अपनों से अपनी बात – Feb 15

अपनों से अपनी बात…
प्रिय आत्मन्,
शुभाशीर्वाद,

  

नववर्ष के प्रारम्भ में वसंत ॠतु के आगमन पर उल्लास के इस श्रेष्ठ वातावरण में प्रकृति के विराट सौन्दर्य, फैलते हुए आनन्द के क्षणों में, मैं आपको विशेष आशीर्वाद प्रदान करता हूं।

 

सबसे पहले तो मैं आपको इस बात की बधाई देता हूं कि आप दिल्ली आरोग्य धाम में 27-28 दिसम्बर 2014 को इतनी विराट संख्या में आए। आपके चेहरे के तेज और मन की प्रफुल्लता के सामने ठंड-कोहरा सब हार गये। शिविर में सब कुछ नवीन-नवीन लग रहा था। ऐसा लग रहा था, मानो निखिल शेरों ने एक करवट ली है और अब एकजुट होकर आगे बढ़ने के लिये सुसज्जित एवं तैयार हो गये हैं। पूरे वर्ष की निराशा, हताशा को झकझोर कर हटा दिया है। निश्‍चय ही अब तो आप अश्‍वमेघ विराट क्रिया के साक्षी बने हैं। आपने स्वयं इन क्षणों को जिया है। मैं पुनः आपको इस भव्य आयोजन, उत्सव और समारोह के लिए शुभाशीष प्रदान करता हूं।

 

इस बार मैं कुछ वही पुराना आपको नहीं कहना चाहता, इस बार वही आपको छोटे-मोटे संकल्प दोहराने का नहीं कहता हूं, इस बार मैं आपको आह्वान करता हूं आपके जीवन के सबसे महत्वपूर्ण तत्व को जाग्रत करने हेतु। इस वर्ष आपको एक ही क्रिया सम्पन्न करनी है और वह क्रिया है ‘स्पन्दन… स्पन्दन… स्पन्दन…’। यह ‘स्पन्दन’ शब्द बड़ा ही मधुर और प्यारा शब्द है, इसका बड़ा ही प्यारा भाव है, बड़ा ही प्यारा एहसास, अनुभव है। आपके शरीर में, हृदय में ‘स्पन्दन’ हो। वह पूर्ण रूप से स्पन्दित होकर कार्य करता रहे। किसी भी प्रकार के ब्लॉकेज, रुकावट आपके हृदय के स्पन्दन की गति को धीमा नहीं करे और न ही क्रोध, आवेश, आवेग में आकर आपके हृदय के स्पन्दन तीव्र हो जाएं। यह तो आनन्द के साथ धड़कता रहे, धड़कता रहे…।

 

प्रथम स्पन्दन – यह स्पन्दन आपके जीवन की आधारभूत स्थिति है, मुख्य बात है। इस सम्बन्ध में एक छोटी सी कथा कहूंगा –
एक बार शिष्य अपने गुरु के आश्रम में रहता था और रोज प्रश्‍न पूछता कि गुरुदेव मुझे जीवन का धु्रव सत्य बताईये। गुरु जी शिक्षा-दीक्षा देते रहे, बहुत ज्ञान हो गया। गुरु ने पूछा कि – क्या जीवन का धु्रव सत्य समझ में आया? शिष्य ने कहा – इन पुस्तकों के अध्ययन से थोड़ा बहुत ईश्‍वर, कुण्डलिनी शक्ति आदि के बारे में जानकारी अवश्य हुई। गुरु ने कहा कि – आज मैं जीवन के धु्रव सत्य के सम्बन्ध में दीक्षा दूंगा। गुरु शिष्य को लेकर एक नदी किनारे गये और कहा कि – ‘चलो नदी के उस पार चलते हैं, नांव में बैठकर जा रहे थे अचानक गुरु ने शिष्य को धक्का दिया, शिष्य पानी में गिर पड़ा और गुरु भी साथ में कूद पड़े। शिष्य ऊपर आने के लिए हाथ-पैर चलाने लगा और छटपटाने लगा। गुरु तो तैराक थे, जैसे ही शिष्य थोड़ा मुंह बाहर निकालता, गुरु उसका सिर पकड़कर फिर पानी में डुबो देते। शिष्य जोर-जोर से छटपटाने लगा बड़ी देर तक अपने शिष्य के धैर्य की परीक्षा लेने के बाद अंततः गुरु जो कि करुणा के पुंज होते हैं, दया के सागर होते है उस शिष्य की चोटी पकड़कर उसे बाहर निकाल दिया। अब गुरु ने पूछा कि – तुम्हें बताऊं! जीवन का धु्रव सत्य क्या है? जब तुम पानी के भीतर छटपटा रहे थे तो तुम्हारे मन में क्या विचार था? शिष्य ने कहा – उस समय में वेद, उपनिषद्, जीव, ब्रह्म, शास्त्र सारा ज्ञान भूल गया, केवल एक ही इच्छा और कोशिश थी कि किसी प्रकार बाहर निकलूं, श्‍वास लूं और मृत्यु के पाश से बच जाऊं।
गुरु ने मुस्कुराते हुए कहा कि – यही जीवन का ध्रुव सत्य है तुम्हारे भीतर जो हृदय धड़क रहा है वह परम सत्य का स्वरूप है। इसे निरन्तर धड़कना चाहिए। बाकी सारी स्थितियां इसके चारों ओर के बाह्य आवरण हैं। जब तक यह तुम्हारा हृदय धड़कता रहता है उस क्षण तक सृष्टि के सारे सुख, दुःख, आनन्द, विलास, वस्त्र, आभूषण, घर-परिवार, समाज, रिश्ते-नाते, ज्ञान-अज्ञान अनुभव होते हैं इसीलिये अपने जीवन के इस परम सत्य रूपी हृदय को हर समय जाग्रत रखो। जिस दिन इस परम सत्य की ज्योति बुझ जाएगी उसी दिन तुम्हारे लिये सबकुछ समाप्त हो जायेगा यही तुम्हारे जीवन का आधार बिन्दु है। इस स्पन्दन को जाग्रत रखो।

 

दूसरा स्पन्दन वह भी आपके लिये आवश्यक है, आपको इस बार अपने विचारों में तीव्र स्पन्दन लाना है। आपके विचार आपके मन के भाव हों, आपके विचारों में नवीनता हो, पुराने घिसे-पीटे विचारों को हटा दीजिये, नये विचारों को अपने जीवन में आने दीजिए, अपने मस्तिष्क को विचारों के प्रवाह के लिये खोल दीजिये। खुले मन से, खुले मस्तिष्क से विचारों का स्वागत कीजिए। आप ही अपने जीवन के सबसे बड़े न्यायाधीश हैं, आपको न्याय करना भी आता है और निर्णय करना भी। अपने अच्छे विचारों को निर्णय में बदल दीजिये। आपके विचार ओर निर्णय आपके जीवन के प्रत्येक पक्ष में मधुरता अवश्य लायेंगे।

 

तीसरा आवश्यक स्पन्दन है आपकी वाणी का स्पन्दन। मैं कहता हूं इस बार ज्यादा से ज्यादा लोगों से मिलिये, अपने अड़ौसी-पड़ौसी, मित्रों से मिलिये, अपने रिश्तेदारों से मिलिये, उन लोगों से मिलिये जिनसे मुलाकात किये आपको काफी समय बीत गया है। अपने स्कूल, कॉलेज के सहपाठियों से मिलिये और उनका मुस्कुराकर स्वागत कीजिये। जहां भी जाते हैं, चाहे पार्क हो अथवा व्यापार स्थल सबसे मुस्कुराकर कळ  कशश्रश्रे कीजिये। अनजान लोगों से बातचीत कीजिये, अपने आपको खोल दीजिये। किसी ने आपको बांध नहीं रखा है, आपने ही अपने आप को बांध रखा है। अपने आपको खोलिये।

 

मैं आपको कहता हूं आप दबिये मत, डरिये मत, झेंपिये मत, घबराईये मत। अपने मन की हीन भावना को निकाल दीजिये, आप भी अपने आप में एक विशिष्ट व्यक्तित्व हैं, अपने आप को हीन मत समझिये। भगवान ने सबको एक जैसा बनाया है, आपको भी वैसा ही बनाया है। आप दूसरों का सम्मान कीजिये, उनके ज्ञान का सम्मान कीजिये पर अपने आपका असम्मान मत कीजिये। जब आप स्वयं ही अपने आपको नीचा समझने लग जाते हैं तो खुद की खर्पीीश्रीं कर देते हैं। इसे हटाना है। आपको अड़ियल नहीं बनना है, जिद्दी नहीं बनना है लेकिन दृढ़ निश्‍चयी अवश्य बनना है।
मैं कहता हूं कि प्रत्येक मनुष्य के विचारों में मतभेद हो सकता है लेकिन मन-भेद नहीं होना चाहिए। आपके और आपके परिवार के सदस्यों के विचार अलग-अलग हो सकते हैं। आपकी सोच और उनकी सोच अलग-अलग हो सकती है लेकिन किसी के ऊपर अपनी सोच थोपनी नहीं है। घर-परिवार में भी शांति और सौहार्द्र रखने का एक मात्र यही उपाय है। आप अपनी रुचि, अपना स्वभाव अपने घर-परिवार के लोगों, अपने से छोटों, अपने मातहतों पर मत थोपिये, कुछ समय तो आपके बड़े होने के कारण वे आपकी बात सुन लेंगे लेकिन जब आप अपनी जिद्द पर ही अड़े रहेंगे तो वे आपकी बात को अनसुना कर देंगे, उस समय आपको और भी अधिक खराब लग सकता है। आपको यह लगेगा कि मेरा ही परिवार, मेरा ही ऑफिस, मेरे आस-पास के लोग ही सबसे खराब हैं। इस स्थिति से ऊपर उठने के लिये अपने आपको छोटी-छोटी जिद्द से ऊपर उठाईये, लकीर के फकीर मत बनिये। सोचिये, विचारिये और देखिए कि एक ही पक्ष के हजारों आयाम हो सकते हैं।
अगर-आपके माता-पिता ने, आपके परिवार ने, आपके समाज ने आप पर कुछ थोप दिया है और आपभी उसी बोझ को आगे दूसरों पर थोप रहे हों, उचित है? हर स्थिति में बोझ को, भार को कम करना है। मुक्त होकर चलना है, एक बात सदैव याद रखिये जिन्दगी के सफर का आनन्द लेना है तो कम से कम बोझ और सामान रखना होगा। तभी तो हम मुक्त भाव से जी सकते हैं।
इस बार कई साधकों ने मुझे व्यक्तिगत रूप से कहा कि – हम पूरे वर्ष में निखिल मंत्र विज्ञान के 101 सदस्य बनायेंगे तो मैंने कहा कि यह तो तुम्हारा अपना काम है, इसके लिये मुझसे पूछने की कोई आवश्यकता नहीं है। तुम्हें मेरे सामने संकल्प नहीं लेना है, तुम्हें अपने स्वयं के हृदय को, गुरु ज्ञान से स्पन्दित करते हुए स्वयं के समक्ष संकल्प लेना है। यह कार्य जब तुम बिना किसी कामना पूर्ति के आनन्द के साथ करोगे तो तुम्हें अपना लक्ष्य अवश्य मिल जायेगा। केवल इस कार्य से तुम्हारी जीवन बगिया में सैकड़ों नये मित्र बन जायेंगे। नये परिचय होंगे और इसी से तुम्हें वास्तविक खुशी मिलेगी। यह काम तो आपको ही करना है।

 

आपका और मेरा प्रगाढ़ सम्बन्ध है तो फिर आवश्यक है कि उसे और अधिक प्रगाढ़ बनाएं। बार-बार मुझसे मिलें, अपने-अपने स्थान पर समय-समय पर शिविरों आयोजन करें, आप सब मिलकर साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक पूजन करें, साधना करें। विचारों का आदान-प्रदान करें।
आपका और मेरा जिस तरह का सम्बन्ध है उसमें संवाद होना अति आवश्यक है तो आप मुझे निरन्तर पत्र अवश्य लिखते रहें, अरे! अब तो आपको ई-मेल E-mail की सुविधा प्राप्त हो गई है। आप जैसे ही मुझे मेरे नाम से nmv.guruji@gmail.com पर मेल भेजते हो मैं उसे पढ़ता हूं और आपकी उपस्थिति को अनुभव करता हूं। यह क्रम अनवरत चलते रहना चाहिए। रोज नहीं तो महीने में एक पत्र, ई-मेल अवश्य भेजें।

 

जिन्दगी में रुकिये मत, जिन्दगी के साथ-साथ आगे बढ़ते रहें। यदि आप अपने बोझ के साथ रुक गये तो जिन्दगी आगे बढ़ जायेगी और आप वहीं रुक जायेंगे। इसलिये आवश्यक है, अपने आपको खोलिये, अपने आपको प्रकट करिये, आपके भीतर जो आनन्द भाव की गंगा बह रही है उसे खोलिये। जब आप, अपने आपको खोल देंगे तो क्रोध, वैमनस्य, घृणा सब कुछ बह जायेगा। मन में निर्मलता और आनन्द का सरस प्रवाह हो जायेगा।

 

मेरी एक छोटी सी सलाह मानकर अपने आपको खोल दीजिये, दिन में एक बार आपको जोर से हंसना जरूरी है, पांच बार मुस्कुराना जरूरी है। अपने पैरों से रोज चलना जरूरी है, खेलना, गाना, हंसना, पूजा करना, ध्यान करना, अपना व्यापार करना, नौकरी करना, कार्य करना सब जरूरी है और इसके साथ-साथ जो भी आपका छोटा-मोटा शौक हो उसे भी रोज पूरा करना जरूरी है।
अपने विचारों के जाल में खुद को मत उलझाईये, विचारों का चक्रव्यूह मत बनाईये। अपने व्यक्तित्व को एकांकी नहीं, बहुआयामी बनाईये। आप पिता भी हैं, माता भी हैं, तो पुत्र भी हैं आप नौकरी करने वाले हैं, आप कर्मचारी हैं तो आप अफसर भी हैं, आप ही अपने जीवन में सबकुछ हैं। आपका व्यक्तित्व सब जगह अलग-अलग है तो अपने व्यक्तित्व के सभी पक्षों को देखें, समझें और उसके अनुसार अपना चिन्तन बनाएं। एकांकी मत बनिये।

 

मेरा तो विचार है कि यह जिन्दगी एक खेल है, इस  संघर्षपूर्ण खेल में हर एक को दौड़ना है, संघर्ष करना है हार होगी या जीत, इसे सोचकर अपने आपको कुंठित मत बनाईये। इस पर तो ध्यान देना ही नहीं है सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि आपको खुलकर जिन्दगी का यह खेल खेलना है। यह जिन्दगी आपकी है और आप ही इसे अच्छी तरह से चला सकते हैं। अच्छी तरह से जी सकते हैं।

 

मैं तो यही कहता हूं कि अपनी जिन्दगी को अच्छे से जियें, खुलकर जियें, हंसते खेलते जियें।

 

 सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Speak with  loved ones … 
Dear Loved Ones, 
Divine Blessings
  

On the arrival of the spring season at the beginning of the new year, in these pleasant cheerful  times of beautiful nature, during these expanding moments of joy, I grant you special blessings.

First, I congratulate you for attending the Arogya-Dham Delhi Sadhana camp on 27-28 December 2014 in such large numbers. Your high spirits and bright cheerful mood vanquished the  cold-fog. Everything seemed new and novel in the Sadhana-camp. It seemed as if the lions of Nikhil have taken a turn, and are now prepared and ready to move forward together. They have discarded the disappointment and frustration of the last year. You have, now, surely witnessed the grand Ashwamedh process. You have lived these moments yourself. I again bless and praise you for the organization, celebration and ceremony of  this grand event.
 
This time I do not want to repeat the same old things, I do not wish to remind you of the same trivial pledges and resolutions, rather I exhort you this time to stimulate the most important element of your life.  You have to perform only one process this year, and that process is: “Quicken… Quicken … Quicken … ‘. This ‘Quicken’ word is a very sweet and charming word, it is a lovely word, it gives out a very nice feeling and provides a  very sweet experience. There should be a shakeup and vibration within your body and mind. They should work perfectly with this continuous vibration. Any blockage or obstruction cannot diminish this divine vibration of your heart, nor any anger, passion or other intense impulses agitate it to beat quicker. It continues to beat with joy, the beats continue ….
 
First pulse – This vibration in your life is the basic foundation, the essential element of your being. I will tell you a little story in this context –

Once a disciple lived in the ashram of a Guru and the disciple daily asked one question – Gurudev, please tell me the basic truth of this life. The Guru continued to teach and educate him. After this, Guru asked him – Do you now understand the basic truth of life? The disciple answered – I have obtained some knowledge about God and Kundalini power etc. from these books. The Guru said – I will give you initiation about the basic truth of life today. He took him to a river flowing nearby and said – Let us cross the river. When both of them were seated in the boat, the Guru pushed the disciple out of the boat. The disciple fell overboard and the Guru also jumped in the river. The disciple started struggling to come up to water surface. The Guru was an expert swimmer, the moment the disciple came up, he again pushed down his head. After testing his patience for a long time, the Guru, who is an expression of  compassion, who is an ocean of kindness; brought the disciple up from the water. Now the Guru told the disciple – Now, I will tell you, what is the basic truth of life? When you were gasping underwater, what were you thinking about? The disciple replied – At that time, I forgot about all the knowledge of the Vedas, Upanishads, life, Brahma or scriptures, I had only one wish and desire to come out, to take a breath and escape death.

The Guru smiled and said – This is basic truth of life, the heart which is pulsating in your being, it is the ultimate truth. It must continuously beat. Everything else is just an outer casing. When you heart beats, you experience all the happiness, sorrow, joy, luxury, dresses, jewelry, home, family, community, relationships-connections, knowledge-ignorance of the world, so let your heart, the sign of the ultimate truth of life, continue to actively beat. Everything will finish for you, the day this light of the  ultimate truth extinguishes. This is the basic point of your life. Keep this pulse alive.
 
The second pulse is also necessary for you, you have to bring intense ideas to your mind. Your thoughts, your feelings, your beliefs should be innovative, you should discard the old hackneyed notions, and imbibe new ideas into your life; please, open your mind to the flow of novel ideas. Welcome the new thinking with an open mind, a new awareness. You are the Chief Justice of yourself, you know how to judge and how to decide. Convert your good beliefs into decisions. Your thoughts and your decisions will bring sweetness into all aspects of your life.
 
The third essential intense pulse is – the sound of your voice. I urge you to meet more and more people, your neighbors, your friends, your relatives, and re-connect with people with whom you haven’t interfaced for a long time. Meet your school and college classmates and welcome them with a smile. Wherever you go, in the park or in the office, spread the smiles around. Please talk to strangers, open yourself up. Nobody has tied you up, only you yourself have knotted yourself. Open yourself.
 
I advice you not to demean yourself, do not panic, do not hesitate, and do not worry. Please remove the inferiority complex, you have a distinctive personality yourself, do not undermine yourself. God has made everyone alike, He has created you same as others. Respect others, honor their knowledge, but do not humiliate yourself. When you degrade yourself, then you only damage yourself. You should stop this. You do not have to become stubborn or obstinate, but you have to certainly become firm and determined.

I state that there may be a differences of opinion among people, but there should not be a difference of minds. There might be different views of you and your family members. Your beliefs and their thinking may vary but do not impose your beliefs on anyone. This is the only definite way to retain peace and  harmony at home. Do not impose your interests, your nature on your family members, or on those junior or younger to you. They will listen to you initially in deference to your seniority, but if you remain stubborn and adamant, then they will ignore your opinions, it will feel much more awkward and uncomfortable to you then. You will feel that my own family, my own office, the people around me are the worst. To rise above such situations, you have to rise yourself above petty demands, and stop become a robotic stereotype. Ponder, think and view that there can be a thousand dimensions of a single topic.

If your parents, your family, your community have imposed any burden on yourself, and you are also imposing similar burden on others, then think, is it fair? You should reduce the burdens and encumbrances in all situations. Walk freely, always remember that one should carry least burden to enjoy the joys of this wonderful journey of life. Only then we can live freely.
 
Many Sadhaks have personally told me that this time – We will add 101 new members of Nikhil Mantra Vigyan, to them I replied that – this is your task, you do not need to take my permission for it. You do not have to take any resolution in front of me, you have to resolve yourself, in presence of your heart, the heart beating with the Divine Guru knowledge. When you perform this work with full joy without any motive, then you will surely achieve your target. This task itself will enable you to make hundreds of new friends in the garden of your life. You will make new contacts, and this will provide you genuine happiness. You do have to accomplish this task.
 
You and me have a deep relationship, then it is necessary to make it more profound. Meet me again and again, organize Sadhana camps in your areas from time to time in your areas, you should join together weekly, fortnightly, monthly, to worship, and to perform Sadhanas. This will also give you an opportunity to exchange ideas.

A dialog is absolutely necessary in the relationship between you and me, so you must constantly keep writing to me, Hey! Now you also have access to email now. When you send me email at nmv.guruji@gmail.com ; I read it and feel your presence. This process should continue. If not daily, you should send email at least once a month.
 
Do not stop in life, you should keep progressing with life. If you stop somewhere with your baggage, then the life will move on and you will remain there. Therefore it is necessary to open yourself,  reveal yourself, and express the divine Ganges river of inner joy flowing within you. When you  open yourself, the anger, enmity, hatred, everything will melt and flow away. The mind will fill with clarity, joy and happiness.

Please follow my simple advice to open yourself, it is necessary to laugh aloud once in a day, it is essential to smile five times in a day. You should walk with your feet, playing, singing laughing, worshiping, meditating, working in business or job, all of these are very important; and it is also imperative to  fulfill your hobby daily as well.

Do not trap yourself in the net of your beliefs, do not make a mesh of your thoughts. Do not limit your personality to one narrow area, rather make it multidimensional. You are a father, a mother, a son, a worker, an employee and an officer, you are everything in your life. Your personality is different everywhere,  you should look at all perspectives of this personality, understand them, and think accordingly. Do not stay limited.

I believe that life is a game, everyone has to run in this tough game, and has to struggle. “Am I Winning or losing”, don’t pollute your thoughts with these apprehensions.  You should not worry about it. The most important thing is that you have to play this game of life with full focus. This life is yours, and only you can run it well. You can live it fully.

I only state that you should live your life well, without any inhibition, with full openness, in full laughter and joy.

Always Stay Happy
 
Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

You can download the Parichay Patra and fill in your details along with your latest photograph.
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