अपनों से अपनी बात – July 15

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
शुभाशीर्वाद,
अभी पूरे देश में भीषण ग्रीष्म ॠतु का प्रवाह चल रहा है। इस स्थिति में भी बैतुल मध्य प्रदेश में प्रचण्ड चण्डिका साधना महोत्सव सम्पन्न हुआ। इस शिविर से पहले कई साधकों ने मुझसे आग्रह किया कि भीषण गर्मी में शिविर प्रातः 8 से 10 बजे और सांय काल 7 से 9 बजे हो क्योंकि दिनभर बहुत भीषण गर्मी रहती है। सब लोग गर्मी के कारण परेशान हो जाते हैं तो मैंने कहा कि साधना शिविर का गर्मी-सर्दी-बरसात से कोई लेना देना नहीं है। साधना का तात्पर्य ही तप करना है और हमें साधना के द्वारा, अपने शरीर और मन को प्रबल, दृढ़ और मजबूत बनाना है, तपाना है। यदि कोई गर्मी की और सर्दी की चिन्ता में डूबा हुआ है तो वह साधना कैसे कर सकता है। तब तो शिविर का आयोजन ही संभव नहीं होगा। शिविर का उद्देश्य केवल और केवल शक्ति की साधना सम्पन्न करना है। यह तो प्रचण्ड चण्डिका साधना महोत्सव है, आसमान में सूर्य प्रचण्ड है तो हमारे भीतर भी प्रचण्ड शक्ति का अवगाहन होना चाहिए। इसके लिये हमें अपने मन को साधना है, तन को साधना है। वातावरण सर्दी, गर्मी, बरसात तन को कुछ क्षणों के लिये विचलित कर सकते हैं लेकिन हमारा मूल उद्देश्य तो मन को साधना है। इस मन से ही सारी शक्तियों का प्रवाह प्रारम्भ होता है। इसके लिये एक विशेष दृढ़ भाव की आवश्यकता है और यह दृढ़ भाव गुरु शिष्य संवाद द्वारा अवश्य आता है। दो दिन का यह विराट महोत्सव बड़े ही आनन्द के साथ सम्पन्न हुआ, इसके भव्य आयोजन के लिये मैं मध्य प्रदेश और विदर्भ क्षेत्र के सभी कार्यकर्त्ताओं को साधुवाद प्रदान करता हूं। धन्य हैं वे कार्यकर्त्ता जो इस क्षेत्र में पिछले 21 वर्षों से निरन्तर और निरन्तर शिविर का आयोजन कर रहे हैं।
हर मनुष्य के जीवन में एक विशेष प्रकार की चाह होती है और वह चाह परिवर्तन की चाह होती है। यथास्थिति कोई भी नहीं चाहता, प्रत्येक व्यक्ति उर्ध्वगामी परिवर्तन चाहता है। उसके जीवन में जो न्यूनताएं हैं, उन न्यूनताओं को समाप्त करना चाहता है। वह इसके लिये निरन्तर प्रयत्नशील रहता है और उसका एक ही लक्ष्य होता है कि उसे जीवन में सुख प्राप्त हो। मैं कहता हूं कि जीवन में सुख की अपेक्षा खुशी की ओर आगे बढ़ें। जहां खुशी है वहां सुख तो अपने आप आ जाएगा और यह खुशी कोई बाहरी स्थिति नहीं है। यह खुशी कहीं बाहर नहीं है यह तो मनुष्य के भीतर ही स्थित है यह मानस की अवस्था है। इस मानस की सोच की दिशा में परिवर्तन करना है। इसकी तैयारी भी भीतर से करनी है। मन के भावों के चारों ओर जब प्रबल इच्छाएं (महत्वकांक्षाएं) आ जाती हैं तो मनुष्य उन्हें पूरा करने के लिये विशेष प्रयत्नशील हो जाता है और यह प्रबल इच्छाएं (महत्वकांक्षाएं) उसे सुख की मृगतृष्णा के जाल में ले जाती हैं। मैं कहता हूं कि आपको मशीन की तरह काम नहीं करना है, शांत होकर अपने भीतर खुशी का स्रोत जाग्रत करना है। आप जो काम आंतरिक इच्छा से करते हैं आपका वह काम अद्वितीय हो जाता है।
इस जीवन में दूसरों में खुशी मत ढूंढ़ीये, संसार में रहते हैं तो सम्बन्ध निभाने पड़ते हैं। कई सम्बन्ध कड़वे होते हैं, कई सम्बन्ध मीठे होते हैं। कुछ आपकी खुशी का हरण करना चाहते हैं लेकिन यदि आप अपने भीतर से शांत हैं तो ये कड़वे सम्बन्ध आपकी खुशी को खा जाने का प्रयास करें तो उसी समय आप अपने भीतर झंाकिए और अपने भीतर के भावों को जानिये। जब  आप विचारकर शांत भाव को जाग्रत कर लेंगे और अपने मन के भीतर की उस असीम शान्ति को प्राप्त कर लेंगे तो बाह्य सम्बन्ध आपको परेशान नहीं कर सकेंगे।
इसके लिये सबसे पहले आपको खुद के ऊपर विश्‍वास और भरोसा होना आवश्यक है। कुछ लोगों को जीवन में इतने अधिक धोखे मिल चुके होते हैं कि वे हर समय अविश्‍वास में ही जीते हैं। जब भीतर अविश्‍वास का विस्तार होता है तो हम अपने निकटस्थ व्यक्तियों पर भी अविश्‍वास करने लगते हैं। हर समय संदेह ही करते हैं। विश्‍वास और अविश्‍वास की प्रवृत्ति दूसरे से कम और खुद से ज्यादा जुड़ी हुई है। जिसे खुद पर भी विश्‍वास न हो तो वह दूसरों पर मुश्किल से विश्‍वास कर पाता है। विश्‍वास भी अविश्‍वास की परछाई है। अपनी सारी ऊर्जा को अपने स्वयं के विश्‍वास को बढ़ाने में लगाएं। अपने अन्दर बार-बार यह आवाज दें कि मैं जो भी करुंगा, सही करुंगा। मेरा प्रत्येक कर्म सत्य के आधार पर होगा, सत्य पर आश्रित होगा और जब यह भाव दृढ़ हो जाता है तो किसी दूसरे की सहमति-असहमति, विश्‍वास-अविश्‍वास की आवश्यकता नहीं रहती। खुद के किये हुए कर्म पर आनन्द आने लगता है और किसी कार्य में मिली सफलता एवं असफलता के लिए हम किसी दूसरे पर दोषारोपण की बजाय स्वयं को जिम्मेदार ठहराना सीखते हैं साथ ही हमें हमारे निर्णय से होने वाले लाभ-हानि को सहजता से झेलनें में आसानी होती है।
इस संसार को माया जाल कहा गया है, माया जाल का अर्थ है ऐसी बातों में उलझ जाना जिन्हें हम पहले से जानते थे और उलझने के पश्‍चात् उनसे निकलने का मार्ग न ढूंढ़ना। जगत में नित्य प्रति बाहर के लोगों से मिलना जुलना रहता है, सब अपने-अपने स्वार्थ के वशीभूत कार्य कर रहे हैं और जब आपस में एक दूसरे के स्वार्थ टकराते हैं तो संघर्ष उत्पन्न होता है इसलिये इस दुनिया के सभी रिश्तों को संघर्षों का ही परिणाम कहा गया है और इस भ्रम को माया जाल कहा गया है लेकिन बाहर के इस संघर्ष को घर में मत लाईये।
परिवार प्रेम की शुद्ध अवस्था का नाम है। अपने गृहस्थ जीवन में, परिवार में प्रेम को स्थापित करना है, प्रेम का आगमन हो गया तो एक दूसरे के लिये जीने की इच्छा, आकांक्षा, कर्त्तव्य, जिम्मेदारी, अहसास अपने आप उत्पन्न हो जाता है। इसके लिये आवश्यक है कि परिवार का केन्द्र ईश्‍वर हो, परमात्मा हो, सद्गुरु हो। अपने घर के हर सदस्य के भीतर प्रतिदिन कुछ नया और अच्छा ही देखें इससे सम्बन्धों में स्फूर्ति आती है। परिवार को प्रपंच, मायाजाल न समझें। संकट तो हर परिवार में आता है, आपसी संघर्ष भी चलता है। भगवान राम के घर में भी यही हुआ और भगवान श्री कृष्ण के परिवार में भी यही हुआ। श्रीकृष्ण के बालक ही आपस में इतना संघर्ष करने लगे कि भगवान श्रीकृष्ण ने बलराम जी से कहा कि – हमें इसका कोई ठोस उपाय निकालना ही पड़ेगा।
पुनः कहता हूं कि परिवार का केन्द्र बिन्दु ईश्‍वर हो, परिवार के लोगों में एक-दूसरे के लिये कुछ देने की भावना हो, त्याग की भावना हो, जिसमें पुनः कुछ प्राप्त करने की आकांक्षा न हो, एक-दूसरे के लिये न्यौछावर करने की भावना हो, एक-दूसरे के लिये जीने की तमन्ना हो तो अपने आप आपके परिवार में सुख-शांति आ जाती है।
परिवार की बात लिखने के पीछे मेरा एक विशेष कारण है। अभी कुछ दिनों पश्‍चात् श्रावण मास आ रहा है और श्रावण मास भगवान शिव का प्रिय मास है और सदाशिव तो गृहस्थ का सर्वोत्तम आदर्श स्वरूप हैं। शिव का परिवार तो देखो जो स्वयं तो शांत, गंभीर एवं समाधिस्थ रहते हैं वहीं दूसरी ओर शक्ति की तीव्रता, एक संतान लम्बोदर, दूसरी संतान क्रोध से भरे हुए कार्त्तिकेय, परिवार के प्राणियों में शेर, बैल, चूहा, मोर, सांप इत्यादि। ऐसे परिवार में भी भगवान शिव के केन्द्र बिन्दु होने से पूरे परिवार में मंगलकारक सामंजस्य की स्थिति बनी रहती है। जहां केन्द्र में शिव भाव रहता है वहां विविधता में भी शांति और सहयोग अपने आप आ जाता है। इसीलिये तो ॠद्धि-सिद्धि, शुभ-लाभ शिव परिवार के अंग हैं।
गृहस्थ का आधार भी जीवन में मंगल प्राप्ति, आनन्द प्राप्ति, ॠद्धि-सिद्धि और रस प्राप्ति ही है। याद रखिये जीवन में रस का आधार निरुद्देश्य कर्म और संघर्ष नहीं है। रस की उत्पत्ति तो शांति और संतोष के अमृत कुण्ड से ही प्राप्त हो सकती है और यह अमृत कुण्ड प्रत्येक प्राणी के भीतर स्थित है। इस अमृत कुण्ड का आनन्द आस्वादन अवश्य करें। अपनी खुशियों के लिये दूसरों पर आश्रित न हों। अपनी खुशियां अपने भीतर ही ढूंढ़ें और अपने जीवन का केन्द्र परमात्मा रूपी सद्गुरु को बना लें।
जब मैं कहता हूं कि प्रत्येक घर-परिवार में आरती, पूजन सामूहिक रूप से होना चाहिए इसके पीछे मूल भाव यही है कि हम अपने जीवन का केन्द्र बिन्दु सद्गुरु को बना लेते हैं तब हमें बाधाओं से भय नहीं लगता है और सुख की स्थिति में हम गर्व से नहीं भर जाते हैं। हर स्थिति में संयत रहते हुए प्रेम के साथ, सद्भावना के साथ कार्य करते रहते हैं। सद्गुरु का तात्पर्य ही सद्भावना है। यह भावना पहले परिवार में विकसित करनी है, उसके पश्‍चात् तो इसका विस्तार आपके कुल-कुटुम्ब में, समाज में, मौहल्ले और शहर में अपने आप हो जाएगा।
सद्भावना और सद्इच्छा से कार्य करते रहिये, जीवन में हर स्थिति में संघर्ष आवश्यक नहीं है। हर स्थिति में सद्इच्छा, सद्भावना से कर्म आवश्यक है। संघर्ष में किसी को पराजित करने की भावना रहती है जबकि सद्कर्म में अपने उत्थान की, उन्नति की भावना रहती है। आप ही इस जगत् के केन्द्र बिन्दु हैं, आपके चारों ओर ही यह सारा ब्रह्माण्ड गतिशील है। इसलिये अपने आपको जीवन मार्ग का साधक बनाएं, इस जीवन मार्ग में सिद्धियां, सफलताएं, गुरु कृपा से अपने आप प्राप्त हो जाएंगी। आप निश्‍चिन्त होकर अपना-अपना कर्म करते रहें।
योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।
सिद्ध्यसिद्ध्योः समो भूत्वा समत्वं योग उच्यते॥
बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्टकृते।
तस्माद्योगाय युज्यस्व योगः कर्मसु कौशलम्॥
अपने जीवन में हर स्थिति में समत्व भाव से कर्म करना है, सिद्धि तो अवश्य प्राप्त होगी। समबुद्धि युक्त, सद्भाव युक्त व्यक्ति अपने जीवन में आनन्द भाव से युक्त हो जाता है वह मुक्त हो जाता है। अपने प्रत्येक कर्म को पूरे उद्योग के साथ, कुशलता के साथ सम्पन्न करें। साक्षी भाव के साथ स्थितप्रज्ञ होकर जीवन जीएं, दृष्टा भाव बनाए रखें। न आप किसी पर मानसिक रूप से हावी हों और न अपने आप पर किसी को मानसिक रूप से हावी होने दें।
सद्गुरु आपसे दूर नहीं हैं, सद्गुरु आपसे भिन्न नहीं हैं। सद्गुरु आपके भीतर, आपकी आत्मा में स्थित हैं। नित्य प्रति उन सद्गुरु को अपने दिल में झांककर प्रणाम अवश्य करें और कर्मशील बनें।
सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Speak with loved ones …
Dear loved ones,
Divine Blessings,

Currently, the entire country is going through a scorching heat wave.  Even then, the Magnificent Chandika Sadhana Mahotsav got concluded in Beitul, Madhya Pradesh. Many Sadhaks made a prior request  to conduct the camp between 8 am to 10 am in the morning and 7 pm to 9 pm in the evening, because the heat is very intense in the day time. All the people get distraught due to the heat, so I said that the Sadhana Camp has no relationship with the weather – Summer-Winter-Rain. The essence of Sadhana is penance, and we have to make our mind and body strong, tenacious, inure and resilient through the discipline of Sadhanas. Anyone who is worried about the effect of summer or winter season, cannot perform Sadhana. Then it will not be possible to organize the Sadhana camp. The objective of the camp is and only is to perform Shakti Sadhana. This is the magnificent Chandika Sadhana Mahotsav, if the Sun is shining intensely in the sky, then strong energetic power should also flow within ourselves. We need to disciple our mind, we need to discipline our body towards this goal. The atmospheric environment extremities like cold, heat, rain etc. can affect the physical body for a few moments,  but our core purpose is to discipline the mind. All the energetic powers flow from this mind.  This requires a strong & tenacious will-power and this strong will-power gets developed through Guru-disciple interaction.  This magnificent  two-day festival was organized with great joy, I commend and compliment all the volunteers of Madhya Pradesh and Vidharbha region for this grand event. Blessed are the volunteers who have been continually organizing this camp in this area for the last 21 years.

Every human being has a typical desire in his life and that desire is the desire for change. No one wants the status quo, each person wants to change to progress upwards. Whatever be the deficiencies in his life, he wishes to remove those insufficiencies. He constantly strives towards this, and his only goal is to obtain comfort in his life. I advise to look for happiness instead of comfort in life. The comfort will automatically come wherever there is happiness, and this happiness is not an external situation. This happiness is not out somewhere, rather it is inside, within the human mind. We need to alter the course of thinking of this mind. The preparation for this is also required to be done from the within. When strong desires (ambitions) surround the mind, then the person becomes ready to fulfill them,  and these strong desires (ambitions) take him into the trap of the mirage of happiness. I recommend that you do not have to work like a machine, rather you need to activate your inner source of happiness quietly and calmly.  The work which you perform with your inner desire, becomes distinctive and exceptional.

Do not seek happiness from others, we need to fulfill the relationships to live in the society. Many relationships are bitter, and many other relationships are sweet. Some want to steal your happiness from you. But if you remain calm within, then whenever these bitter relationships try to snatch your happiness, you ought to look inside and understand the inner emotions of your mind. When are are able to activate the calmness inside, and attain inner peace in your mind, then these external relationships will not be able to bother you.

For this, first you must have absolute faith and trust in yourself. Some people receive so many deceptions in their life that they live their entire life in doubt and disbelief. When the inner distrust grows, we begin to distrust even our close relations. We live immersed in doubts all the time. The nature of belief and disbelief is connected more with us rather than with others. A person who does not believe in himself, can hardly believe in others. The belief is also the reflection of disbelief. You should utilize your entire energy to enhance your belief and faith. Tell your  inner voice that whatever I will do, I  will do it in the right way. My every action will be based on truth, will be dependent on truth; and when this feeling intensifies  then there is no need for agreement-disagreement or trust-distrust with others. We start getting joy from our own actions, and we start to make ourselves responsible instead of blaming others for success or failure in any task. It also enables us to easily handle the benefits or losses arising from our decisions.

This world has been termed as a net of illusions, the illusory mesh means to get involved in such things which we already knew and not finding a way out from those complications. We daily meet new people in the society, and everyone is taking actions due to their own self-interest. Conflict occurs due to clash of these self-interests. So, all the relationships in this society arise through the results of these conflicts in the world, and these confusions are called as illusory mesh, but you should never bring this external conflict into your own home.

Family is the purest form of love. We need to establish love  in our domestic life and family. The advent of love will kindle a desire to live for each other, and generates a realization of ambition, duty and responsibility automatically. It is important to make God, Divinity, SadGuru as focal central point of the family. Look for something new and good within each family-member daily, this deepens the relationship. Do not consider family as a delusion or illusion. The crisis comes in every family, and mutual conflict keeps occurring. Similar events occurred in Lord Rama’s home and also in Lord Krishna’s family. The conflict between the children of Shree-Krishna increased to such a high level that He had to remark to Balram that – We need to take some concrete measures to resolve this.

I again emphasize that the core focal point of the family should be God, family-members should be willing to offer something to each other, there should be a sense of sacrifice, with no expectation of getting anything back in return, there should be a spirit of sacrifice for each other, and a desire to live for each other, then this will definitely bring peace within your family.

There is a specific reason behind my mention of the family. The Shravan month is arriving in a few days and the Shravan month is the favorite month of Lord Shiva and SadaShiva is the ideal model of domestic life. If we look deeply within Lord Shiva’s family, He remains so calm, peaceful, totally engrossed in blissful Samadhi, while Shakti is so intense, one child is Lambodar, second child is Kartikeya, always full of anger, and other members of the family are lion, bull, mouse, peacocks, snakes etc. Even such a family always stays in harmony due to Shiva as the focal point. The key focus on Shiva automatically brings in peace and cooperation within the diversity. Therefore Riddhi-Siddhi and Subh-Labh are integral members of Lord Shiva’s family.

The foundation of domestic life is obtaining joy, fortune, and attainment of Riddhi-Siddhi bliss.

Remember that bliss in life are not just based on unplanned actions and struggles, This bliss can be obtained only from the nectar pool of peace and contentment, and such a master pool exists within each individual. Taste the joy of this immortality pool. Do not be dependent on others for your  happiness. Find your happiness within yourself and make SadGuru God as the central point of your life.

When I state that the prayers, aarti, worship in a family should be performed collectively, the root reason behind this is that when we make SadGuru as the core focal point of our life, then we do not fear obstacles and we do not swell with pride on getting comforts. We keep on working with love and goodwill within any circumstance. SadGurudev implies goodwill. We need to first develop this feeling with the family, only then it will extend in your clan-relationships, society, the locality and the city itself.

Keep working with goodwill and well-intentions, and it is not necessary to have struggle and conflict in every situation of life. It is important to have good intentions and goodwill in all circumstances. The conflict revolves around a desire to defeat someone, while a good-faith action is filled with progress and elevation of the self. You yourself are the focal point of this world, the entire universe revolves around you. So convert yourself into a Sadhak of this life-path, and you will automatically obtain successes and accomplishments graciously from Gurudev. You should continue to perform your actions with full faith and trust.

 

YogasthaH Kuru Karmaani Sadagn Tyaktwa Dhananjaye |

SiddhyasiddhyoH Samo Bhutwa Samtwam Yog Uchchayate ||

Buddhiyukto Jahatih Ubhe Sukritdushkrite |

Tasmadhogaaye Yujayeswa YogaH Karmasu Kaushalam ||

 

You should act in  every situation in your life with a sense of assimilation, and the Siddhi will automatically be yours. A person having assimilation and goodwill fills his life with joy, and he becomes free from the cycle. Complete your each task with full sincerity, diligence and skills. Live life as a detached observer,  watch dispassionately. Do not impose yourself mentally on anyone, and do not let anyone impose mentally on you.

SadGuru is not far from you, SadGuru is not different from you. SadGuru is within yourself, within your soul. Bow to Him within the deep recesses of your heart, become a person full of actions.

 

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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