अपनों से अपनी बात – January 2016

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,
आप लोगों से मैं तो रोज ही बात करता हूं, अपने मन की बात कहता हूं और मुझे खुशी है कि आप मेरी बात को अमल में लाते हैं, मेरा कहा मानते हैं। एक गुरु के लिये इससे बढ़कर खुशी की बात क्या हेागी कि वह जो बात कहे शिष्य उस बात को स्वीकार करें, उसे अमल में लाएं और अपने जीवन में पूरी तरह से उतारने का प्रयास करें। यह आपका और मेरा सम्बन्ध प्रेम, श्रद्धा, आस्था और विश्‍वास का सम्बन्ध है। इन चार स्तम्भों पर टिका सम्बन्ध ही सबसे स्थायी सम्बन्ध होता है, जिसे शास्त्रों ने शाश्‍वत् सम्बन्ध कहा है।

 

इस बार मैं अपनी बात बच्चों को कहना चाहूंगा, प्रिय बच्चों इस बार मैंने पत्रिका के मुख पृष्ठ पर वर्ष 2016 के प्रथम अंक (जनवरी अंक) में मुख पृष्ठ पर मां सरस्वती के चित्र को प्रकाशित किया है जो अत्यन्त शांत मुद्रा में शोभायमान हैं। सरस्वती अर्थात् विद्या की अधिष्ठात्री देवी और विद्या का अर्थ है – ज्ञान और क्रिया का संयोग।

 

मुझे मालूम है तुम लोगों की परीक्षा दो महीने बाद आ रही है और सभी लोगों द्वारा तुमको यही प्रश्‍न पूछा होगा है कि पढ़ाई कैसी चल रही है? तुम्हारे मां-बाप, तुम्हारे परिवार वाले, तुमसे यही आशा-अपेक्षा रखते हैं कि तुम श्रेष्ठ अंकों से परीक्षा में उत्तीर्ण होओ। चारों और से दबाव ही दबाव है। इस सम्बन्ध में, मैं भी तुम्हें कुछ कहना चाहता हूं।

 

यह तुम्हारा बचपन विद्या अध्ययन का समय, जीवन का श्रेष्ठतम् समय है। इस समय जितना ज्ञान ग्रहण कर लोगे, एकत्र कर लोगे वही आगे चलकर तुम्हें क्रिया क्षेत्र में तीव्र गति से आगे बढ़ायेगा और तुम विद्यावान बन सकोगे। विद्या ऐसी पूंजी है जिसका उपयोग तुम जीवन भर कर सकोगे। जब तक विद्या तुम्हारे साथ है, संसार में न तो किसी से डरोगे और न ही किसी स्थिति में घबराओगे। यह विद्या ही तुम्हें हर समय सम्बल, सहारा देगी। विद्या से मेरा मतलब केवल किताबी ज्ञान, जानकारी से नहीं है अपितु विद्या अर्थात् कौशल (डज्ञळश्रश्र) से है क्योंकि अब तक जो ज्ञात प्रश्‍न हैं, सिद्धान्त हैं वे तो आपकी पुस्तकों में प्रश्‍नों के रूप में स्थान पा चुके हैं लेकिन आपका पूरा जीवन इन्हीं सूत्रों पर अमल करने से ही सफल नहीं हो पाएगा। आपको आने वाली चुनौतियों परेशानियों का हल अपनी स्किल (कौशल) के बल पर स्वयं खोजना होगा और आप गुरु कृपा से सफल भी होंगे।

 

परीक्षा तो आ रही है लेकिन इसके लिये इतने तनाव में आने की आवश्यकता क्या है? तुम ज्ञान को, पढ़ाई को भार समझ कर मत करो। स्वभाविक रूप से अध्ययन करते रहो, विवेचन करते रहो, विश्‍लेषण करते रहो और इस ज्ञान को अपने मस्तिष्क के केन्द्र में सुरक्षित रख दो, एक बार तुमने इसे सुरक्षित रख दिया तो यह परीक्षा की घड़ी में, तुम्हारे हाथों पर (लेखनी के माध्यम से), तुम्हारी वाणी में तत्काल आ जायेगा और तुम सफलता प्राप्त कर सकोगे।
तुम्हारे घर वाले तुम्हें कहते होंगे कि, अभी दो महीने हैं, दो महीने में तुम्हें दिन और रात पढ़ना है रोज दस-दस घण्टे पढ़ना है। कहने वाले यह भी कहेंगे कि अभी भूख, प्यास, नींद सब भूल जाओ। केवल और केवल पढ़ाई की और ध्यान दो। मेरा विचार है कि वे सब लोग तुम्हें ज्यादा उपदेश दे रहे हैं।

 

देखो मेरी बात मानो, समय का समायोजन इस प्रकार करो! तुम्हें परीक्षा की तिथियां और परीक्षा के लिये कितना समय है दोनों बातों की जानकारी है तो उसके अनुसार अध्ययन करो। तनाव में तो बिल्कुल मत आना। तीन-चार घण्टे पढ़ो, फिर एक घण्टा विश्राम करो और फिर वापिस पढ़ने लग जाओ। विश्राम के क्षणों में थोड़ी शारीरिक क्रिया-कलाप भी करो, हल्का-फुल्का व्यायाम करो। जिससे तुम्हारी चुस्ती बढ़ेगी और तुम एकाग्र होकर पुनः अध्ययन कर सकोगे।

 

मुझे एक बात बताओ कि कुछ लोग दस-पन्द्रह घण्टे पढ़ते हैं और कुछ लोग दो-तीन घण्टे ही पढ़ते हैं और उन्हें सब कुछ याद हो जाता है। इसका कारण क्या है? इसका कारण है कि वे पढ़ाई को भार समझ कर नहीं करते और कम समय में भी अच्छे अंक प्राप्त करते हैं इसलिये पढ़ाई भार समझ कर नहीं, शौक से करो, मन से करो। यह तो तुम्हारे जीवन का गोल्डन टाईम है। अब देखो किसी पहाड़ पर चढ़ना है, उसकी चोटी पर पहुंचना है और उसकी ऊंचाई 1000 मीटर है, तुम चाहो तो दो दिन में 1000 मीटर चढ़ सकते हो और तुम चाहो तो बीस दिन में रोजाना 50 मीटर चढ़कर भी पहुंच सकते हो। पहली क्रिया में शरीर, मन सब थक जायेगा। जबकि रोज-रोज मस्ती में, आनन्द के साथ चढ़ने से शरीर, मन कुछ भी नहीं थकेगा।

 

मुख्य बात है कि पढ़ाई शौक से करनी है, ज्ञान में आनन्द और रस लेना है। तो फिर रोज-रोज नियमित रूप से दिनचर्या बनाकर अध्ययन करो। विद्या को तुम्हारे पास आना ही पड़ेगा।

 

मेरे सभी शिष्यों के बच्चे अपनी-अपनी परीक्षाओं में अच्छे अकों में उत्तीर्ण हों और वे अपने भविष्य की नींव ठोस रूप से स्थापित करें, यही मेरी अभिलाषा है, यही मेरी इच्छा और कामना है।

 

मैं बड़ों को भी यही कहता हूं कि तुम्हारे अन्दर भी शक्ति का भण्डार भरा हुआ है। तुम्हारे शरीर के प्रत्येक अंग में शक्ति छिपी हुई है। चौसठ कलाएं तुम्हारे भीतर हैं। कोई नई कला बाहर से तुम्हारे पास नहीं आयेगी। सारे के सारे गुण ईश्‍वर ने तुम्हें प्रदान कर दिये हैं। बस इन गुणों को तुम्हें तराशना है। अपनी कलाओं को तराशना है।

 

इस बार मैंने शिव और शक्ति के बारे में एक विशेष आलेख दिया है, शक्ति तो ऊर्ध्वगामी है वह ऊपर उठती है और शांत सहस्रार भाव में स्थित शिव से मिलने के लिये लगातार क्रियारत रहती है। तुम्हारी सारी क्रियाओं का उद्देश्य एक ही होना चाहिए कि तुम अपने आनन्द भाव, शिव भाव को पहचानो और उसे पा लो। तुम्हारी शक्ति तो उथल-पुथल करती रहेगी और शक्ति की इस तीव्रता में तुम विचलित भी हो सकते हो। गंगा को देखो, नर्मदा को देखो वे टेढ़े-मेढ़े रास्तों से भागती-दौड़ती हैं। उनके मार्ग में भी बाधाएं आती हैं। लेकिन नदियों का एक ही लक्ष्य होता है कि वे किसी भी प्रकार से समुद्र में जाकर मिल जाएं। जब तक समुद्र से नहीं मिलतीं, तब तक वे शांत भी नहीं हो पातीं। तुम्हारा जीवन भी ऐसा ही है, तुम्हारी शक्ति दसों दिशाओं से दौड़ रही है। तुम्हारी शक्ति तुम्हें कभी चिन्तित, कभी विचलित करती है। कभी तुम्हें जोश, कभी तुम्हें क्रोध देती है, कभी बाधाएं आकर खड़ी हो जाती हैं लेकिन तुम्हारी सारी क्रियाओं का उद्देश्य तो एक ही है शिव भाव को पा लो, जैसे नदियों का उद्देश्य है कि वे किसी भी प्रकार से समुद्र से जाकर मिल जाएं और शांत हो जाएं।

 

यह तो ध्रुव सत्य है कि भविष्य अज्ञात रहता है, इसीलिये भविष्य के प्रति जिज्ञासा बनी रहती है और जिज्ञासा में ही आनन्द है। यदि तुम्हें आज सब कुछ मालूम हो जाए तो जीवन का आनन्द कैसे आ पायेगा? अनहोनी में ही आनन्द है, अज्ञात में ही आनन्द है। ये सारी यात्रा ज्ञात से अज्ञात की यात्रा है। इसलिये पूर्ण शांत चित्त से अपना कार्य करते रहो। जो होगा अच्छा होगा… मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं…।

 

सस्नेह आपका अपना

 

नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with Loved Ones…

Dear Loved Ones,

Divine Blessings,

I talk to you people daily, open my mind to you, and I am glad that you implement my advice, and practice my guidance. It is the happiest moment for a Guru, when His disciples follows His advice, practice it, and try to implement it fully in their life.  This relationship between you and myself is a relationship of love, faith, trust and confidence. A relationship based on these four pillars is the only permanent relationship, which our scriptures have termed as the eternal relationship.

This time I would like to talk to the children, dear children, I have published the photograph of Mother Saraswati on the front page of first issue (January) of 2016, which is absolutely attractive in extremely tranquil state. Saraswati i.e. Mother Goddess of Learning, and Learning means – merger of knowledge and action.

I know that your examinations are approaching after two months and everyone must be asking you the same question – How are your studies going on? Your parents, your family, everyone expects and hopes that you succeed in your exams with best marks. There is high pressure from all sides. I also wish to tell you something on this topic.

This time of your childhood, this education time, is the best time of your life. Whatever knowledge you acquire at this time, accumulate within this time, it will strongly drive your actions, and make you educated. You will be able to utilize this wealth of knowledge throughout your life. When you possess this education, you will neither fear anyone, nor ever get into panic. This education will always grant you support and strength. By education, I do not mean only bookish learning and information; rather education means skills; because all the known principals and discoveries are already present in your textbooks in the form of questions; but you will not be able to lead your entire life by just practicing these formula. You will have to find the solutions of impending challenges and problems yourself, through the strength of your own skills and you will certainly succeed by Guru’s grace.

The exams are approaching, but what is the need to get worried about them?  You should not treat the studies and learnings as a burden. Keep studying naturally, continue to think and reason, keep analyzing and store this knowledge safely in the center of your brain; once you have stored it safely, then this knowledge will instantly come into your hands (through writing) and your voice, at the hour of test, and you will surely succeed.

Your family members must be advising you that, only two months are left, you have to continuously study day-and-night during these two months, you have to study for ten hours daily. They will also recommend you to completely forget about hunger, thirst and sleep. Only concentrate on your studies. I think that they are giving you excess advice.

Look, listen to me, organize your time like this. You already have knowledge about the exam dates and time left for exams; so study accordingly. Do not come under stress and tension. Study for three-four hours, then take rest for an hour, and start studying again. Do some light physical activities-actions during those moments of relaxation, perform light physical exercises. This will increase your alertness and you will be able to concentrate more on your studies.

Tell me one thing that some people study for ten-fifteen hours and others study only for two-three hours, and even then they remember everything which they read. What is the reason? The reason is that they do not treat studies as a heavy burden; to get good marks in lesser time, do not treat study as a burden, you should rather think of studies as a hobby, to be done with your full mind. This is the golden time of your life. Now look, if you have to climb a mountain, if you have to reach its peak and its height is 1000 meters, then if you wish, you can climb 1000 meters in two days, and if you wish, you can also reach in twenty days by climbing 50 meters daily. The body, mind, everything will be completely exhausted in the first alternative. However, neither your body nor your mind will feel tired in climbing daily, with fun and joy.

The main point is that you should study with interest, you have to enjoy the joy and pleasure of learning. Then plan a regular study schedule and study accordingly. The knowledge will have to come to you.

All the children of all my disciples pass their exams with best marks, and establish a strong solid foundation for their future, this is my aspiration, it is my wish and desire.

I give similar advice to the adults that you have a vast repository of energy in your body. The energy power is imbibed in each part of your body. The Sixty-Four powers are assimilated within you. No new energy will come to you from outside. God has already gifted you all the qualities. You just have to refine these qualities, and polish these powers.

I have provided a special article about Shiva and Shakti this time. Shakti is the natural upward force, it rises up and is always eager to merge with Shiva in the cool Sahastraar expanse.  There should be only one objective in all your actions, to comprehend your own sense of Joy, your own sense of Shiva; and to attain it. Your strength and energy will continue to be in chaos, and this pandemonium of intense energy can distract you. Look at the Ganga, look at the Narmada, they continue to flow and run hurriedly through curved-twisted routes. They also encounter obstacles in their path. However the rivers have only one goal, to merge into ocean through any possible way. They do not achieve peace until they meet the sea. Your life is also similar, your energy is running amok in ten directions. Sometimes your energy makes you anxious and worried. Sometimes it gives you enthusiasm, sometimes it makes you angry, sometimes it stands in your path as obstacles; but the root aim of all your actions is only one – to attain the Shiva state; similar to the goal of the rivers, to go and merge with the sea, attain peace and calm.

This is the universal truth that the future is always unknown, so there is always a curiosity towards the future, this curiosity is full of joy. If you learn everything today, then how will you obtain  joy in the life. The joy is within the mystery, the joy is within the unknown. This entire journey is from the definite to the indefinite. So keep doing your work with complete peace and calmness. Whatever will happen, will be for the good…. I am always with you ….

 

Cordially Yours

Nand Kishore Shrimali

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