अपनों से अपनी बात – April 2016

अपनों से अपनी बात…

प्रिय आत्मन्,
आशीर्वाद,

आपका और मेरा घनिष्टतम् सम्बन्ध है और इसी कारण आप अपने मन की बात मुझ से पूरी तरह से डहरीश करते है और मैं भी अपने मन की बात आपसे डहरीश करता हूं। हमारा आपस में विचारों का आदान-प्रदान ही हमारे सम्बन्धों को और भी घनिष्ट, तीव्र बना देता है और जिस प्रकार आप गुरु में खो जाते है, आत्मसार हो जाते है, उसी प्रकार मैं भी आपकी चेतना से एकाकार हो जाता हूं। यह आपसी मिलन ही हमारी सबसे बड़ी धरोहर है और इस धरोहर को हमसे कोई भी छिन नहीं सकता है और न ही इसे कोई कमजोर कर सकता है। आपसी सम्बन्धों की यह पूंजी निरन्तर और निरन्तर बढ़ती ही जा रही है…, इस वृद्धि का कभी समापन नहीं होगा…।

फरवरी महीने की बात है, एक दिन मन में विचार आया कि सोमनाथ चला जाएं। कई सालों से मेरी इच्छा थी और जब इच्छा बलवती हुई तो मैंने कहा कि अब रुकना नहीं है… अब आपका गुरु तो घर की कैद में रह नहीं सकता है। विचार आया और उसे क्रिया में परिणित करने के लिये दो घण्टे में जोधपुर से रवाना हो गया। कहां जोधपुर और कहां सोमनाथ? 900 कि.मी. का फासला था… ड्राईवर को बोला और रवाना हो गया… एक कहावत है कि – ‘रमता जोगी और बहता पानी ही अच्छा रहता है’ और जब भाव आ जाए तो उसे पूर्ण कर ही देना चाहिए। 15 घण्टे लगातार चलता रहा और सीधा सोमनाथ जाकर ही विश्राम लिया, जब आप अपने मन से यात्रा करते हो तो किसी भी प्रकार की थकान नहीं लगती है। जब कोई कार्य जबरदस्ती करना हो तो थोड़ी देर में ही व्यक्ति थक जाता है, आशंका से ग्रस्त हो जाता है लेकिन जब मन से काम करते है, मन से चलते है तो किसी प्रकार की कोई थकान नहीं लगती। 

अगले महीने तो वैद्यनाथ धाम जाना ही था और यह तो भगवान सदाशिव की प्रेरणा ही थी कि सोम अर्थात् अमृत के देव, जो प्रभास पाटन में सोमनाथ ज्योतिर्लिंग स्वरूप में स्थापित है, उनका अभिषेक किया। कोई सोच सकता है कि एक महीने में इतनी तीर्थ यात्रा आवश्यक थोड़े ही है… वैसे जीवन में तो कुछ भी आवश्यक नहीं है, जो आप करते हो और जिसमें आनन्द आता है वही जीवन में सबसे आवश्यक है। सोमनाथ में बड़ा ही मजा आया, दो दिन आराम से एक सामान्य तीर्थयात्री बनकर रहा, दो दिन समुद्र किनारे अपनी मस्ती में शिव भाव के साथ रहा…।

सोमनाथ में भगवान शिव के दिव्यमान स्वरूप ‘सोमनाथ शिवलिंग’ के दर्शन और रुद्राभिषेक सम्पन्न किये। सोमनाथ में प्रतिदिन 11 से 12 बजे विशेष अभिषेक सम्पन्न होते है। बड़े आनन्द से उस अभिषेक की क्रिया को सम्पन्न किया और बार-बार एक ही विचार आता रहा कि, मेरे सभी शिष्यों के जीवन में इसी प्रकार की आनन्द रस वर्षा होती रहे। सभी शिष्यों के जीवन में दूध, दही, शर्करा, मधु और घृत की अमृत धारा बहती रहे। मैं जिस तीर्थ स्थान पर जाता हूं, इन्हीं वचनों को बार-बार बोलता हूं – जो मेरे शिष्यों कामना है, वही मेरी कामना है… उनकी कामना पूर्ति में ही मेरी कामना पूर्ति है….।

सोमनाथ मन्दिर के बाहर प्रांगण में एक ओर दिव्य स्थान है, जहां भगवान श्रीकृष्ण को तीर लगा था और जहां से भगवान श्रीकृष्ण ने गोलोक धाम प्रस्थान किया था। उस स्थान पर विचार आया कि – श्रीकृष्ण की उस स्थली पर चला जाएं… जहां भगवान कृष्ण कई वर्षों तक रहे… निवास किया… अपना राज-काज चलाया… रुकमणी और सत्यभामा के साथ रहे… और मुझे उस स्थान पर अवश्य जाना चाहिए।

जब कृष्ण बुलाते है तो संसार में कोई रुक नहीं सकता है और विचार आते ही सोमनाथ से द्वारका के लिये मैं रवाना हो गया। मुझे कोई छुट्टी इत्यादि की तो आवश्यकता नहीं थी। दो दिन द्वारका रहा, उस स्थान पर बैठा जहां श्री कृष्ण का दरबार लगता था, वह स्थान को देखा जहां सुदामा और श्रीकृष्ण का मिलन हुआ था। साथ ही साथ उस द्वीप पर भी गया जहां भगवान श्रीकृष्ण का भवन था। भूमि से अलग समुद्र में स्थित यह स्थान ‘भेंट द्वारका’ है, बड़ा ही सुन्दर स्थान है। वहां सुबह से शाम तक रहा। वापसी में विचार आया कि भगवान शिव के नागेश्‍वर स्वरूप के भी दर्शन किये जाएं और नागेश्‍वर ज्योतिर्लिंग ‘दारुकवन नागेश’ का अभिषेक सम्पन्न किया। मन में कहीं कोई जल्दबाजी नहीं, एक निश्‍चितंता के भाव के साथ।

प्रत्येक व्यक्ति को यात्रा अवश्य करनी चाहिए… यात्रा ही जीवन के विभिन्न पहलूओं को दर्शाती है। हम अनजाने लोगों से मिलते है और हमें बहुत कुछ अनुभव प्राप्त होता है। एक विशेष बात यह है कि जब गुरु और ईश्‍वर की आज्ञा होती है तो मनुष्य अपने कदम रोक नहीं सकता है। विचार करो… आप शिविरों में क्यों आते हो? और मैं आपके पास शिविरों में क्यों आता हूं? जब आप मन से बुलाते हो तो मैं अपने आपको रोक नहीं पाता हूं और जब मैं आपको बुलाता हूं तो आप भी दौड़े-दौड़े दिल्ली, जोधपुर चले आते हो। इसमें शब्दों के आदान-प्रदान की आवश्यकता नहीं है। यह सब क्रिया विचारों से सम्पन्न होती है।

कई लोग आपको कहते भी होंगे कि – गुरु के पास जाने में क्या मजा आता है?, शिविर में क्या मजा आता है? घर में ही बैठकर भजन सम्पन्न हो सकता है, मंत्र जप हो सकता है तो फिर गुरु से मिलने इतनी दूर जाने की क्या आवश्यकता है? उन लोगों को आप अपने मन के भाव समझा नहीं सकते है। यह भाव शक्ति ही शिष्य और गुरु को जीवन्त बनाये रखती है। हम जीवन्त है इसीलिये हमारे जीवन में एक चाह है, एक तड़फ है, एक मिलने की आतुरता है और इसी से तो मन को आनन्द प्राप्त होता है। वास्तव में मन का अभिषेक तो गुरु से मिलकर ही सम्पन्न होता है। 

जब हम किसी दिव्य स्थान, दिव्य मूर्ति, दिव्य तीर्थ, दिव्य व्यक्ति के दर्शन करते है, उन्हें स्पर्श करते है तो हमें क्या मिलता है? हमें उत्साह और प्रेरणा की शक्ति प्राप्त होती है। यह उत्साह और प्रेरणा घर में बैठकर प्राप्त नहीं हो सकती है। यह उत्साह और प्रेरणा की क्रिया तो मिलन से ही संभव होती है। संसार जहां आपके उत्साह खण्डन की क्रिया में लगा रहता है, वही गुरु आपके उत्साह वर्द्धन की क्रिया सम्पन्न करते है। यही तो वास्तविक पूजन है और अभिषेक है। 

जब आप गुरु से मिलते है तो एक क्रिया होती है और उस क्रिया से आपका आवेश, आवेग शांत हो जाता है और जब आवेश शांत हो जाता है तो आपको स्वयं की शक्ति का आभास होता है, स्वयं की शक्ति का भान होता है और सबसे बड़ी बात है, आप स्वयं पर विश्‍वास करने लगते है। 

आपको आपका स्वयं का विश्‍वास, आपकी स्वयं की शक्ति प्रदान करने के लिये ही तो आपका और मेरा मिलन हुआ है और बार-बार यह मिलन होता रहेगा…।

आप सभी को होली पर्व की शुभकामनाएं, नव संवत्सर चैत्र नवरात्रि (8 अप्रैल 2016) से प्रारम्भ हो रहा है, आपको इस नये वर्ष में नवीन जोश और उत्साह के साथ कार्य करना है और अपने इच्छित लक्ष्यों को प्राप्त करना है।

सस्नेह आपका अपना

नन्दकिशोर श्रीमाली
पुनश्‍चः आपके आरोग्यधाम का कार्य तीव्र गति से चल रहा है।
Dialog with Loved Ones …

Dear Loved One,

Divine Blessings,

Both you and I share a deep relationship, and therefore, you completely share your mental thoughts with me, and I too share my mental thoughts with you. This mutual exchange of ideas among ourselves deepens and  intensifies our relationship. As you get connected within with your Guru, merge your-self with Divine; similarly I too blend into your consciousness. This mutual union is our greatest asset and no-one can either snatch or weaken this divine heritage. This wealth of mutual connection is steadily continuously growing…, this growth will never terminate ….

It was in February month, a novel thought entered my mind to visit Somnath. I had been thinking about it for many years, and when this desire got strengthened, I realized .. nothing can stop it now, the shackles of home cannot bind your Guru now. The idea germinated  in my mind, and within two hours I left Jodhpur to convert the thought into action. How distant is Somnath from Jodhpur? 900 Km… I told the driver and the journey started. There is a saying – “Only a wandering hermit and flowing water make sense”, and when a thought seeds in, it should be accomplished. The journey continued for 15 hours, and we rested only after reaching Somnath; when you travel with a favourable mind, then you don’t feel any tiredness. When one has to complete a task forcibly, then the person gets exhausted within some time, and gets strained from worries. However, when we work full-heartedly, when our mind is free, then we do not get any kind of fatigue.

I had to go to Baidyanath Dham next month, it was an inspiration from Lord SadaShiv, the Lord of Som i.e. Amrit-Divine-Nectar, whose abode is in Prabhas Patan within the Somnath Jyotirling form;  I performed the Abhishek anointment-consecration rites. Anyone can question the need for so much pilgrimage in a month… In any case nothing is necessary in life, whatever you do, whatever gives you joy, only that is most essential in life. I thoroughly enjoyed my stay at Somnath, lived like a simple pilgrim for two days, spent two days at the beach with Shiva-sensation thoughts…

I witnessed the magnificent form of Lord Shiva “Somnath Shivling” and accomplished Rudrabhishek. Special Abhishek consecration is performed at Somnath daily from 11 am to 12 pm. I performed the Abhishek with great joy and only one thought kept entering my mind that, may similar showers of joy keep occurring in the lives of all my disciples. May the Divine nectar of milk, yogurt, sugar, honey and butter keep flowing in their lives. Whenever I visit any holy shrine, I repeat the same words again and again – Whatever my disciples wish for, that itself is my wish … Fulfilment of their wishes is fulfilment of my wishes…

There is a spot outside in the arena  of Somnath temple, where Lord Krishna got hit by an arrow and from where He departed to Golok Dham. A thought came into the mind – to visit that holy site of Lord Krishna… where Lord Krishna spent many years… made it His abode… controlled His kingdom… lived with Rukmani and Satyabhama… and I should definitely visit that location.

When Lord Krishna invokes, then nobody in this world can stop it, and I immediately started for Dwarka from Somnath. I did not need to take any leave from any office. I stayed in Dwarka for two days, sat at the spot where Shree Krishna used to hold His court, and I visited the rendezvous site of Sudama and Shree Krishna. I also visited the island containing the palace of Lord Shree Krishna. This spot “Bhet Dwarka” is a separate island in the sea, away from the continental-landmass, it is a very beautiful spot. I stayed there from morning till evening. While returning, a thought came to visit the Nageshwar form of Lord Shiva, and I accomplished the Abhishek of “Darukavan Nagesh” at Nageshwar Jyotirling. No hurry or rush in mind, with complete calm and peace in mind.

Everyone person should travel… the travel reflects different aspects of life. We meet new people, and we get a lot of experience. A special point is that when Guru and God commands, a person cannot stop his steps. Think, ponder… Why do you visit the Sadhana camps?  And why do I visit you in Sadhana camps? When you invoke me from your mind then I am unable to stop myself, and when I call you, you also rush to Delhi, Jodhpur. There is no need to verbally communicate through words. This entire process gets accomplished through thoughts.

Many people must be questioning you – What joy do you get from visiting your Guru? What joy do you obtain in Sadhana camp? You can sing bhajans hymns at home, you can chant mantras at home, then what is the need to travel such a long distance to meet Guru?  Those people cannot comprehend your thoughts. This emotional sense enlivens the disciple and Guru. We are conscious awakened, so our life has desires, a keen zeal, an impulse to meet; and this grants joy to the mind. In reality the consecration Abhishek of mind is possible only after meeting the Guru.

When we visit a holy place, a pious shrine, a sacred spot or a divine personage, touch Them, then what do we achieve? We obtain the energetic power of enthusiasm and motivation. We cannot get this energetic enthusiasm and motivation by sitting at home. This process of enthusiasm and motivation is possible only though the union. This world keeps on destroying your enthusiastic energy, whereas Guru is constantly engaged in incrementing your enthusiastic energy. This is the reality of worship and consecration.

When you meet your Guru, then a divine process initiates, and this process calms your impulse and instinct excitement, and when this impulse quietens down, then you start feeling your energy, starts to realize your inner energy, and most importantly, start believing in yourself.

The Divine union of you and me is for you to believe in yourself, for you to start realizing your own energy, and this divine union will continue to repeat again and again ….

Best wishes to all of you on Holi festival, the new Sanvatsar year is starting from Cheitra Navraatri (8 April 2016), you have to work in this new year with fresh zeal and enthusiasm, and you have to achieve your desired goals.

 

Cordially yours

Nand Kishore Shrimali

PS: The construction of your Arogya Dham is progressing in full swing with full speed.

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