अपनों से अपनी बात – July 2016

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,
सूयदेवता अपने प्रचण्ड स्वरूप में हैं, भीषण गर्मी से पूरा देश तप रहा है और यह धरती इस ताप को झेल रही है। ऐसा लगता है कि धरती तपस्या कर रही है और सूर्य देवता अग्नि परीक्षा ले रहे हैं। इस अग्नि परीक्षा में पृथ्वी की इच्छा, कामना अवश्य पूरी होगी और शीघ्र ही पूरे जोश के साथ इस तपती धरती को शीतलता देने के लिये घनघोर वर्षा होगी, यह निश्‍चित है। किसी भी प्रकार की तपस्या का फल अवश्य प्राप्त होता है। तपस्या का काल कुछ लम्बा अवश्य हो सकता है लेकिन अन्ततः देव हो या दैवीय शक्तियां हों, उन्हें अपनी कृपा का अमृत बरसाना ही पड़ता है। प्रत्येक मनुष्य की शुभ कामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
अभी पिछले दिनों छत्तीसगढ़ में राजिम में ‘विजय श्री बगलामुखी साधना शिविर’ में ऐसा ही भव्यतम वातावरण देखने को मिला। इधर सूर्य देवता के ताप से वातावरण का तापमान 45 डिग्री तक हो गया और सभी साधक ब़ड़े आनन्द भाव से बगलामुखी साधना सम्पन्न कर रहे थे। सुबह सात बजे पंडाल खचा-खच भरा हुआ था और पूरे दिन गर्मी की परवाह किये बिना साधक निश्‍चिन्त बैठे साधनारत थे और ऐसी घटना दोनों दिन घटी, जब इस प्रकार का वातावरण मैं देखता हूं तो मुझे अपने रोम-रोम में साधकों की भावनाओं का स्पर्श होता है और मैं मन ही मन बड़ा हर्षित और उल्लासित होता हूं कि देखो आज मेरे साधकों ने तपस्या और साधना का एक नया मुकाम प्राप्त किया है। जहां दस हजार से ज्यादा साधक शिष्य हों और सभी पूर्ण व्यवस्था के साथ, पूर्ण तन्मयता के साथ सबकुछ भुलाकर सद्गुरु ध्यान में खोए हों तो वह साधना शिविर, उत्सव शिविर बन जाता है।
यही दृश्य एक सप्ताह बाद बैतूल में देखने को मिला। लोगों ने कहा कि – भीषण गर्मी है, लू चल रही है। कैसे व्यवस्था होगी? प्रशासन ने कहा कि – ध्यान रखें, यदि कोई बीमार पड़ गया तो आपकी जिम्मेदारी है। मैंने कहा कि – आप सब निश्‍चिन्त रहो, हमारा यह शिविर उत्सवमय साधना शिविर होता है। हमारे सब साधक स्वयं से पहले अपने साथियों (गुुरु भाई-बहनों) की व्यवस्था का ध्यान प्राथमिकता से रखते हैं। सहभागिता ही तो हमारे इस निखिल परिवार की सबसे बड़ी शक्ति है। ‘मैं दूसरों के लिये कुछ कर सकूं’; इस विचार को प्रत्येक शिष्य अपने भीतर धारण करता है। प्रत्येक आयोजन इसीलिये सफलता के नये आयाम को छूता है क्योंकि भाव ही यही है कि दूसरों के लिये, समाज के लिये, धर्म के लिये, संगठन के लिये कुछ करना है। सभी साधकों ने यह सिद्धान्त बना लिया है कि अपने लिये तो सभी पशु-पक्षी, प्राणी, सामान्य मानव जीते हैं, इंसान वही है, साधक वही है जो अपने साथ-साथ दूसरों के लिये भी जिये। अपने जीवन में दूसरों के लिये कुछ करे।
हमारे संगठन का तो आधार ही दया, धर्म और दान पर स्थित है। जहां अपने अन्तर मन के स्वभाव को बदलने की क्रिया की जाती है। जहां स्वयं अपने शरीर, मन पर दया की जाती है और यही दया का भाव समाज में विस्तारित किया जाता है। इसी रूप में धन का उपयोग भी सुकृत कार्यों के लिये किया जाता है। इस कारण मैं अपने प्रत्येक शिष्य को जीवित जाग्रत हीरे-मोती कहता हूं।
आकाश में तो इन्द्रधनुष दिखता है और कुछ क्षणों के लिये रहता है, जिसमें सब तरह के रंग होते हैं और एक दूसरे से जुड़े होते हैं। मैं तो रोज-रोज इन शिष्य रूपी इन्द्रधनुषों देख-देख कर ही मोहित होता रहता हूं कि कितनी भांति-भांति के लोग जो उम्र से, स्थान से, जन्म से, जाति से अलग-अलग हैं वे सभी एक ही सूत्र में बंधे हुए हैं और वह सूत्र है हमारा निखिल सूत्र, जो सद्गुरुदेव ने हमें दिया और आप सबने इसे जोड़कर एक माला रूप में ऐसा पिरो दिया है कि यह माला, यह इन्द्रधनुष कभी बिखर नहीं सकता है। यह बात कितनी विचित्र है, कितनी अनहोनी है। यही विचित्रता तो मुझे मोहित करती रहती है, मैं सब मोह छोड़ सकता हूं लेकिन शिष्य रूपी इन्द्रधनुष को देखने, सुनने, उन्हें स्पर्श करने, उनके बारे में विचार करने का मोह नहीं छोड़ सकता हूं।
इसी मोहवश मैं आपको गुरु पूर्णिमा के महोत्सव पर हरिद्वार आने का आह्वान करता हूं। तुम लोग थोड़ी कोशिश करना, तुम्हारी थोड़ी कोशिश ही बहुत है। बाकी तो सद्गुरुदेव निखिल अपने आप तुम्हें इस मार्ग पर गतिशील कर देंगे।
एक बात विशेष रूप से ध्यान रखना, जब हरिद्वार में आओ, गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाओ तो अपने साथ अपने ‘मन’ को जरूर लेकर आना। गुरु के पास आने के लिये तुम अपने आपको समझाते हो तो इस ‘मन’ को भी थोड़ा गुस्से से, थोड़ा पुचकार कर, थोड़ा नियन्त्रित कर साथ में लाना। मेरी बात को गहराई से समझना, तुम आये और तुम्हारा मन तुम्हारे स्थान पर अपने काम धंधे में ही लगा रहा तो तुम सशरीर तो हरिद्वार में होओगे लेकिन मन कहीं और होगा। तुम अपने शरीर, मन, बुद्धि और ज्ञान इन सबको चार दिशाओं में मत दौड़ाओ। इन चारों को एकाग्र कर दोंगे तो तुम पूरी तरह से शिष्य बन जाओगे। मैं शिष्यों को उनकी पूरी ऊर्जस्विता, आत्मीयता, उत्साह व समर्पण के साथ बुला रहा हूं, केवल प्रवचन सुनने के लिये या गुरु पूजन करने के लिये नहीं बुला रहा हूं।
समर्पण का सीधा अर्थ है – तुम, तुम्हारा शरीर, तुम्हारा मन, तुम्हारी बुद्धि, तुम्हारा ज्ञान सब एक सूत्र में रहें। जीवन में सफलता का भी यही मूल सूत्र है।
हां इतना अवश्य है कि – इस संसार में रहते हुए सकाम भाव रखना है, निष्काम भाव संभव नहीं है।

कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेत् शंत समाः। 
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे॥

इस संसार में सौ वर्ष तक जीने की इच्छा अवश्य करो किन्तु निरन्तर और निरन्तर कर्म करते हुए जीने की इच्छा रखो। कर्म होता है तो कुछ दोष भी आते हैं लेकिन इन दोषों से मुक्ति का उपाय भी कर्म ही है। कर्म है तो थोड़ा भोग, थोड़ा मोह का रस भी देगा, कभी आलस्य भी देगा, कभी राग भी देगा, कभी द्वेष भी देगा लेकिन इन सबको प्राप्त कर, इन सबसे ऊपर उठने का मार्ग भी कर्म के माध्यम से ही प्राप्त होता है और सतत् कर्म से आपकी सभी मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होंगी।
गुरु और शिष्य में कोई भेद नहीं है। इस सम्बन्ध में एक सूत्र सदैव याद रखना – ‘गुरु अलग नहीं हैं, वह कहीं दूर खड़ा नहीं है, वह तो तुम्हारे हृदय में पहले से ही स्थापित हैं, आवश्यकता है, झुककर, विनीत होकर, नम्र होकर भीतर देखने की, वह तो मुस्कराता हुआ हृदय पटल पर खड़ा है, आवश्यकता है उसे प्रेम से, मधुर स्वर से पुकारने की, वह तो तुम्हारी ही धड़कन का एक भाग है, जरूरत है, उसे भली प्रकार से पहिचानने की, पास बिठाने की, हृदय के सिंहासन पर विराजमान करने की, मधुरता से अपने साथ आत्मसात करने की, निश्‍चिन्तता से अपनी रग-रग, रेशे-रेशे और कण-कण में मिला देने की।’
जो भी करो, आनन्द के लिये करो। मैंने 1996 में ही सद्गुरु आज्ञा से यह निश्‍चित कर लिया था कि मुझे अपने जीवन में आरोग्य धाम का निर्माण करना है और मैं उस पथ पर निरन्तर गतिशील हूं। अब यह कार्य श्रेष्ठतम् स्वरूप ले रहा है। नीवें भर रही हैं और अगले तीन वर्षों में प्रथम चरण का कार्य पूरा अवश्य हो जायेगा।
और वैसे भी मुझे किस बात की चिन्ता है, आप सब मेरे साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो। मैं भविष्य की चिन्ता नहीं करता, सदैव जाग्रत भाव से कर्म के पथ पर गतिशील हूं। आओ हम सब साथ-साथ मिलकर जीवन का नव-निर्माण करें।
सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones…

Dear Loved One,

Divine Blessings,

The Sun God is in His fierce form, the entire country is burning with the  acute heat and this earth is bearing this intense heat. It seems that the earth is performing severe austerity and the Sun God is taking Her test. The wish and desire of the earth in this austere ordeal will surely get fulfilled and it is certain that soon the pouring rain will cool this hot earth. Any kind of penance certainly bears fruit. The duration of the penance might be long, but ultimately, the God or Goddess, They do have to bless with their Divine elixir. The pure wishes of every person certainly gets fulfilled.

Recently, we got an opportunity to witness such a magnificent environment in Rajim in Chhattisgarh during the “Vijay Shree Baglamukhi Sadhana Camp”. The temperature rose to 45 Degrees due to intense heat from the Sun God, and yet all the Sadhaks were performing Baglamukhi Sadhana with full fervour. The entire camp campus got completely filled at Seven in the morning, the Sadhaks were quietly performing the Sadhana regardless of the acute heat throughout the day, and this happened on two consecutive days, when I see such positive environment, then the emotions of the Sadhaks touch each cell of my body, I feel very elated and enthusiastic that my Sadhaks have scaled a new peak in the spiritual Sadhana and penance. When more than ten thousand Sadhak disciples are present, and all of them are fully engaged in the meditation of SadGurudev forgetting everything else, then such a Sadhana camp becomes a celebration camp.

A week later, similar scene was repeated in Betul. People questioned – There is scorching heat, intense heat wave is on. How will we organize? The authorities declared – Take care, it is your responsibility if anyone falls ill. I replied that – Do not worry, Our camp is a celebration camp. All of our Sadhaks primarily make it their priority to take care of their peer Guru-disciples. Co-participation is the greatest strength of our this Nikhil family. “I should be able to do something for others”, this thought is fully imbibed within each disciple. Our every organization achieves a new summit of success, because our root feeling is to do something for others, for the society, for the religion, for the organization. All Sadhaks follow the principle that all the birds-animals, living-beings, humans live for the self; a real human being is the one, a real sadhak is the one, who lives for others as well as for self. One who does something for others in his life.

The basic foundation of our organization is based on the values of the benevolence, religion and charity. Where we undertake the process to modify the nature of our inner mind. Where we express compassion towards our own body, mind; and the same compassion is extended to the society. In this form, the money is also utilized for positive good tasks. Therefore, I term each of my disciple as a living conscious diamond-pearl.

The rainbow appears in the sky and stays there for a few moments, it has  all kinds of colors and all are linked to each other. I am fascinated upon seeing these rainbow like disciples daily, that different types of people, who differ in age, place, birth and caste, all are bound together in the same pattern, and this pattern is our Nikhil pattern, which SadGurudev blessed us with, and all of you have collectively stitched it together into a garland, that this garland, this rainbow can never disintegrate. This entire fact is so unusual, so astounding. This speciality keeps me enchanted, I can detach myself from everything, but I cannot detach myself from looking at, listening to, touching and thinking about the disciple rainbow.

Captivated with this attachment, I implore you to come to Haridwar on Guru Poornima Mahotsava. You folks need to try a little bit, that little bit is more than enough. Rest SadGurudev will Himself dynamically guide you on this path.

Keep one fact in mind especially, when you come to Haridwar, when you celebrate Guru Poornima, then do bring your “mind” with yourself. As you explicate yourself to come to Gurudev, you should also control your “mind” with some anger, some love and some direction. Try to understand this more deeply, if you physically come, and your mind is engaged in thinking only about your business in your area, then you will be physically present in Haridwar but your mind will be elsewhere. Do not make your body, mind, intellect and knowledge run in four different directions. If you converge all of them together, then you will become a complete disciple of mine. I am inviting disciples with their full energy, intimacy, enthusiasm and  dedication, I am not calling you only to listen to sermons or to perform Guru-worship.

The direct meaning of dedication is – you, your body, your mind, your intellect, your knowledge, all converge together in one pattern. This is also the basic formula to achieve success in life.

Yes, it is certain that – while living in the world, the resolutions should make sense, the platonic sense is not possible.

Kurvanneveha Karmaani Jijivishet Shanta SamaaH |

Evam Tvayi Naanyathetoosti Na Karma Lipyate Nare ||

 

Do desire to live for a hundred years in this world, but you should wish to lead a life full of continuous steady actions. When we perform some actions, some faults also appear, but actions are the only way to resolve those defects. When there is an action, it will certainly provide a little indulgence, a little shade of attachment, will generate laziness, intimacy and antagonism as well; but after obtaining all of these, only the actions provide the means to rise higher than these planes, and continuous actions will surely enable you to achieve all your desires.

There is no distinction between Guru and disciple. Always remember a basic fact in this context – Guru is not different, He is not standing away from you, He is already set-up in your heart, the only requirement is to, bend down and see inside, with politeness, with grace, He is smilingly present on your heart plane, you need to invoke Him with love, with soothing voice, He is a part of your heart-beat, you only need to, comprehend Him fully, to sit with Him, to seat Him on the throne of your heart, to imbibe Him with all sweetness, to merge and assimilate Him with your pulse, your fibers and each cell of your body.

Whatever you do, do it for joy. I had decided in 1996 with SadGuru’s command to construct Arogya Dham in my life, and I am continuously moving on that path. This work is making excellent progress. The foundations are being filled and the first stage will be completed in the next three years.

And anyway, why do I need to be worried, when all of you are standing shoulder to shoulder with me. I do not worry about the future, I always progress on the path of action with complete consciousness and awareness. Come, let us all transform life together,

 

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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