अपनों से अपनी बात – May 2016

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

तुम मुझसे मिलने आते हो, कुछ देर मेरे पास बैठते हो, कुछ अपनी बात कहते हो, कभी तुम दीक्षा प्राप्त करते हो। यह सब क्रिया एक सजीव जीवन्त क्रिया है। इसी क्रिया को गुरु-शिष्य सम्बन्ध कहा गया है।

गुरु शिष्य सम्बन्ध एक जीवन्त क्षण है, उस जीवन्त क्षण को अपने भीतर उतारना ही शिष्यत्व है, गुरु की प्राप्ति है, गुरु के साथ मिलन है। जीवन्त गुरु का अर्थ क्या है? जिसकी उपस्थिति में तुम्हारे भीतर कुछ हल-चल मच जाएं, तुम्हारे भीतर कुछ उथल-पुथल होने लगे, तुम्हारे भीतर का भाव बाहर आने के लिये तत्पर हो जाएं। जहां तुम पूर्ण समर्पण के लिये, पूर्ण प्रेम के लिये अपने आपको तैयार कर दो, वही तो जीवन्त गुरु का अर्थ है।

क्या गुरु का हर समय बोलना आवश्यक है? क्या गुरु को हर समय आदेश देने चाहिए? क्या गुरु को हर समय अपने शिष्य को दिशा निर्देशित करना चाहिए? क्या गुरु को निरन्तर और निरन्तर मार्ग दर्शन करना चाहिए, नहीं। जीवन्त गुरु की उपस्थिति में जिनके मौन से ही तुम्हारे भीतर कुछ होने लग जाएं, जिनके नेत्रों से तुम्हारे हृदय में धड़कन तीव्र होने लगे, जिनकी उपस्थिति से तुम्हारा मन पुनः शांत होने लगे तब तुम जीवन्त गुरु के पास उपस्थित हो।

मैं दीक्षा प्रदान करता हूं, तुम्हारे मस्तक पर हाथ रखता हूं, तुम्हें अपने पास बिठाता हूं तो मेरी बात भी आज तुम अच्छी तरह से समझ लो।

प्रथम, तुम्हारे इस साधना जीवन में कर्म ही प्रधान है। तुम्हें निरन्तर कर्म करना है। पुस्तकों से तुम जो जानकारी प्राप्त करते हो, वह निर्बीज होती है। उससे कोई भीतर कल्पवृक्ष नहीं उगता है। जबकि ज्ञान सबीज है, उस ज्ञान के माध्यम से तुम्हारे भीतर एक कल्पवृक्ष का वट्वृक्ष बन सकता है। तुम्हारे रोम-रोम में आह्लाद भर सकता है।

पुस्तकों से केवल जानकारी प्राप्ति होती है, घपेुश्रशवसश (नॉलेज) प्राप्त होता है। तुम अपने हर नॉलेज को ज्ञान मत समझ लेना। गुरु के शब्द ही तुम्हारे भीतर ज्ञान का मार्ग खोलते है। ज्ञान के आधार पर तुम अपनी जानकारी का सदुपयोग कर सकते हो। इसलिए केवल जानकार मत रहो, ज्ञानी बनने का प्रयास तो करो।

तुम बहुत भक्ति करते हो लेकिन यह भक्ति उन्माद भाव से युक्त नहीं हो, यह यर्थाथ भक्ति नहीं है यह तो केवल अपनी शक्ति को बाहर भेजने की क्रिया है। भक्ति वह है, जो तुम्हें भीतर की ओर ले जाएं, इसलिये सदैव वास्तविक ज्ञान और वास्तविक भक्ति के मार्ग पर चलते रहो और हां! इतना अवश्य याद रखना, इसका विकास कर्म के द्वारा ही होता है। केवल गुरु कृपा, ईश्‍वर कृपा पर निर्भर रहना, सुविवेक का कार्य नहीं है।
गुरु कृपा तो अत्यन्त पवित्र वस्तु है और यह कृपा निरन्तर ही निरन्तर ईश्‍वरीय शक्ति से प्रवहित हो रही है। कृपा के बिना साधक के जीवन में उर्ध्वगति का कोई दूसरा मार्ग नहीं है लेकिन कर्म के बिना कृपा की पवित्रता को धारण नहीं किया जा सकता। कर्म से ही असाध्य साधन हो जाता है। सदैव याद रखो, कर्म का अर्थ है – क्रिया शक्ति।

किसी को अपनी नित्य क्रिया में कुछ दर्शन होता है, कुछ आभास होता है। यह सब प्रत्येक साधक के अलग-अलग संस्कारों पर निर्भर करता है। उन दर्शनों की विविधता की ओर मत जाओ। यह खेल तो चलता ही रहता है। अनुभव होते ही रहते है और प्रत्येक व्यक्ति के लिये अलग-अलग अनुभव है। अपने अनुभव की तुलना दूसरे के अनुभव से मत करो। अपने लक्ष्य की ओर, अपनी शक्ति से सदैव दृष्टि बनाएं रखो।

शनैः शनैः पर्वतलंघनम्

धीरे-धीरे जो होता है, वही ठीक है, वही शुभ है, वही शिवत्व है। शीघ्रता से किसी विशिष्ट भाव का विकास  बहुधा अच्छा नहीं होता है। शनैः शनैः ही तुम्हारे भीतर की पूर्ण सत्ता जाग्रत होगी। यह महान् क्रिया भी शनैः शनैः घटित होती है। मैं तुम्हें उपासना के पथ पर, साधना के पथ पर ले जाता हूं। वास्तव में उपासना-साधना एक उच्च आदर्श का अनुसरण है। सभी देवी-देवता, सभी शक्तियां उस महा आदर्श का बाह्य प्रकाश है। मूल में सभी एक ही ईश्‍वरीय शक्ति का विस्तार स्वरूप है लेकिन इस ईश्‍वरीय शक्ति को, अपनी आत्म शक्ति को अनुभव करने के लिये अपने इष्ट भाव, गुरु भाव में तुम्हें दृढ़ रहना चाहिए।

तुम प्रयास करते हो, कर्म को बदलने का, बदल ही नहीं सकते। बदलना है – अपने स्वभाव को। अपने भीतर के भाव को, स्वभाव बदलोगे तो कर्म अपने आप बदल जायेगा।

मूलतः कर्म का अर्थ है – स्वभाव। आपके भीतर जो आपका स्वयं का भाव है, वह सदैव-सदैव आपके पास रहता है। न इसे कोई दे सकता है, न इसे कोई ले सकता है। कर्म के दोष मिटाने का उपाय है, स्वभाव में परिवर्तन करना।

मैं तुम्हें तुम्हारे वास्तविक स्वभाव को तुमसे मिलाने के लिये ही तुम्हारे जीवन में जुड़ा हूं। भाव परिवर्तन की यह क्रिया एक दिन में घटित नहीं होगी, इसके लिये समय लग सकता है लेकिन इसकी भूमि, उसकी भावभूमि तुम्हें तैयार करनी पड़ेगी। तब अपने आप तुम्हारे भीतर ज्ञान बीज का अंकुरण हो जायेगा। अभी तो तुम अपनी भाव भूमि स्वच्छ बनाओं, उसे साधना रूपी खाद देते रहो, उसे ज्ञान तत्व के द्वारा उर्वर बनाओं। समय आने पर फसल अपने आप तैयार हो जायेगी।

आज मैं तुम्हें अपने मन की बात कहूं – गुरु का न तो कोई आदेश होता है और न ही कोई आज्ञा। बाहर से दिया गया कोई आदेश और आज्ञा तुम्हारे ऊपर वजन डालने के समान हो जायेगी। आदेश और आज्ञा, और उससे क्रिया की उत्पत्ति तुम्हारे भीतर अपने-आप तुम्हारी चेतना और गुरु शक्ति-कृपा से अंकुरित होती है, चैतन्य होती है। मेरे लिये कुछ शब्दों का कहना, हर समय, हर स्थिति में आवश्यक नहीं है।

यदि तुम एक क्षण के लिये भी यह अनुभव करते हो कि – गुरु तुम्हारे पास है तो वह क्षण तुम्हारे लिये सबसे अधिक आनन्द का क्षण है। उन क्षणों को संजोकर के रखना, उन क्षणों को जोड़ते-जोड़ते तुम्हारे पास आनन्द और ज्ञान की पूंजी बन जायेगी और तुम्हारा ‘स्व’ का भाव कालजयी ‘स्वभाव’ बन जायेगा, तब तुम्हारे वचन कालजयी हो जायेंगे।

सद्गुरुदेव निखिल सदैव एक बात कहा करते थे और उन शब्दों से मुझे हर समय ताकत प्राप्त होती है। यही शब्द सारे शिष्यों के लिये भी है – ‘‘तुम्हें किसी विषय में चिन्ता नहीं करनी चाहिए, मैं सदा ही तुम्हारे निकट हूं और रहूंगा। ठीक तरह से कर्म करने पर ही यह बात समझ सकोगे और किसी भी विषय में तुम्हें कोई अभाव-बोध होगा ही नहीं…’’

बस निश्‍चिन्त रहो…, सद्गुरु का स्मरण करते रहो… अपने भीतर उन्हें अनुभव करो, वे तुम्हारे साथ विद्यमान है….।

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली

Dialog with loved ones…

Dear Loved One,

Divine Blessings,

You come to meet me, sit besides me, discuss about your issues, and sometimes you obtain Diksha initiation. All of this is a living active process. This process is termed as Guru-disciple relationship.

Guru-disciple relationship is a vital lively moment, imbibing that moment of aliveness within yourself is the disciple-hood, realization of Guru, merger with the Guru. What does an alive Guru mean? In presence of Whom, some turbulence starts within yourself, some turmoil-upheaval commences within you, your inner senses get ready to radiate out. Where you prepare yourself for complete surrender-dedication, become ready for total love, this is the meaning of a living Guru full of aliveness.

Is it necessary for the Guru to speak all the time? Should the Guru always give orders and commands? Should the Guru always guide the disciple in the sadhana camp? Should the Guru always continue to mentor and guide all the time, No! In the presence of an alive living Guru, Whose silence itself triggers agitation within you, the gaze of Whose eyes increases your heart beat, in Whose presence, Whose appearance grants peace and calmness to your mind, then you realize that your are in the benign company of a living Guru full of aliveness.

I grant your Diksha, place my hands on your forehead, let you sit besides me, then you should comprehend my advice properly.

First, the actions are the primary basis of this Sadhana life, you have to constantly keep on doing work. Whatever knowledge you gather from the books, that is a dead knowledge. It does not cause any germination of transforming Kalpvriksha within you. On the other hand, the wisdom is a living entity, this wisdom can transform the Kalpvriksha within you into a blossoming banyan tree. It can grant joy to each atom of your self.

Books can only furnish information, they can only provide knowledge. Do not misinterpret this knowledge as wisdom. The divine words of Guru open the doors of wisdom and enlightenment within you. You can utilize your knowledge on the basis of this wisdom. So do not just remain knowledgeable, at least try to become wise.

You worship a lot, but this worship is not filled with the frenzy of devotion, this is not the real worship, it is just a process of channelizing out the energy. The real worship and devotion is the one, which motivates you to travel inside, so always tread on the path of real wisdom and real worship and yes! Always remember that this can develop only through work and Karma actions. Staying solely dependent on Guru blessings or grace of God is not wise or prudent.

The grace of Guru is a very sacred object and this grace is continuously flowing from the power of the divine Providence. There is no alternative to Guru’s grace for upliftment of a Sadhak’s life, however one cannot adorn the holy grace in absence of karma actions. The actions convert impossible into possible. Always remember, the meaning of Karma is –  the power of action.

Some see miracles in their routine-life, and sense some divine miraculous actions. This all depends on the values and virtues of each Sadhak. Do not study the diversity of these miracles. This process will continue. Divine experiences will keep occurring, and each person has a different experience. Do not compare your experiences with experiences of others. Always stay focussed on your target goal, through your energy.

 

Slowly and Steadily Climb the Mountain

ShaneH ShaneH Parvatlanghanam

 

Whatever happens slowly, that is right, that is good, that is Shivatav. Generally a quick growth of any specific sense is not right. The divinity within you will develop only gradually. This magnificent process also occurs slowly and steadily. I lead you on the path of worship, on the path of Sadhana. In reality, the Worship-Sadhana is an ideal model spiritual path. All Gods-Goddesses, all supernatural powers are outer manifestations of that divine ideal power. Basically, everything is an extended profile of the divine energy, but you should always remain focussed and concentrated in the divine sense, in the Guru sense, to experience this divine power, to realize the power of self.

You keep on trying, to alter the karma actions, you cannot change them. You need to change – your attitude-nature. If you modify your inner sense, your basic attitude, then the karma actions will change automatically.

Karma basically means – attitude-nature. Your own inner-self within you, it always stays with you. Neither can anyone give it to you, nor can anyone take it from you. The method to remove and purge the malefic effects of karmas is  – changing the attitude.

I am connected with your life to unite you with your basic real attitude and nature. This process of altering the attitude will not complete in one day, it may take time, but you yourself will have to prepare the foundation, the ground for this to happen. The seed of wisdom will automatically germinate within you. You should now purify the foundation of your senses, keep on enriching it with Sadhanas, fertilize it with the wisdom-element. In due course of time, it will be ready to harvest.

Today I speak to you from my mind –  the Guru neither issues any command nor give any order. Any outer command or order will add a weighty burden to you. The commands and actions, leading to future work actions, sprout automatically from your inner consciousness and Guru-power-grace, gets strengthened. It is not necessary for me to speak a few words, all the time, in each situation.

If you feel even for a moment that –  Guru is with you, then that moment is the most joyous moment for you. Keep cherishing those moments, steady addition of these moments will create a treasure cove of wisdom and joy for you, and your “self” spirit will permanently change into “attitude-nature”, then your words will become divine portents.

SadGurudev Nikhil always used to state one point and I always get strength from those words. I am repeating those words for all disciples – You should not worry about any issue, I am always with you, and will always stay with you. You will be able to properly grasp and understand this fact only by performing the right action karmas, and you will never feel ignorance or privations about anything…”

Always be certain …, keep SadGuru in your thoughts … keep experiencing Him within yourself, He is always with you …

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

Share
error: Content is protected !!