अपनों से अपनी बात – June 15

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
शुभाशीर्वाद,
निखिल जयंती के शुभ अवसर पर पटना में विशेष ‘जन्मोत्सव साधना शिविर’ कार्यक्रम सम्पन्न हुआ। कड़ी धूप, भीषण गर्मी के बीच बिहार के कार्यकर्त्ताओं ने एकजूट होकर कार्य किया, उन सभी कार्यकर्त्ताओं को बहुत-बहुत आशीर्वाद। इस बार 21 अप्रैल को पूरे भारतवर्ष में सभी स्थानों पर जहां भी सिद्धाश्रम साधक परिवार की छोटी से छोटी इकाई थी वहां सामूहिक पूजन सम्पन्न हुआ। सब जगह से मुझे 21 अप्रैल को सुबह से ही संदेश प्राप्त हो रहे थे। एक ओर जहां उनका पूजन चल रहा था और दूसरी ओर वे मुझे पल-पल अपडेट करने के लिए मुझको फोन कर रहे थे कि गुरुदेव यहां पर हम दो सौ – तीन सौ साधक एकत्र होकर सामूहिक पूजन कर रहे हैं। आप फोन पर ही दो मिनट आशीर्वचन बोलिए। सुबह दस बजे से, शाम के पांच बजे तक बीस से अधिक स्थानों के सिद्धाश्रम परिवारों के साधकों को मैंने फोन पर ही संबोधित करते हुए आशीर्वाद दिया और थोड़ा सा प्रवचन भी दिया, उनके कल्याण के लिए प्रार्थना की और जब दो-तीन, चार सौ शिष्यों की एक साथ ‘सद्गुरुदेव की जय’ मेरे कानों में पहुंची तो मुझे आप पर गर्व होने लगा। मैं यह समझता हूं कि हमारा यह संगठन श्रेष्ठतम स्वरूप को प्राप्त करने की ओर अग्रसर हो रहा है।
जहां-जहां भी सामूहिक पूजन, सामूहिक साधना इत्यादि का कार्यक्रम होता है तो मैं एकत्र साधकों को फोन द्वारा दो शब्द अवश्य कहता हूं। मानसिक रूप से हर समय मैं आपके साथ ही हूं और आप भी मेरे साथ हो, लेकिन शाब्दिक रूप से जब मैं आपकी वाणी सुनता हूं, जयघोष सुनता हूं तो मेरा सीना गर्व से चौड़ा हो जाता है। मुझे इस बात की खुशी होती है कि सद्गुरुदेव ने जो बीज रोपे थे वे बीज आज वटवृक्ष बन गये हैं और वे इतने सामर्थ्यवान हो चुके हैं कि वे अब औरों को भी आसरा देने के लायक हो चुके हैं। उनकी छाया में कई ओर लोगों को साधना का, मंत्र का, यज्ञ का आनन्द प्राप्त हो रहा है।
एक व्यक्ति ने मुझसे प्रश्‍न किया कि – मैं जीवन में श्रेष्ठ साधक और श्रेष्ठ शिष्य बनना चाहता हूं, इसके लिये मैं क्या करूं? ऐसी कौन सी विधि है जिससे मैं श्रेष्ठ व्यक्तित्व बन सकता हूं? निखिल पथ पर निरन्तर आगे बढ़ सकता हूं। गुरु के ज्ञान को और अधिक विस्तारित करना चाहता हूं। मैंने कहा कि – ‘तुम्हें शिष्य और साधक बनने के लिये तीन क्रियाएं अवश्य ही करनी पड़ेंगी, ये तीन क्रियाएं हैं – 1. निहंकारी, 2. संशय विहीन और 3. श्रद्धावान। 
इस जगत में सभी व्यक्ति यह भ्रम पाले हुए हैं कि उसके पास बहुत कुछ है और साथ ही कुछ व्यक्तियों को यह भ्रम है कि उनके पास कुछ भी नहीं है। ये दोनों बातें एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। यह अहंकार कि ‘मैं बहुत कुछ हूं’ और दूसरी यह निराशा की भावना, उदासीनता की भावना कि ‘मेरे पास कुछ नहीं है’, ‘मेरा कुछ नहीं है’ और ‘मेरा कुछ नहीं हो सकता है’ मानस के एक झूठे अहंकार का ही स्वरूप है। हमें सबसे पहले अपने निराशा के भाव को पूर्ण रूप से समाप्त कर देना है। अहंकार का त्याग निरन्तर अपनी भावना शक्ति को प्रबल कर ही संभव हो सकता है।
दूसरी मूल बात अपने संशयों का नाश कर देना है। जीवन में दो मार्गों को चुनने वाला अर्थात् कभी बायें जाने वाला, कभी दायें जानेे वाला अपने लक्ष्य पर नहीं पहुंचता है। किसी भी लक्ष्य को पाने के लिये एक ही उपाय है और वह है – ‘निरन्तर एक ही मार्ग पर गतिशील बने रहना’, जिससे लक्ष्य पर निश्‍चित रूप से पहुंचा जा सके। लेकिन जब व्यक्ति भ्रम का शिकार होता है, उसके मन मे संशय रहता है तो उस स्थिति को ‘मतिभ्रम’ की स्थिति कहा गया है। ‘मति’ का तात्पर्य है – बुद्धि और जब बुद्धि में भ्रम आ जाता है तो किसी भी प्रकार का कार्य सिद्ध नहीं होता है। अपने जीवन को पूर्णता से जीना है तो सारे संशयों का नाश करना अति आवश्यक है।
तीसरी मुख्य बात पूर्ण श्रद्धा से युक्त होकर ही गुरु से मिलन हो सकता है। अश्रद्धावान व्यक्ति अपने जीवन में किसी भी कार्य में सफल नहीं हो सकता है। श्रद्धा से ही भाव की उत्त्पत्ति होती है और भाव से ही शक्ति की उत्पत्ति होती है। अपने कार्य में श्रद्धा, गुरु में श्रद्धा, सच्चा, शिष्य, साधक बनने के लिये परम आवश्यक है।
इन तीन बातों को नित्य-प्रति अपने जीवन में दोहराना है। जिस प्रकार बर्तन को नित्य-नित्य स्वच्छ रखने के लिये उसे नित्य मांझना पड़ता है, धोना पड़ता है, उसे चमकाना पड़ता है। उसी प्रकार जीवनरूपी पात्र को भी नित्य स्वच्छ करना आवश्यक है। इसके लिये अपने अहंकार पर आप स्वयं शासन करें। अहंकार आप पर हावी न हो, आप अहंकार पर हावी होकर अपने मन पर सवारी करें इसी से आपके जीवन में नम्रता और शांति आती है।
पिछली बार मैंने लिखा था कि आप क्या-क्या कार्य अपने लिये अर्थात् गुरु के लिये  सम्पन्न कर सकते हैं। दोनों बातें एक ही हैं। जो कार्य आप अपने लिये कर रहे हैं वह गुरु का ही कार्य है। पांच कार्य जिसमें प्रथम है – देह से सेवा, दूसरा है – धन से सेवा, तीसरा है – सांसारिक सम्बन्धों से सेवा, चौथा है – बुद्धि और मन से सेवा और पांचवा है – अपनी छठी इन्द्रिय से सेवा। आज विचार करें कि अपने शरीर के प्रति, अपने जीवन के प्रति, अपने धर्म के प्रति, अपने राष्ट्र के प्रति, अपने गुरु के प्रति इन पांचों माध्यमों से आप क्या-क्या सेवा सम्पन्न कर रहे हैं। ईश्‍वर ने तो अपने मुक्त हाथों से ये पांचों शक्तियां सभी प्राणियों को समान मात्रा में प्रदान की हैं? इनका उपयोग करते हुए, जीवन सेवा के मार्ग पर आगे बढ़ेंगे तो पल-पल नवीनता का अनुभव होगा और सबसे बड़ी बात है कि आपको संतुष्टि प्राप्त होगी। यह भाव उत्पन्न होगा कि मेरा जीवन भी सार्थक है। मैं इस जीवन में कुछ श्रेष्ठ कर रहा हूं और इन श्रेष्ठ कार्यों द्वारा गुरु और ईश्‍वर का आशीर्वाद मुझे अवश्य ही निरन्तर प्राप्त होगा।
निष्काम भाव से सेवा कार्य करो, सेवा कार्य के लिये किसी दूसरे की प्रतीक्षा मत करो। कोई ओर आपको उपदेश देने नहीं आयेगा। आपको किसी ओर की प्रशंसा की आवश्यकता नहीं है। गुरु तो आपके हृदय में, आपके मन में स्थापित हैं, वे नित्य-नित्य देख रहे हैं और आप स्वयं नित्य-नित्य अनुभव भी कर रहे हैं। कोई क्षण ऐसा नहीं होता है कि गुरु आपसे अलग हैं और आप गुरु से अलग हो।
आज मैं आपको स्पष्ट तौर पर आदेश देता हूं कि आप सभी को अपने ईष्ट मित्रों सहित गुरु पूर्णिमा के शुभ अवसर पर 30-31 जुलाई 2015 को जगन्नाथपुरी, उड़ीसा अवश्य आना है। एक और बात, आपको अकेले नहीं आना है, अपने परिवार को भी लेकर आना है। इससे भी अधिक आवश्यक बात आपका परिवार, आपके स्थान का सिद्धाश्रम साधक परिवार संगठन है। आप सबको एक साथ आना है। तीन दिन भगवान जन्ननाथ अर्थात् जगत के स्वामी श्रीकृष्ण के साथ आनन्द महोत्सव के रूप में सम्पन्न करने हैं। गुरु आपके साथ अवश्य हैं, सद्गुरु निखिल अवश्य हैं।
एक विशेष संदेश सदैव याद रखिये, भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि – ‘जहां सभी लोग मेरे नाम से प्रेरित होकर एकत्रित होते हैं मैं वहां पर अवश्य विद्यमान होता हूं।’
आप भी सद्गुरु निखिल का नाम लेकर जगन्नाथ पुरी में उपस्थित होंगे तो वहां सद्गुरुदेव निखिल से आपका मानस मिलन अवश्य होगा।
जीवन में पल-पल आपको आनन्द मिले, इस जीवन में हर क्षण खुशी की आनन्द लहरें प्रवाहित हों और गुरु शिष्य मिलन होता रहे… ये ही मेरी शुभकामनाएं हैं…।
सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Speak with loved ones …

Dear loved one,

Divine Blessings,

 

A distinctive “Janamotsav Sadhana Camp” was organized in Patna on the auspicious occasion of Nikhil Jayanti. The volunteers of Bihar worked collectively under scorching sun and sweltering heat, many, many blessings to these volunteers. This time, on 21st April, collective worship was performed, even in the smallest unit of Siddhashram Sadhak Parivar, within the entire India. I was receiving messages from everywhere, from the morning itself of 21st April. While the poojan was taking place, they were sending me updates of each moment; and requesting  that we two hundred – three hundred sadhaks are performing collective poojan, please bless us on phone for couple of minutes. From 10 am in the morning to 5 pm in the evening; I addressed more than 20 groups of Siddhashram Sadhaks at various locations, blessed them on phone, gave a small discourse, prayed for their welfare; and when the collective “SadGurudev Ki Jai” hail of two, three –four hundred sadhaks reached my ears, I felt proud. I realize that our organization is progressing towards a magnificent format.

Wherever the programs of collective worship, collective Sadhana are organized, I speak a few words to the collected disciples on phone. I am with you at all times mentally, and you are with me; but when I literally hear your voice, hear the hailing, then my chest swells with pride. I feel happy that the seeds sowed by SadGurudev, have now turned into dense trees, and they have achieved the capability to provide shelter to others. Many more people are obtaining the joy of Sadhanas, mantras and yagyas in their shade.

A person questioned me – I want to become the best Sadhak and best disciple in life, what should I do to accomplish it? How can I obtain the best personality? How do I move forward on the Nikhil path. I wish to expand  the divine knowledge of Gurudev. I advised that – you will certainly have to perform three activities to become a disciple and a sadhak, and these three activities are – 1. Be Egoless, 2. Develop Unflinching Trust and 3. Continuous Devotion.

Everyone in this world nurtures the illusion that he has many possessions and some other individuals have the illusion that they have nothing. Both of these are two sides of the same coin. The ego that “I am very important” and the reverse sense of hopelessness and apathy that “I have nothing, I am nothing and I cannot achieve anything” reflect expression of an incorrect ego in the psyche. We should first completely eliminate our feeling of disappointment. The reduction of ego is possible only by continuous strengthening of willpower.

The second basic fact is to destroy our doubts. A person with a wavering indecisive mind, one who keeps selecting either left or right route; does not reach his target. There is only one method to achieve the goal and that is – “Continuous progress on the same path”, to achieve the target with full guarantee. But when the person remains confused, his mind stays skeptical, then that situation is called as “delusional” state. The mind means – intellect and when the intellect gets confused, then one cannot complete any task. One should destroy all doubts to lead a perfect life.

The third main point is that one can merge with Gurudev only with full faith. A wavering person cannot be successful at any task. The faith generates a sense of reverence and the energy is produced from reverence. Confidence in the tasks, trust in Guru, is absolutely essential to become a true Sadhak, and disciple.

You need to regularly repeat these three things in your life. As the pot needs to be regularly scrubbed, washed, and polished to remain clean. Similarly, this vessel of life also needs to be regularly cleaned. You need to rule over your ego to achieve this. The ego should not dominate you, you should overcome your ego to ride on your mind. This will result in gentleness and calmness in your life.

Last time I wrote about the activities which you may perform for yourself or for Gurudev. Both topics are the same. Whatever actions you perform for yourself, that is all Guru’s work. Five functions i.e. first- physical service through the body, second- service through money, third – service through worldly relations, fourth – service through intellect and mind, and fifth – service through your sixth sense. Reflect today, what type of service are you providing through these five mediums to your body, your life, your religion, your country and your Gurudev? God has abundantly gifted these five powers to all beings in similar measure. If you progress forward in the serving life, using these, then you will experience joy in each moment and the biggest benefit is that you will achieve satisfaction. You will get a sense that my life is also meaningful. I am doing something great in this life and I will constantly receive blessings from the Guru and God through these great tasks.

Perform selfless service, do not wait for someone else before acting. No one will come to preach. You do not require praise from anyone else. Guru is ever-present in your heart and mind, He is watching you constantly, and you are also experiencing Him regularly yourself. There is never any moment when you are different from Gurudev or Gurudev is away from you.

Today, I am giving you a clear order that all of you have to certainly come to Jagannathpuri, Odisha on 30-31 July, 2015 on the divine occasion of Guru Purnima. Another point, you should not come alone, you have to bring your family as well. Even more important point, your family is your local unit of Siddhashram Sadhak Parivar organization. You all have to come together. Spend three days in the joyful ecstasy with Shree Krishna, Lord of the universe. Guru is with you, SadGuru Nikhil is always with you.

Always remember a  special message, Lord Krishna has stated – “wherever people gather in my name, I am always present there.”

You will also be present in Jagannath Puri inspired by SadGuru Nikhil, you will certainly have a mental union with SadGuru Nikhil.

You get joy in life at each moment, you enjoy happiness at each second,  and the Guru-disciple merger keeps happening …  These are my best wishes ….

 

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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