्णय लूंगा। जब तुम्हारा निर्णय तुम्हारी सद्बुद्धि और स्वयं के विचार से युक्त होगा तो वह निश्‍चय ही तुम्हारे लिये सर्वश्रेष्ठ होगा। दूसरों की गलतियां दोहराना नहीं है, उन गलतियों से अपने मानस में शिक्षा लेनी है ताकि हम वे गलतियां न दोहराएं।

 

मैं कहता हूं कि इस जीवन में कभी अपनी तुलना दूसरों से मत करना कभी किसी से भी तुलना मत करना। जब तुम तुलना करते हो तो कभी किसी को छोटा, कभी किसी को बड़ा बना देते हो, किसी को सफल और असफल बना देते हो। मुझे बताओ क्या इस तुलना से तुम्हें कोई शिक्षा मिलती है?, कोई लाभ मिलता है? अथवा इस तुलना से तुम अपने आपको और अधिक कुंठित कर लेते हो, इसलिए तुलना तो बिल्कुल बंद कर दो।

 

तुम्हारे जैसा इस ब्रह्माण्ड में कोई नहीं है, तुम्हारे जैसा शरीर किसी के पास नहीं है, तुम्हारे जैसा मन किसी के पास नहीं है। तुम्हारे जैसे विचार किसी के पास नहीं हैं। जो तुम्हारे पास है, वह अद्वितीय है, अनोखा है और वह केवल और केवल तुम्हारा अपना है। न इसे कोई छीन सकता है और न कोई इसमें कुछ डाल सकता है। तुम अपने मन के अपनी देह के साम्राज्य के सम्राट हो।

 

इस देह रूपी, मन रूपी यज्ञ कुण्ड में विचारों की आहुति तुम्हें स्वयं डालनी है। अपने भीतर की अग्नि को तुम्हें स्वयं प्रज्वलित रखना है। अपने भीतर की प्रकाश ज्योति को तुम्हें स्वयं सूर्य बनाना है। न कोई देने आएगा और न कोई लेने आएगा। तुम्हारा भला इसी में है कि तुम स्वयं अपने जीवन के लिये, अपनी ज्योति के लिए जीवन रूपी यज्ञ कुण्ड में निरन्तर और निरन्तर ज्ञान आहुतियां डालते रहो और इसका फल भी सबसे अधिक तुम्हे ही प्राप्त होगा और तुम्हारा फल भी तुमसे कोई छीन नहीं सकता है।
तुम्हारी उन्नति केवल और केवल तुम्हारी अपनी है, तुम अपने पूर्वजों, बाप-दादाओं के नाम से नहीं अपने स्वयं के कार्यों से जाने जाओ। इस विचार को, इस दिशा को और इस लक्ष्य को सदैव ध्यान रखना। ‘अहम् ब्रह्मास्मि’ का मूल सूत्र यही है। तुम्हारे ही चारों ओर यह संसार चल रहा है। तुम केन्द्र बिन्दु हो, तुम ‘तत्वमसि’ हो।

 

मैं तुम्हें वर्ष में कई बार मिलने के लिये अवश्य बुलाता हूं, ये अवसर है गुरु पूर्णिमा, संन्यास महोत्सव, नववर्ष, महाशिवरात्रि और निखिल जयन्ति।

 

ये सभी अवसर शुभ्रता और नवीनता से युक्त है। इन अवसरों पर मैं खुलकर तुम्हें गले लगाता हूं और अपने हृदय के भावों को खोलकर तुम्हारे हृदय के भावों के साथ जोड़ देता हूं। सब प्रकार के मानसिक बंधन हटाकर गुरु-शिष्य की मिलन क्रिया के ये महापर्व हैं। इस बार गुरु पूर्णिमा पर जगन्नाथपुरी में तुम आए, तुम्हें भी प्रसन्नता हुई और मुझे भी।

 

गुुरु-पूर्णिमा के तुम्हारे अनुभव मुझे लिखकर अवश्य भेजना, तुम क्या सोचते हो और तुम्हारा स्वयं का आत्मिक अनुभव क्या है? वही भाव मुझे लिखकर भेजना। दूसरे क्या कहते हैं? उसकी चिन्ता छोड़ो, तुम्हारे स्वयं के जो भाव हैं वही मेरे लिये महत्वपूर्ण हैं।

 

दीपावली पर्व तुम अपने घर में मेरी वाणी के साथ मनाओगे। इस अवसर पर इस पर्व को पूरे उत्साह के साथ मनाना है, लक्ष्मी को अपने घर में स्थापित करना ही है। अपने घर को गुरु ज्योति से प्रकाशित करोगे तो उसके बाद भाटापारा, छत्तीसगढ़ अवश्य आ जाना। छत्तीसगढ़ भाटापारा में संन्यास महोत्सव की तैयारी धूमधाम से चल रही है। पूरा छत्तीसगढ़ मिलकर कार्य कर रहा है। तुम आने की कोशिश तो करो, थोड़ी कमी रहेगी तो सद्गुरु निखिल तुम्हें अपने आप खींचकर ले आएंगे। तुम्हारी अदम्य उत्कंठा, लालसा और भावना से मेरा हृदय सदैव हर्षित हो जाता है।

 

मैं जानता हूं कि तुम मेरे पास बार-बार आना चाहते हो और जब तुम स्वयं आना चाहते हो तो कोई लाख कोशिश कर ले, तुम्हें रोक नहीं सकता है। मैं बार-बार कह रहा हूं कि तुम उन पगडंडियों पर चलने के लिये बने ही नहीं हो जो तुम्हारे पूर्वजों ने बनाई है। तुम किसी का अनुसरण कर नहीं सकते हो, तुम्हारे भीतर एक स्वतंत्र बुद्धि, स्वतंत्र विचार, स्वतंत्र भावना, स्वतंत्र व्यक्तित्व है। जिस दिन तुमने इस बात को जान लिया, समझ लिया उस दिन कोई तुम्हें रोकने का साहस भी नहीं कर सकेगा। तुम खुद भी मेरे पास आने से अपने कदमों को रोक नहीं पाओगे।

 

इसीलिये मैं केवल यह कह रहा हूं कि तुम्हें नववर्ष की पूर्व संध्या (26-27 दिसम्बर 2015) पर आरोग्यधाम दिल्ली एक विराट् विशाल जीवन यज्ञ, आत्म यज्ञ – महाबोधि तत्वमसि उत्सव में अपनी आहुति देने के लिये, अपने स्वयं के क्रिया तत्व को जाग्रत करने के लिये, जीवन के तत्व ज्ञान को अपने भीतर रोम-रोम में बसाने हेतु ‘तत्वमसि तत्व’ के बोध एवं जागरण हेतु दिल्ली आना ही है।
तुम तत्व हो, तुम केन्द्र बिन्दु हो, तुम्हारा स्वयं का स्वतंत्र अस्तित्व है।

 

तुम्हारा और मेरा सम्बन्ध तो शाश्‍वत् है, मेरा विचार है –

 

मोतियों को तो बिखर जाने की आदत है लेकिन
धागे की जिद्द होती है, पिरोए रखने की….
होने वाले खुद ही अपने हो जाते हैं
किसी को कहकर अपना बनाया नहीं जाता

 

तुम गुरु हृदय हार के मोती हो, सदैव खुश रहो…।

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with loved ones…

Dear loved one,

You ought to carefully discern some of my messages and understand them.

 

First you should understand that you certainly are different, you are not a part of the crowd, therefore you have broken some traditions; you have discarded the path of your fathers and ancestors and have choosen to hold your Guru’s hand. There is certainly something in you, as you have forsaken blind devotion to progress on Guru Shakti path. They were full of faith, and you also have a lot of faith,  but your faith is intermingled with austerity, there is no humility-slavery in this faith. There is a sense of courage.

People say that the courageous and brave chalk out their own path. Probably they have not read or understood properly about those courageous heroes. The courageous and braves tread the path which leads to goal accomplishments. They do not take the routes which lack objectives, and they do not blindly follow anyone. They recognize through their mental powers, they choose the destination which the path will lead to, and ascertain whether they are on the correct path towards their goals. Their resolution is always firm, once they have decided. Perhaps, this is what makes others feel the quantum of their difficulties.

When the decision is irrevocable, the principles are irrevocable, the emotions are  pure , the thoughts are intense, action is the base foundation; then those brave heroic individuals certainly achieve their targets. Who can stop them,  what can falter them?

Do not study just the stories of success and inspiration from history, these stories will create confusion. The successful personalities have undergone sufferings, this does not mean that you face similar obstacles by treading the same path. You should consider the causes for those difficult and arduous circumstances in their lives. And what did they decide to overcome those problems?

You make your own decision and decide that if I face a similar crucial situation in my life, then what will my decision be. When your decision is intermixed with your own wisdom and ideas, then it will certainly be the best choice for you. Do not repeat mistakes made by others, our psyche has to learn from their mistakes, so that we do not repeat them ourselves.

I state that in this life, do not compare yourself with others, do not ever do comparisons. When you start comparisons, then you label someone as younger, or someone else as bigger, you label someone as successful or a failure. Tell me, do you get any learnings from these comparisons. Do you gain anything? On the contrary, you only increase your frustrations with these comparisons, so you should completely stop making these comparisons.

There is no one in the entire universe like you, no one has a body like yours, no one has a mind like yours. No one else thinks same thoughts as you do. Whatever you have got, is unique, is distinctive, and it is yours and only  yours. No one can snatch it from you, and no one can add anything to it. You are the king of the realms of your mind, and your body.

You yourself have to insert the oblations of ideas into this physical-mental form of sacrifice fire.  You have to keep ignited your inner flame. You have to transform the light of your inner self into a blazing sun. No one will come to give you anything or to take anything away from you. You yourself should continuously and steadily insert the oblations of knowledge into the sacrifice fire of your life, your light; for your own good; and you will obtain most of the fruits of these labors, and no one can snatch these fruits from you.

Your progress is yours and yours only, you will not be known through the names of your ancestors, rather you will be known for your own achievements. Always remember these thoughts, these directions, and these objectives. This is the basic formula of “Aham Brahmasmi”. This entire world is moving around you. You are the central locus, your are the “Tatvamasi”.

I certainly invite you several times in the year to meet me, these opportunities are Guru Poornima, Sanyas Mahotsava, New Year, MahaShivraatri and Nikhil Jayanti.

All of these occasions are full of pureness and novelty. On these occasions,  I openly embrace you freely and open my heart expressions to merge them with your heart expressions. These are the Mahaparvs (grand festivals) for Guru-disciple union after removal of all kinds of mental bondages. You came this year on Guru Poornima to Jagannathpuri, you rejoiced and so did I.

You must write and send me your experiences during Guru Poornima, what did your feel and what is your own spiritual experience? Send these sentiments to me. What do others say? Stop worrying about that,  your own feelings and emotions; those are most significant for me.

You will celebrate Deepawali festival in your house with my voice. You have to celebrate this occasion with full enthusiasm and fervor; you have to setup Lakshmi in your home. After brightening  your home with Divine Guru light, you should surely come to Bhatapara, Chhattisgarh. The preparation of the Sanyas Mahotsava is going on with full splendor in Chhattisgarh Bhatapara. The entire Chhattisgarh is working together. You should at least try to come; if there is any lapse, SadGuru Nikhil will Himself drag you. My heart always rejoices at your irrepressible longing, yearning and feeling.

I know that you want to come to meet me again and again, and when you yourself wish to come, then no one can stop you even if they try a million attempts. I repeatedly urge you that you are not meant to run on those old, worn-out tracks which your ancestors created. You cannot blindly follow someone, you have an open mind, free thoughts, liberated spirit and an independent personality inside you. The day you understand this, comprehend this, from that day, no one will dare to stop you. You yourself will not be able to stop your feet from walking over to meet me.

Hence I am only urging you that you have to certainly come to Delhi on the New Year’s Eve (26 to 27 December 2015) at the Arogyadham, Delhi on to give your own oblations into the majestic, magnificent life Yagya, Aatma Yagya – Mahabodhi Tatvamasi Utsava , to activate your own Kriya-tatva, to imbibe the Tatva knowledge of life within each pore and vessel of your body,  to realize and awaken “Tatvamasi Tatva”.

You are the Tatva (element), you are the focal point, you have your own independent existence.

Yours and my relationship is an eternal one, I think so –

The pearls have an instinct to scatter out, but

The thread insists to be bound together …

Our owns automatically become ours

None can become ours through a bidding

 

You are the pearl of the Guru heart necklace, always stay happy ….

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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