अपनों से अपनी बात – August 2016

अपनों से अपनी बात…

 

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

 

गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व की आपको बहुत-बहुत बधाई। चारों ओर प्रसन्नता का वातावरण है। प्रकृति अपनी पूरी साज-सज्जा के साथ सृष्टि में खिल रही है। इस प्रकृति के साथ जो सदाशिव की शक्ति हैं, उस शक्ति से तारतम्य, योग बिठाते हुए हम सभी कर्म पथ पर गतिशील हों और आनन्दघन चित्त स्वरूप प्रभु निखिल हमारे हृदय कमलदल पर विराजमान हों। वे चक्र जिन्हें योगी कुण्डलिनी चक्र कहते हैं, वे चक्र जिन्हें सन्त परमानन्द कहते हैं, वे चक्र जिन्हें गृहस्थ आनन्द चक्र कहते हैं, वे सारे चक्र पूर्ण रूप से जाग्रत हों।

 

यह संसार, यह प्रकृति कुछ नियम, कुछ आचार, कुछ विचार से चलती है जिसे हम शरीर, बुद्धि और मन कहते हैं। इन तीन तत्वों का संयोग ही तो संसार में फल प्राप्ति का एकमात्र माध्यम है। यही तो सिद्धियों को प्राप्त करने का एकमात्र पथ है। इस पथ पर निरन्तर और निरन्तर गतिशील होना ही तो हमारा कर्त्तव्य है।

 

इस पथ में तुम आगे बढ़ते रहना, यह पथ निर्जन है, इस पथ पर तुम केवल अपनी ही शक्ति के बल पर चल सकते हो। वास्तव में इस संसार में कोई किसी का सहारा नहीं होता। जीवन पथ के सारे यात्री एकांकी ही सफर करते हैं। सबको अपने-अपने सहारे अपने ही भीतर से उत्पन्न करने पड़ते हैं क्योंकि बाहर के सब सहारे तो अस्थायी हैं।

 

अभ्यासयोगयुक्तेन चेतसा नान्यगामिना। 
परमं पुरुषं दिव्यं याति पार्थानुचिन्तयन्॥
कविं पुराणमनुशासितार मणोरणीयांसमनुस्मरेद्यः। 
सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूप मादित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥

 

गुरु को, ईश्‍वर को, ईष्ट को अपने मन में अचल भाव में स्थापित करने हेतु निरन्तर और निरन्तर अभ्यास आवश्यक है और इस अभ्यास से ऊपर कर्म है। अभ्यास और कर्म के योग को प्राप्त करने के लिये पूर्ण समर्पण का भाव आवश्यक है। यह समर्पण, स्व का समर्पण उस आराध्य के प्रति समर्पण है जो परम शांति और परम भाव को प्रदान करने वाला है। जो हमें हमारे ही भीतर स्थापित परम शांत शिव भाव से, शक्ति भाव से हमारा परिचय करा देता है।

 

पहली क्रिया प्रयत्न है, दूसरी क्रिया अभ्यास है लेकिन प्रयत्न और अभ्यास ज्ञान के बिना व्यर्थ हैं, दिशाहीन हैं। ज्ञान के लिये आन्तरिक ध्यान आवश्यक है। ध्यान का अर्थ है – एकाग्र होना, अपनी शक्तियों को छिन्न-भिन्न होने से रोकना। यही तो वास्तविक साधना है।
जब एक बार लगन लग जाती है तो वह लगन, अगन (अग्नि) बन जाती है। इस ‘लगन को अगन’ में परिवर्तित करने के लिये क्या करना है? निरन्तर और निरन्तर अभ्यास करते रहो, निरन्तर और निरन्तर कर्म में परायण होते रहो। अपने निमित्त कर्मों को करते रहो, इनके साथ अपने मन और बुद्धि को भी लगा दो।

 

तुम्हारे भीतर एक अवधारणा है और उस अवधारणा को धारण करने की शक्ति भी है। इस शक्ति तत्व को ध्यान और कर्म के सहयोग से ही अनुभव और विकसित किया जा सकता है।

 

जो प्रकृति और सृष्टि का नियम है, वही तो हम सब के भीतर है। इस सृष्टि में परिवर्तन के बिना प्रसन्नता नहीं और प्रसन्नता नहीं तो कुछ तात्कालिक उपलब्धि प्राप्त होने पर भी अपूर्णता रहती है। प्रसन्नता में ही तो शांति है, पर एक बात जान लो – इस शांति के लिये संहार भी आवश्यक है। यह संहार शक्ति तुम्हें निरन्तर अभ्यास और कर्म के संयोग से ही प्राप्त हो सकती है। हर कोई अपने जीवन में नवीन निर्माण करना चाहता है, सृजन करना चाहता है। हर कोई अपना एक लोक स्थापित करना चाहता है। इस चराचर जगत (संसार) में तुम्हारा भी एक लघु संसार है। जिसमें तुम्हारी सारी गतिविधियां चल रही हैं। जिसके तुम स्वयं नियंता या नियामक हो। अपने इस लघु संसार को गतिशील बनाये रखने के लिये शिव के उस स्वरूप का ध्यान करो जो अर्द्धनारीश्‍वर हैं। जिनके आधे भाग में शक्ति हैं और आधे भाग में शिव हैं। शिव में शक्ति हैं, शक्ति में शिव हैं।

 

जब भी तुम्हें लगे तुम्हें अपना अभीष्ट मार्ग नहीं मिल रहा है तो अपने गुरु को स्मरण करो, उस गुरु तत्व के स्वरूप को समर्पित हो जाओ। अलग-अलग दिशा में जाने वाला, पथिक कभी भी अपने गंतव्य को प्राप्त नहीं कर सकता है। तुमने अपने मार्ग का चयन कर लिया है, तुमने मन और बुद्धि के द्वारा इस पथ का चयन किया है, यही पथ तो सर्वश्रेष्ठ पथ है जिसे तुमने स्वयं स्वीकार किया है। तुम्हारी स्वीकृति ही सबसे आवश्यक है।

 

दुनिया ने क्या कहा? इस पर तुमने विचार नहीं किया, तुम्हारे मन ने जो कहा, तुम्हारे मन ने जो उचित समझा उस पथ को स्वीकार कर तुमने आगे बढ़ने का निश्‍चय किया है। यही तो सबसे बड़ी बात है। तुम्हारा यह निर्णय तुम्हारे इस जीवन की सबसे बड़ी क्रांतिकारी घटना है, जिस दिन तुम स्व तंत्रता के पथ पर चल पड़े हो। दूसरों के तंत्र का परित्याग कर तुमने अपने मन के तंत्र को (अपने स्वयं के तंत्र को) स्वीकार किया है। इसलिये शौर्य भाव के साथ, संहार भाव के साथ कर्म पथ पर गतिशील हो जाओ। संहार, सृजन और पालन जीवन की निरन्तर चलने वाली क्रियाएं हैं। इन तीनों क्रियाओं में तुम्हें साक्षीभूत होकर, स्थितप्रज्ञ होकर कार्यशील होना है। यही तो शक्ति आराधना का सम्पूर्ण स्वरूप है।

 

शक्ति ब्रह्माण्ड में सब जगह है, सब में है, तुम्हारे अन्दर भी शक्ति है। तुम्हारे भीतर ही एक निर्माण शक्ति ‘भुवनेश्‍वरी’ है, तुम्हारे भीतर ही संहार शक्ति ‘महाकाली’ भी हैं। इस सृजन और संहार का संयोग करना है। साधना का मार्ग अभ्यास का मार्ग है। यही तो नवरात्रि की साधना का भाव है, अपने आपको नवीनता से युक्त करना और जीर्णक्षीण पुरातन को समाप्त करना।

 

जब तुम इस नवरात्रि में ‘भुवनेश्‍वरी-महाकाली’ साधना करो तो एक संकल्प अवश्य लेना- ‘मैं अपने मन के पाश (बंधन) काट रहा हूं, मैं गतिशील हो रहा हूं उस पथ पर जहां स्वयं के सृजन का आनन्द है। ईश्‍वर भुवनेश्‍वर हैं, महाकाल शिव हैं, उस महाकाल और भुवनेश्‍वर की यह सृष्टि तुम्हारे भीतर स्थापित है। अपनी इस सृष्टि को साधना, अभ्यास और कर्म के साथ जोड़ देना। तुम समर्थ हो, तुम अपने दोषों का शमन कर सकते हो। तुम इस आश्‍विन नवरात्रि में भुवेनश्‍वरी-महाकाली शक्ति साधना अवश्य करना।
याद रखना, इस पथ पर तुम्हें विचलित करने के लिये संसार में कई बाधाएं आयेंगी। कई संकट आयेंगे लेकिन उन कष्ट, संकटों को दर-किनार करते हुए तुम अपने लक्ष्य को ध्यान में रखना। तुम्हारा चित्त और सद्गुरु का चित्त एक है, तुम्हारा प्राण तत्व और सद्गुरु का प्राण तत्व एक है। गुरु के साथ तुम एकाकार हो… कहीं कोई भेद नहीं… अपने भीतर के इस परम शक्ति तत्व को पहचानो, जानो और निरन्तर गतिशील होते रहो… यह ब्रह्माण्ड तुम्हारा है…

 

सस्नेह आपका अपना
नन्दकिशोर श्रीमाली
Dialog with the  Loved One,

Divine Blessings,

Heartiest Congratulations to you on the auspicious occasion of Guru Poornima. There is a refreshing environment of happiness all around. The nature is flourishing in the universe in its full bloom. With the  divine energy of SadaShiva in this nature, we should merge and create a dynamic balance while stepping the path of Karma actions, and may the happy or joyful divine Nikhil stays or resides in the core of our hearts. The Chakras which the Yogis call Kundalini Chakras, the Chakras which the saints call Divine Joy or bliss, the Chakras which married or family people call Joyous or ecstatic Chakras -these all chakras gets completely activated and charged.

This world, this nature runs on some rules, some regulations in a specific  order, which we call as body, intellect and mind. The combination of this trinity is the only way to obtain success in this world. This is the only path to obtain Siddhi accomplishments.  Our sole duty is to keep continuing on this path.

You ought to continue to move forward on this path, this is a solitary trail. You can progress on this path only through the strength of your own power. In reality, nobody in this world has any support. All travellers  are alone in their life journey. Everyone has to create his own support mechanism from within, as all the external supports are transient and temporary.

Abyaasayogayukten Chetsaa Nanyagaaminaa |

Paramam Purusham Diwyam Yaati Paarthanuchintayana ||

Kavim Puraanamanushasitaara ManoranaiyaamsamanusmaredhyaH |

Sarvasya Dhaataramachintyaroopa Maadhtyavarnam TamasaH Parastaat ||

A sustained continuous practice is required to imbibe the Guru, the God, the Deity permanently in our mind, and actions are the results of this practice. A sense of absolute surrender and dedication is required to obtain this dynamic combination of practice and resultant actions. This dedication, the surrender of the self is the surrender to that Lord, who grants the ultimate joy and ultimate peace. He is the one who calmly introduces us to the absolute calm Shiva, the Shakti expression, present within our own self.

The first act is to try to attempt, followed by practice, but these attempts and practices are useless and directionless without wisdom. An inner meditation is essential to obtain the wisdom of this knowledge. Meditation means – to concentrate, to stop your powers from dithering away. This is the real Sadhana.

When the passion originates, it quickly transforms into a fire. What do we need to transform this fervor into the flame. Persistently continue to practice, and keep performing actions.  Continue to pursue your specific actions, and fully engage your mind and intellect into this.

Your mind holds a concept, an idea; and it also has the power to follow through this idea. This mental energy element can only be nurtured through the supporting combination of concentration and experience.

The basic laws of the nature and the universe, also reside within all of us. There is no happiness without change, and any sudden success remains incomplete in the absence of happiness. The peace comes with happiness, however you should understand that – the destruction is also essential to achieve this peace. You may attain this destructive power only through steady practice and exercises. Everyone wishes to build something new in his life, wants to create. Everyone wants to own a public setting. Everyone desires to build his own world. You also have your own private world in this living universe, which is full of your own activities. You yourself are either the controller or a regulator of this world. You should meditate on the Ardhanareeswara form of Lord Shiva to dynamically extend your own universe. This form has both Shiva and Shakti in each half. The Shiva is the Shakti, the Shakti is within the Shiva.

Whenever you seek directions and guidance, meditate on your Gurudev, and immerse your own self into Gurudev. A traveller wandering in multiple directions can never reach his destination. You have chosen your own path, you have decided through your own mind and intellect, your mind has recognized this as the best path.This acknowledgement is the most significant element.

You ignored the comments of the society, you recognized whatever your mind felt and decided, and you have decided to progress forward on this path. This is the biggest fact. This determination and decision of yours, is the  greatest revolutionary event in your life, it is the day you took this independent route. You acknowledge the control of your own mind abandoning control of others. Therefore, start passionately on this action-full path, with full energy and fervour. The destruction, creation and sustenance continue throughout the life. You have to perform your actions with a detached sense of observer. This is the absolute form of Shakti devotion.

The Energetic power is omnipresent in the universe, it is present within all, it is within you as well. The creative power “Bhuvaneshwari” is within you, and the destructive power “Mahakali” is also within you. You should merge this creation and destruction. The path of Sadhana is full of steady practices. This is the spiritual expression of the Navratri Sadhana, assimilate fresh novelty within yourself, and to eliminate the old, worn-out fragments.

You should make a resolution during this Navratri while performing “Bhuvaneshwari-Mahakali” Sadhana that – I am tearing off the bondages within my mind, I am progressing ahead, on the joyful path of creation of self.” The divine Almighty is Bhuvaneshwar, Lord Shiva is Mahakaal, and this universe of Mahakaal and Bhuvaneshwar resides within your own inner self. You should merge this divine universe with your Sadhana, practices and karma-actions. You are fully capable to eliminate your faults. You should definitely perform Bhuvaneshwari-Mahakali Sadhana during this Ashwin Navratri.

Remember, many obstacles and problems will come on this path to distract you. You will have to face many crises. However, you should concentrate on your goal, ignoring these obstacles and problems. The heart of your SadGuru and yours is one and the same one, the soul of your SadGurudev and yours is one and the same one. You are completely merged with your Guru… there is no distinction between the two… recognize this ultimate supreme power within your own self, realize it, and continue to progress ahead… This universe is yours …

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

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