SadGurudev Blessing – Diksha Shaktipaat

सद्गुरु वरदान
दीक्षा-शक्तिपात
जिज्ञासाएं और समाधान

 

‘‘देवि! दीक्षा विहीनस्य न सिद्धिं न च सद्गतिम्’’
हे पार्वती! दीक्षा रहित व्यक्ति को न तो सिद्धि प्राप्त होती है न सद्गति ही प्राप्त हो पाती है। अत: सर्वप्रकार से प्रयास करके श्री गुरु से दीक्षा अवश्य प्राप्त करनी चाहिए।
अत्यन्त सुन्दर दिग्दर्शन  ‘‘दीक्षा क्रम तथा अभिषेक’’ नामक विशद लेख में इस प्रकार किया गया है –

शास्त्रों में बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति में आत्मशक्ति के रूप में पराशक्ति विद्यमान रहती हैं जो जन्म-जन्मान्तरों से सांसारिक माया-मोह, आणव, मायिक, कार्मिक मलों तथा पंच-कंचुकों से आवेष्ठित रहने के कारण निष्क्रिय तथा सुषुप्त अवस्था में रहती हैं। जब सद्गुरु द्वारा दीक्षा संस्कार सम्पन्न किया जाता है तो वह मायावी पाश बन्धन (आवरण) टूट जाता है तथा शिष्य को अन्तर्निहित दिव्य-शक्ति का आभास हो जाता है। इस शक्ति की अभिव्यक्ति को ही ‘शक्तिपात’ (कुण्डलिनी जागरण) होना कहा जाता है।
दीक्षा का विषय, अत्यन्त रहस्यमय, गोपनीय, परमगूढ़ तथा विस्तृत है। सदगुरु से दीक्षा प्राप्त हो जाने पर शिष्य में दिव्य शक्ति का संचार होना प्रारम्भ हो जाता है तथा उसके साधना पथ में प्रबल विघ्नों के रूप में उपस्थित होने वाले दो महान रिपुओं (शत्रुओं) यथा आवरण (शुद्ध ज्ञान को ढंक देना) तथा विक्षेप (विपरीत आभास कराना) का दमन हो जाता है। 
दीक्षा शब्द दो अक्षरों ‘दी’ तथा ‘क्षा’ से बना है। ‘दी’ का तात्पर्य ‘देना’ तथा ‘क्षा’ का तात्पर्य ‘क्षरण’ (नष्ट) करना होता है। दीक्षा का अभिप्राय बताते हुए तंत्र शास्त्र कहते हैं –
 

  • प्रथम तो यह दिव्यज्ञान देती है उसके पश्‍चात् समस्त पापों को भी नष्ट कर देती है।
‘‘दीयते ज्ञानमत्यर्थ-क्षीयते पाश बन्धनम्’’
  • दीक्षा की क्रिया द्वारा भगवान शिव के साथ साधक का तादात्म्य स्थापित हो जाता है तथा वह साधक के त्रिविध दोषों को नष्ट कर देते हैं।

 

‘‘ददाति शिव तादात्म्यं-क्षिणोति च मलत्रयम्’’
  • दीक्षा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त होता है तथा समस्त पापों का क्षय होता है।

 

‘‘दीयते परमज्ञानं-क्षीयते पाप पद्धति:
तेन दीक्षोच्यते मंत्रे-स्वागमार्थ बला वलात्॥’’
  • दीक्षा प्रत्यक्ष विज्ञान, फलप्रदायक, द्वैतभाव को नष्ट करने वाली, मनोलय कारिणी तथा मुक्ति प्रदात्री है।
‘‘विज्ञानफलदा सैव-द्वितीया लयकारिणी
तृतीया मुक्तिदा चैव-तस्माद्दीक्षेति प्रीयते’’
 

 

दीक्षा की आवश्यकता तथा माहात्म्य
शास्त्रों का उद्घोष है कि ‘दीक्षा लेना’ तथा ‘दीक्षा देना’ दोनों ही सर्वश्रेष्ट क्रियाऐं हैं। दीक्षा से श्रेष्ठ न कोई ज्ञान है न तपस्या है। दीक्षा काल ही सर्वश्रेष्ट काल (समय) है। शक्तिपात द्वारा शिष्य को न केवल गुरुदेव का प्रसाद एवं पराशक्ति का आशीर्वाद ही प्राप्त होता है वरन् वह तत्व ज्ञान का अधिकारी भी बन जाता है। दीक्षा प्राप्त हो जाने पर शिष्य मनुष्यत्व से शिवत्व के स्तर तक पहुंच सकता है।

 

शक्तिपात होने पर क्या होता है, इसका वर्णन आगम शास्त्रों में विस्तार से किया गया है। यथा –
1. ‘‘उत्पन्न शक्ति बोधस्य… सहजावस्था स्वयमेव प्रजायते’’
शक्तिपात होते ही शिष्य के अन्दर विभिन्न यौगिक क्रियाऐं प्रारम्भ हो जाती हैं। उसे इसके लिए कोई प्रयास नहीं करना पड़ता।
2. ‘‘सुप्ता गुरु प्रसादेन-यदा जागर्ति कुण्डली’’…
शक्तिपात होते ही जन्म-जन्मान्तरों से मूलाधार में सुषुप्त कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है तथा वह षट्चक्रों का भेदन करती हुई सहस्रार में अपने शिव से मिलने हेतु यात्रा आरम्भ कर देती है।
3. ‘‘दीक्षाग्नि कर्म दग्धासो… निर्जीवस्तु शिवोभवेत्’’
दीक्षा रूपी अग्नि में समस्त कर्म भस्म हो जाते हैं, माया का बन्धन छूट जाता है तथा शिष्य ‘शिवत्व’ प्राप्त कर लेता है।
4. ‘‘शक्तिपातेन संयुक्ता… विमुक्तिर्नात्र संशय:’’
जब सद्गुरु शक्तिपात करके शिष्य को मंत्रादि (महावाक्य) प्रदान करते हैं तो उसकी मुक्ति हो जाती है।
5. ‘‘अदीक्षिता ये कुर्वन्ति… शिलाया मुप्त बीजवत्’’
जिस प्रकार किसी पत्थर पर बोया हुआ बीज निष्फल हो जाता है उसी प्रकार अदीक्षित व्यक्ति द्वारा की गई साधना निष्फल हो जाती है।
6. ‘‘देवि! दीक्षा विहीनस्य न सिद्धिं न च सद्गतिम्’’
हे पार्वती! दीक्षा रहित व्यक्ति को न तो सिद्धि प्राप्त होती है न सद्गति ही प्राप्त हो पाती है। अत: सर्वप्रकार से प्रयास करके श्री गुरु से दीक्षा अवश्य प्राप्त करनी चाहिए।
महान पुण्य अर्जन करने पर ही शक्तिपात अथवा दीक्षा प्राप्त होती है, जिस दीक्षा से मलत्रय विमुक्त होकर जीव उत्कट साधना द्वारा परम कारणरूप आनन्द (परब्रह्म) का साक्षात्कार कर विशोकावस्था को प्राप्त करता है:-

 

‘‘स शोकं तरति, सशोंकं तरति, स शोकं तरति’’
योग का ‘अथ:’ कुण्डिलिनी जागरण और ‘इति’ उसका सहस्रार में पहुंचना है। यही शक्ति योग है। यह देखने में आता है कि सभी धर्मोंः उपधर्मों तथा सम्प्रदायों ने इसी को तोड़-मोड़कर अपने-अपने ढंग से अपने-अपने सम्प्रदायों में अपनया है।

 

दीक्षा के प्रकार (शक्तिपात करने की विधियां)
उपास्य देवता, उपासक ‘शिष्य’ की रूचि, गुरु-शिष्य की पात्रता, उपासना पद्धति की भिन्नता, अधिकार भेद, साधना विधियों की पृथकता तथा देश-काल की परिस्थितियों की अनुरूपता के कारण दीक्षा की विभिन्न विधियों का नामकरण हुआ है। दीक्षा विशेष के नाम से ही दीक्षा की विधि का आभास मिल जाता है। शास्त्रों में नाना प्रकार की दीक्षा विधियों का उल्लेख मिलता है। यथा-
(1) स्पर्श (स्पर्शिकी) दीक्षा (2) चाक्षुसी (दृष्टि) दीक्षा (3) वाचिकी (शब्द) दीक्षा (4) मानसी (ध्यान) दीक्षा (5) आणवी दीक्षा। 
इसके अतिरिक्त भी जिन दीक्षाओं का उल्लेख किया गया है उनके नाम हैं – मन्त्री दीक्षा, शक्ति दीक्षा, शाम्भवी दीक्षा, अभिसेचिका दीक्षा, स्मार्ती दीक्षा तथा योग दीक्षा। किसी भी विधि से सद्गुरु द्वारा प्राप्त दीक्षा शिष्य को भोग-मोक्ष प्रदान करने में सहायक होती हैं।

 

तंत्र शास्त्र बताते हैं कि जिस प्रकार पक्षिणी, कच्छवी तथा मछली, अपने बच्चों का पालन-पोषण करती हैं उसी प्रकार सद्गुरु भी शिष्य को स्पर्श करके, उसके ऊपर दृष्टि डालकर तथा अपने ध्यान (संकल्प) से अपनी आध्यात्मिक शक्ति को शिष्य में प्रविष्ट कराके उसको आत्मसाक्षात्कार करा देते हैं।
भगवत्पाद् श्री शंकराचार्य ने सद्गुरु की महत्ता का वर्णन करते हुए अपने ग्रन्थ ‘शतश्‍लोकी’ के प्रथम श्‍लोक में ही लिख दिया है-
‘‘दृष्टान्तो नैवदृष्ट… स्वीयं साम्यं विधत्ते’’
इस संसार में शक्तिपात करके शिष्य को ब्रह्मज्ञान का उपदेश देने वाले सद्गुरु की उपमा देने के लिए कुछ भी विद्यमान नहीं है। गुरु तो पारसमणि से भी उच्चकोटि के होते हैं क्योंकि पारसमणि स्पर्श करके लोहे को सोना तो बना देता है परन्तु पारसमणि नहीं बना सकता जबकि श्री गुरुदेव शिष्य को अपना ही रूप दे डालते हैं-अपने ही जैसा बना देते हैं।

 

(1) स्पर्श दीक्षा –
‘यथा पक्षी स्वपक्षाभ्यां … तादृश: कथित पिये’
भगवान शंकर मां-पार्वती को बताते हैं कि हे पार्वती! स्पर्श दीक्षा उसी प्रकार की है जिस प्रकार एक पक्षिणी अपने पंखों के स्पर्श से अपने अण्डों के ऊपर बैठकर अपने बच्चों का लालन-पालन करती है। जब तक बच्चे अण्डों से बाहर नहीं निकलते तब तक वह अण्डों के ऊपर बैठी रहती है। अण्डों से बाहर निकल आने के बाद भी जब तक बच्चे छोटे रहते हैं उन्हें अपने पंखों से ढंककर रखती है।
स्पर्श दीक्षा की विधि से शक्तिपात करके शिष्य का उद्धार करने के अनेकों दिव्य उदाहरण शास्त्रों-पुराणों में उपलब्ध हैं। श्रीमद्भागवत के दशवें स्कन्ध में वर्णन किया गया है कि किस प्रकार भगवान दत्तात्रेय जी द्वारा राजा यदु को आलिंगन (स्पर्श) करके आत्मबोध कराया गया था। इस घटना का सुन्दर वर्णन सन्त एकनाथ जी ने अपने ग्रन्थ ‘एकनाथी भागवत’ में करते हुए बताया है कि ‘जब भगवान श्री दत्तात्रेय जी ने राजा यदु को प्रेमपूर्वक गले लगाया तो दोनों की – स्थिति एकाकार हो गई। राजा यदु का जीवभाव तथा अंहकार नष्ट हो गया। वह प्रगाढ़ प्रेमसागर में डूब गए। उनके समस्त संकल्प-विकल्प नष्ट हो गए। इस प्रकार वह अपने गुरु के स्पर्शमात्र से ही आत्मसाक्षात्कार कर कृतार्थ हो गए।
(2) चाक्षुषी दीक्षा –
दीक्षा की इस विधि में गुरु द्वारा शिष्य को अपने सामने बिठाकर अत्यन्त करूणाभाव से उसके ऊपर अपनी अमृतपूर्ण दिव्य दृष्टि डालते हुए परमात्मा से उसके आत्मोद्धार हेतु प्रार्थना की जाती है। इस दीक्षा की महिमा का वर्णन करते हुए आदि गुरुशंकराचार्य लिखते हैं-
‘‘श्री सद्गुरूणा अतुलित करूणापूर्ण पीयूष दृष्ट्या’’
‘‘तदब्रह्मैवाहमस्मी… जीवन्मुक्त: स एव’’
श्री गुरु की करूणा पूर्ण दिव्य दृष्टि पड़ते ही शिष्य में ‘‘मैं ब्रह्म हूं’’ का भाव उत्पन्न हो जाता है तथा वह शोक रहित एवं भय-भ्रम रहित होकर जीवन मुक्त की पदवी प्राप्त कर लेता है।
(3) वाचिकी दीक्षा (शब्द दीक्षा) –
श्री गुरु द्वारा अपने शिष्य को सामने बिठाकर जीवात्मा-परमात्मा, ब्रह्म-माया, प्रकृति पुरूष एवं जीव-जगत सम्बन्धी विशद् ज्ञानोपदेश दिया जाता है। उसे सुनकर तथा सम्मुख उपस्थित सद्गुरु रूपी तपोपुंज से जो दिव्य-आध्यात्मिक तरंगें उत्पन्न होती हैं उनका स्पर्श पाकर सुयोग्य शिष्य को अलौकिक अनुभव होने लगते हैं। इस विधि से होने वाले शक्तिपात को ही वाचिकी दीक्षा कहा गया है। गुरुदेव की ऐसी दिव्य-वाणी को सुनकर ही शिष्य को अपने वास्तविक स्वरूप का बोध हो जाता है तथा शुद्ध ज्ञान की प्राप्ति हो जाने से उसका साधनामार्ग प्रकाशमय हो जाता है।
(4) मानसी (शब्द दीक्षा) तथा (संकल्प) दीक्षा :
भगवान शंकर मां पार्वती को बताते हैं कि हे पार्वती! जिस प्रकार मछली अपने बच्चों का पालन-पोषण ध्यान मात्र से ही करती है उसी प्रकार ध्यान दीक्षा भी मन के संकल्प से ही होती है।
‘‘यथामत्सी स्वतनयान… मनस: स्यीत्तथाविधि:’’
अर्थात श्री गुरु द्वारा शिष्य को स्पर्श करके दिव्य दृष्टि से देखने तथा शिष्य के प्रति सत्य संकल्प पूर्वक ध्यान करने से मानसी दीक्षा सम्पन्न हो जाती है तथा शिष्य कृतार्थ हो जाता है।
(5) आणवी दीक्षा –
इस विधि से दीक्षा प्राप्ति के अन्तर्गत सद्गुरु द्वारा शिष्य को उपास्य देवी का मंत्र, उसके पूजन-अर्चन की विधि, आसन, मुद्रा, देवी का ध्यान तथा जप के माध्यम से उपासना करने का निर्देश दिया जाता है। सुयोग्य शिष्य गुरु वाक्य तथा वेद वाक्यों का श्रवण, मनन तथा निदिध्यासन करते हुए आत्म साक्षात्कार कर लेता है।
दीक्षा प्राप्ति हेतु गुरु की शरण में उपस्थित होना
शास्त्रों में उल्लेख किया गया है कि जिज्ञासु व्यक्ति को शिष्यत्व ग्रहण (दीक्षा प्राप्ति) करने हेतु श्री गुरु के समक्ष उपस्थित होने से पहले सतत् अभ्यास करते हुए विभिन्न आध्यात्मिक विचारों एवं भावनाओं को हृदयंगम करना पड़ता है। इस विषय पर वेदान्त सूत्र का प्रथम सूत्र ‘अथातो ब्रह्म जिज्ञासा’ में स्पष्ट रूप से बताता है कि अब इसके पश्‍चात् ब्रह्म को जानने की जिज्ञासा (इच्छा)उत्पन्न होती है। जिन भावनाओं को हृदयंगम एवं अंगीकृत करने के पश्‍चात् ब्रह्म जिज्ञासा की पात्रता उत्पन्न होती है उनमें से प्रमुख हैं –
(1)  नित्या-नित्य वस्तु विवेक – इस संसार में कौन सी वस्तु नित्य (अमर) है और कौन सी वस्तु अनित्य (क्षणभंगुर/अस्थिर)। ब्रह्म (आत्मा) नित्य है। माया (संसार) अनित्य है।
(2)  इहामुत्र फल भोग विराग – यह ज्ञात हो जाना कि न केवल पृथ्वीलोक वरन् स्वर्गादि उच्च लोकों के समस्त भोगेश्वर्य क्षणिक हैं। इनके प्रति वैराग्य भाव उत्पन्न हो जाता है।
(3) शम-दमादि अर्जन – शम अर्थात् मन को नियन्त्रित करना और दम अर्थात् इन्द्रियों को वश में कर ज्ञान रूपी नित्य धन को अर्जित करना।
(4) मोक्ष प्राप्ति की प्रबल इच्छा जागृत कर लेना (मुमुक्ष, का भाव जागृत होना) – यह संकल्प कर लेना कि इसी दुर्लभ मनुष्य में ही अपने वास्तविक स्वरूप (आत्मलाभ करना) को पहचान लेना है।
श्री गुरु सान्निध्य-प्राप्ति एवं ब्रह्मविद्या उपदेश की आध्यात्मिक प्रणाली सृष्टि के आरम्भकाल से ही अनवरत चली आ रही है। प्राचीनकाल में त्रिकालज्ञ गुरु (ऋषि, मुनि, सन्त) आश्रमों में रहकर, तपस्या में संलग्न रहते थे। उस समय जिज्ञासु व्यक्ति दीक्षा प्राप्ति हेतु अपने हाथों में समिधा (यज्ञ हेतु काष्ठादि) लेकर अत्यन्त विनम्र होकर तथा हाथ जोड़कर किसी श्रोत्रिय तथा ब्रह्मनिष्ठ गुरु की शरण में जाता था और ब्रह्मविद्या की याचना करता था।
‘‘स गुरु मेवाभिगच्छेत्, समित्पाणि, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ:’’ तब गुरुदेव उस शिष्य के समस्त लक्षणों तथा योग्यता का विचार करके उसे ब्रह्मविद्या का उपदेश देते थे।
इस विषय पर आदि गुरुशंकराचार्य ने निर्देश दिया है कि
‘‘गुरु मेवाचार्य शम दमादि सम्पन्न मभिगच्छेत्
शास्त्रज्ञोपि स्वतंत्रेण-ब्रह्मज्ञानान्वेषणं न कुर्यात्’’
शिष्य को शम-दमादि गुणों से सम्पन्न होकर ही गुरुदेव के पास जाना चाहिए। शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त करने के पश्‍चात् भी शिष्य को ब्रह्मज्ञान की, मनमानी खोज नहीं करनी चाहिए।
श्री वासुदेवानन्द सरस्वती अपने वेदान्त ग्रन्थ में सद्गुरुकी शरण में जाने के विषय पर कहते हैं :-
‘‘विशारदं ब्रह्मनिष्ठं-श्रोत्रियं गुरु माश्रयेत्’’
शिष्य को ऐसे गुरु की शरण में जाना चाहिए जो शब्द-ब्रह्म को जानने वाला हो तथा ब्रह्म-साक्षात्कार करा सकने की क्षमता रखता हो।

 

शक्तिपात (कुण्डलिनी जागरण) के लक्षण
शक्तिपात होने पर शिष्य में जो बाहरी और आन्तरिक लक्षण (विशेषताएं) उत्पन्न हो जाते हैं उनका विवरण शास्त्रों में इस प्रकार दिया गया है-
‘‘देहपात: तथा कम्प:-परमानन्द हर्षणे
स्वेदो, रोमांच इत्येत-शक्तिपातस्य लक्षणम्’’
अर्थात् शक्तिपात होने से शिष्य का देहपात (शरीर का भूमि पर गिरना) होता है। शरीर में कम्पन्न उत्पन्न होता है। अत्यधिक आनन्द प्राप्त होने से शिष्य जोर-जोर से हंसने लगता है। शरीर का रोमांचित होना तथा पसीना-पसीना होना भी शक्तिपात का ही लक्षण है। इसके अतिरिक्त निद्रा आना, मूर्छित हो जाना तथा दिमाग का घूमना भी शक्तिपात हो जाने के ही लक्षण होते हैं। इस विषय पर प्रसिद्ध ग्रन्थ ‘सूतसंहिता’ के अन्तर्गत ब्रह्मगीता में अनेकों लक्षणों का विवरण दिया गया है। 
‘‘प्रहर्ष: स्वरनेत्रांग विक्रिया कम्पनं तथा
स्तोम: शरीरपातश्च भ्रमणं चोदगतिस्तथा
अदर्शनं च देहस्य… निग्रहानुग्रहे शक्ति:’’
इन सभी लक्षणों में महत्वपूर्ण लक्षण है ‘देहपात होना’ अर्थात् शक्तिपात होते ही शिष्य का शरीर तत्क्षण भूमि पर गिर जाता है और वह निर्बाध गति से भूमि पर दीर्घकाल तक चक्कर काटता रहता है। इसका महत्व बताते हुए शास्त्र कहते हैं –
‘‘शिष्यस्य देहे विप्रेन्द्रा-धरिण्यां पतते सति
प्रसाद: शंकरस्तस्य-द्विजा संजात एव हि’’
अर्थात् जब शिष्य का शरीर धरती पर गिरता है तो इसे भगवान शंकर की कृपा समझनी चाहिए। ऐसा शिष्य श्री गुरु कृपा से कृतार्थ हो जाता है।
‘‘तस्य प्रसाद युक्तस्य… तम: सूर्योदयो यथा’’
इस प्रकार शक्तिपात प्राप्त सत्शिष्य की समस्त-अविद्याएं उसी प्रकार भस्म हो जाती हैं जैसे सूर्योदय हो जाने पर समस्त अंधकार नष्ट हो जाता है।
गुरु कृपा से जब शक्ति प्रबुद्ध हो उठती है तब साधक को आसन, प्राणायाम, मुद्रा आदि कुछ भी करने की आवश्यकता नहीं होती। प्रबुद्ध कुण्डलिनी ऊपर ब्रह्मरन्ध्र की ओर जाने के लिए छटपटाती है। उसके उस छटपटाने में जो कुछ क्रियाऐं अपने-आप होती हैं वे ही आसन, मुद्रा, बन्ध और प्राणायाम हैं। शक्ति का मार्ग खुल जाने के बाद से सब क्रियाऐं अपने-आप होती हैं और उनसे चित्त को अधिकाधिक – स्थिरता प्राप्त होती हैं। 
जिस साधक के द्वारा जिस  क्रिया  का होना आवश्यक है, वही क्रिया उसके द्वारा होती है, अन्य नहीं। 
इस प्रकार होने वाली यौगिक क्रियाओं से साधक को कोई कष्ट नहीं होता। किसी अनिष्ट के भय का कोई कारण नहीं रहता। प्रबुद्ध शक्ति स्वयं ही ये सब क्रियाऐं साधक से उसकी प्रकृति के अनुरूप करा लिया करती हैं। शक्तिपात से प्रबुद्ध होने वाली शक्ति के द्वारा साधना से जो क्रियाऐं होती हैं, उनसे शरीर रोगरहित होता है, बड़े-बड़े असाध्य रोग भी भस्म हो जाते हैं। 
परन्तु इस साधना में आरम्भ से ही सुख की अनुभूति होने लगती है। शक्ति का जागना जहां एक बार हुआ नहीं कि फिर वही शक्ति स्वयं ही साधक को परमपद की प्राप्ति कराने तक अपना काम करती रहती है। इस बीच साधक के जितने भी जन्म बीत जाएं, एक बार जागी हुई कुण्डलिनी फिर कभी सुप्त नहीं होती।

 

शास्त्रों में शक्तिपात सम्पन्न (कुण्डलिनी जागरण) साधक में पाए जाने वाले जिन विभिन्न लक्षणों का उल्लेख मिलता है उनमें से प्रमुख हैं –
मूलाधार में कम्पन होना, शरीर में अत्यन्त स्फूर्ति उत्पन्न होना, स्वत: ही कुम्भक लग जाना, आखों के तारे घूमना तथा दृष्टि का भ्रूमध्य की तरफ आकर्षित होना, हर समय मस्ती में रहना, आंखें बन्द करते ही गर्दन तथा शरीर का चक्राकार घूमना, अनेक भाषाऐं (ज्ञात-अज्ञात) बोल सकने की क्षमता उत्पन्न होना तथा स्तोत्रादि, कीर्तन के शब्द स्वत: ही उच्चरित होने लगना, ध्यान में बैठते ही भविष्य की घटनाओं का पूर्वाभास होने लगना, कम समय में वेदों तथा उपनिषदों का सार तत्व समझ लेना, दिन, प्रात: सांय एवं रात्रि में पूजा-ध्यान का समय होते ही शरीर, मन तथा प्राण में आनन्दमय स्थिति उत्पन्न हो जाना। स्पष्ट है कि सद्गुरु से प्राप्त शक्तिपात सम्पन्न साधक शीघ्र ही मनुष्यत्व से देवत्व की तरफ अनायास ही अग्रसर होने लग जाता है।

 

दीक्षा-काल (दीक्षा हेतु उपयुक्त समय)
‘‘न तिथिं, न व्रतं पूजा न सन्ध्या न जप-क्रिया यदैवेच्छा तदा दीक्षा गुरोराज्ञा नुरूपत:’’
आगम शास्त्रों में स्पष्ट किया गया है कि यदि गुरुदेव शक्तिपात करने में सक्षम हों तो वह प्रसन्न होकर अपने शिष्य को जब भी दीक्षा देना चाहें वही काल (समय) सर्वश्रेष्ट काल बन जाता है। श्री गुरु की इच्छा होने तथा संतुष्ट होने पर सभी समय (दिन, पक्ष, मास, तिथि, नक्षत्र, लग्न तथा राशियां) स्वत: ही शुभ बन जाता है।
गुरु पूर्णिमा, अक्षय तृतीया, अक्षय नवमी, गंगा दशहरा, चैत्र त्रयोदशी, फाल्गुन शुक्ल नवमी, बसन्त पंचमी तथा आश्विनकृष्ण चतुर्दशी को शुभ तिथियां माना गया है। पंचमी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, चतुर्दशी तथा पूर्णिमा को भी विशेष शुभ माना गया है।

 

दीक्षा हेतु उपयुक्त मंत्र का चयन –
श्री सद्गुरु द्वारा शक्तिपात (कुण्डलिनी जागरण) की क्रिया सम्पन्न हो जाने के पश्‍चात् शिष्य को नित्य जप हेतु प्रदान किए जाने वाले मंत्र के सम्बन्ध में यदि हम विचार करें तो शक्ति सम्पन्न ब्रह्मनिष्ठ गुरु स्वेच्छा से जो भी मंत्र प्रदान करते हैं वही परम शुभ तथा सर्वोत्तम माना जाता है। क्योंकि वही मंत्र उनको भी अपनी गुरु परम्परा से ही प्राप्त हुआ होता है तथा स्वत: सिद्ध होता है। 

 

दीक्षा हेतु उपयुक्त स्थल
‘‘गोशालाया, गुरोर्गेहे-देवागारे च कानने
पुण्यक्षेत्रे तथोद्याने-नदीतीरे च दीक्षणम्॥’’
शास्त्रों में बताया गया है कि काशी, प्रयाग, कुरूक्षेत्र, श्रीपर्वत, शक्तिपीठ (प्रमुख 4-पीठ) तथा द्वादश ज्योतिर्लिर्ंगों में से किसी भी ज्योतिर्लिंग में उपस्थित होकर दीक्षा लेने में किसी काल का विचार नहीं किया जाता। पवित्र नदियों के तटों पर, घने जंगलों एवं पर्वतों पर दीक्षा लेना शुभ माना गया है। इसके अतिरिक्त गुरु के घर में, गोशाला में, देव मन्दिर, उद्यान, बिल्व वृक्ष एवं धात्री वृक्ष के नीचे दीक्षा लेना श्रेष्ठ है –

 

शिष्य के कर्त्तव्य
दीक्षा के पश्‍चात् गुरु-शिष्य का सम्बन्ध जन्म-जन्मान्तरों तक चलता रहता है जबकि मनुष्य जीवन में पुत्र का सम्बन्ध अपने पिता के देह-विसर्जन के पश्‍चात् ही समाप्त हो जाता है। इस अद्वितीय एवं अलौकिक सम्बन्ध के निर्वहन के लिए शिष्य को अहर्निश मन, वचन तथा कर्म से तत्पर तथा सजग रहना पड़ता है। तंत्र-शास्त्रों में स्पष्ट रूप से बताया गया है कि शिष्य के लिए गुरु  साक्षात् शिव रूप होते हैं। यदि शिव रुष्ट होंगे तो श्री गुरु रक्षा कर सकते हैं परन्तु गुरु के रुष्ट होने पर शिव भी शिष्य की रक्षा नहीं कर सकते।

 

‘‘शिवे रूष्टे गुरुस्त्राता-गुरौ रूष्टे न कश्‍चन’’
ऐसे महान गुरु को संतुष्ट रखने हेतु शिष्य को सदैव तत्पर रहना चाहिए तथा –
गुरु वाक्यों को ही महामंत्र समझकर तथा संशयहीन होकर सदैव मंत्र-जप में तत्पर रहना चाहिए।
गुरु की छाया, गुरु के वस्त्रों तथा गुरु पादुकाओं को नहीं लांघना चाहिए।
‘‘गुस्च्छाया शक्तिच्छाया सुरच्छाया न लंघयेत’’
श्री गुरु पत्नी तथा उनके परिवारजनों को सदैव सम्मान देना चाहिए।
श्री गुरु के आगे नहीं वरन् पीछे दूरी बनाकर चलना चाहिए।
विदा होते समय गुरु को पीठ नहीं दिखानी चाहिए वरन् उल्टे पैर निकलना चाहिए।
गुरु के समक्ष सदैव विनम्र तथा दासवत् व्यवहार करना चाहिए। अपने ज्ञान, धन-सम्पत्ति, प्रतिष्ठा तथा प्रभाव को नहीं दिखाना चाहिए। अपनी जाति, कुल तथा पदवी का अहंकार नहीं करना चाहिए।
‘‘अभिमानो न कर्त्तव्यो-जाति विद्या धनादिकम्’’
गुरुदेव की तरफ पैर फैलाकर नहीं बैठना चाहिए तथा हंसी-मजाक भी नहीं करना चाहिए।
गुरु गृह पहुंचकर उनके समक्ष अपने मंत्र का जप, पूजन अर्चन नहीं करना चाहिए क्योंकि गुरु का घर शिष्य के लिए ’कैलाशतीर्थ’ की तरह होता है जहां पहुंचकर कुछ भी करना शेष नहीं रह जाता है।

 

दीक्षा के पश्‍चात् भी शिष्य को यथासम्भव गुरु के व्यक्तिगत सम्पर्क में रहना चाहिए और अपनी साधना के अनुभव उनको बताकर समाधान कर लेना चाहिए। शास्त्रों में दूरी के विचार से गुरु से मिलने के सम्बन्ध में विस्तार से बताया गया है-
एक ग्राम स्थित: शिष्य: त्रिसन्ध्यं प्रणमेद् गुरुम्…
अतिदूर ग्रह: शिष्य: यदीच्छास्या तदा व्रजेत
सदैव गुरु की सेवा में तत्पर रहना चाहिए तथा उनकी प्रत्येक आज्ञा को शिरोधार्य करना चाहिए। समय-समय पर अन्न, वस्त्र, धन-धान्यादि अर्पित करके गुरु को संतुष्ट रखना चाहिए।
ऐसे गुरु पदानुरागी भाग्यशाली शिष्य के लिए ही शास्त्रों का उद्घोष है:-
‘‘यस्य देवे पराभक्ति-यथा देवे तथा गुरौ
तस्यैते कथिता अर्था-प्रकाश्यन्ते महात्मन:’’
Boon from SadGurudev

Diksha – Shaktipaat

Curiosity and Clarifications

 

‘Devi! DikshaH VihinsayeH Na Siddhi Na Cha Sadgatim’

Lord Shiva has Himself explained to Goddess Parvati in ‘Shiv Tantra Saar’ about Diksha Sanskar that – “O Devi! A person bereft of Diksha neither gets Siddhi nor obtain Sadgati. So a person should try all endeavors to obtain Diksha initiation from Shree Gurudev.”


 

The holy scriptures state that Parashakti resides in every being as Atmashakti, which stays in an inactive dormant stage  due to influence of worldly desires-delusions,  misleading wishes, sins and omissions of various births. The Diksha-initiation by SadGurudev breaks this elusive wrapping-cover and the disciple starts sensing the inherent divine power within self. The realization of this energy within self is called “Shaktipaat” (Kundalini Awakening).

 

The subject of Diksha is the most mysterious, secretive, complex and vast. The divine energy starts expressing within the disciple after Diksha-initiation from SadGurudev, and the process of vanquishing the twin major Sadhana–path obstacles i.e. “Ripu” (enemies) like ignorance (veil over Guru-knowledge) and “Vikshep” (experiencing contrary effects) commences.

The “Diksha” word is made from two letters – “Di” meaning giving and “Ksha” meaning destruction. The

Tantra scriptures explain the Diksha mechanism as –

  • First, this provides Divine knowledge, and thereafter destroys all sins.

‘Diyate Gyanmatyarth-Kshiyate Paash Bandhanam’

  • A holy connection between the Sadhak and Lord Shiva gets established and He destroys all the faults and deficiencies of the Sadhak.

‘Dadaati Shiv Tadatmyan-Kshinoti Cha Maltrayam’

  • One receives Brahmagyaan (Divine knowledge) through Diksha and all the sins get destroyed.

“Diyate Paramgyanan-Kshiyate Paap  PadhwatiH:

Ten Dikshochyate Mantre-Swaagmarth Bala Valaat ||”

  • Diksha has scientific basis, quickly yields results, destroys differentiation, and provides liberation.

“Vigyanfalda Saiv-Dwitiya Layakarini

Tritiya Muktidaa Cheiv-Tasmaddiksheti Preeyate”

 

Significance and Necessity of Diksha

The Scriptures proclaim that “Obtaining Diksha-Initiation” and “Granting Diksha-Initiation” are both exceptional processes. There is no better wisdom or austerity. The finest auspicious time-slot is the Diksha Initiation time period. A disciple not only receives Guru Prasad and Blessings of Parashakti, he also becomes eligible to understand Tatva-Gyaan. A disciple can graduate from human state to Divine Shivatava state only after obtaining Diksha.

 

What happens after Shaktipaat, has been elucidated in detail in various scriptures. To quote –

  1. “Utpann Shakti Bhodasya… Sahajavastha Swayamev Prajyate”

Multiple Yogic processes get started within the disciple after Shaktipaat initiation. He does not need to do any specific action to generate these.

  1. “Supta Guru Prasaden – Yadaa Jaagrati Kundali…”

The Kundalini Shakti lying in Muladhaar in dormant state for many births, get stimulated upon Shaktipaat; and it starts the journey penetrating through the Shat-chakras to merge with its Lord Shiva in Sahastrara.

  1. “Dikshagri Karma Dagdhaso… Nirjivastu Shivobhavet”

All past karmas get destroyed in the fiery initiation of Diksha, the bondage with attachments get broken and the disciple achieves “Shivatva”.

  1. “Shaktipaaten Sanyukta… Vimuktirnaatra SanshayaH:”

When SadGurudev grants Mantras (Divine sentences) during Shaktipaat initiation to the disciple, then he gets liberated.

  1. “Adikshita Ye Kurvanti… Shilaya Mupt Beejwat”

A seed planted in the stone does not get germinate. Similarly, all Sadhanas performed by a non-Dikshit person goes waste.

  1. “Devi! Diksha  Vihinasya Na Siddhim Na Cha Sadgatim”

O Parvati! A non-Dikshit person neither obtains Siddhi accomplishment nor obtains Sadgati. So one should endeavor with all means to obtain Diksha initiation from Shree Guru.

 

One obtains Shaktipaat or Diksha only after manifestation of great virtues, Diksha detaches a person from material sinful existence, and turns him towards a fervent everlasting joyful ultimate spiritual state :-

“ Sa Shokam Tarati, Sashokam Tarati, Sa Shokam Tarati”

The commencement of Yoga is  Kundalini awakening and its termination is reaching Sahastrara. This is Shakti Yoga. It is evident that every religion, faith and creed has adopted this basic principle in their doctrine by altering in their own way.

 

Types of Diksha (Modes of obtaining Shaktipaat initiation)

There are multiple methods of Diksha due to variation in adored Deity, interest of worshipping “disciple”, appropriateness of Guru-disciple, differences in worship techniques, the right distinction, variances in Sadhana procedures, and compatibility with place-time circumstances. The name of Diksha-initiation itself gives an idea about the initiation method. Many different Diksha processes have been described in the holy scriptures. Like-

(1) Sparshiki (Touch) Diksha Initiation

(2) Chakshusi (Vision) Diksha Initiation

(3) Vachiki (Verbal) Diksha Initiation

(4) Mansi (Meditation) Diksha Initiation

(5) Aanvi Diksha Initiation.

The Dikshas mentioned additionally are – Mantri Diksha Initiation, Shakti Diksha Initiation, Shambhavi Diksha Initiation, Abhisechika Diksha Initiation, Smarti Diksha and Yoga Diksha. Diksha obtained by any method from SadGurudev by the disciple is helpful in granting him both luxury-salvation.

The Tantra scriptures state that as a mother bird, mother turtle and mother fish raise their progeny, similarly, SadGurudev grants spiritual realization to His disciple by merging His spiritual force into the disciple by touching, viewing and meditating.

Bhagwatpaad Shree Sankaracharya while describing the significance of SadGuru has written in the first verse of his text “Shatshaloki” that –

“Dhristaanto Neivdhrisht… Swiyan Saamyan Vidhatte”

There are no suitable words to describe the greatness of SadGurudev preaching the ultimate metaphor to a disciple by granting Shaktipaat initiation. Guru is at a much higher level than the parasmani alchemy-stone, because an alchemy-stone can turn iron into gold, but not the alchemy-stone; while Shree Gurudev transforms a disciple into His own form – completely identical to Him.

 

(1) Sparsh (Touch) Initiation –

“Yatha Pakshi Svapakshabhyam…TadrasaH Kathit Piye”

Lord Shiva explains to Divine Mother Parvati O Parvati! Touch initiation is similar to the way a mother-bird touches her eggs by incubating them with her wings. She continues to sit on eggs until the chicks hatch out. Even after that, she constantly covers the baby chicks with her feathers until they grow up.

There are many divine examples in our holy scriptures of elevation of the disciple through the means of Touch Diksha-Initiation. The Tenth chapter of Shrimad Bhagwat describes how Lord Dattatreya granted self-realization to King Yadu by embracing him. Sant Eknathji in his treatise “Eknathi Bhagwat” has provided a lovely description of this incident that – “When Lord Shri Dattatreya affectionately embraced the King Yadu, they both merged into each other. The entire attachment instincts and ego of King Yadu got destroyed. He became immersed in the deep divine ocean of love and joy. All his material illusions-wishes vanished.   Thus he got elevated through self-realization simply by the touch of his Guru.

 

(2) Chakshushi (Vision) Initiation –

In this mode of initiation, the Guru prays for the disciple’s spiritual elevation while casting His benevolent divine gaze upon him or her. Guru Shankaracharya describes the glory of this Diksha as:

“Shree Saduruna Atulit Karunaapurna Piyush Dhristya”

“Tadbrahmovaahamasmi… JeevnmuktaH: Sa Ev”

The “I am Brahma” emotional essence develops into the disciple immediately upon receipt of Shree Guru’s benevolent gaze, and he acquires liberation through the illusion-free and fear-free expressions.

 

(3) Vachiki (Verbal) Initiation –

Shree Guru teaches divine knowledge about God, Brahma-Illusion, Universe, Nature, Man and Flora-Fauna to the disciple sitting across Him. The ideal disciple obtains supernatural experiences from listening to the discourse and also from the divine-spiritual waves arising from the energetic form of SadGurudev. This method of Shaktipaat is called the Vachiki Diksha. The disciple becomes aware of his true nature upon listening to this divine voice, and he starts seeing the light of Sadhana path after receipt of this pure knowledge.

 

(4) Mansi (Verbal Initiation and Pledge Initiation) –

Lord Shiva explains to Mother Parvati that  O Parvati! The Dhyaan Diksha occurs through strong resolution in mind, as a mother-fish rears her children only through caring in her mind.

“Yathamatsi Swatanyaan … ManasaH: SayittathavidhiH:”

i.e. the Manasi Dikhsa gets accomplished only when Shree Guru casts a divine gaze upon the disciple while touching him, and the disciple meditates through strong willpower, leading to his own gratification.

 

(5) Anvi Initiation –

In this Diksha mode, the SadGurudev instructs the disciple about the suitable mantra of the deity, the prayer-worship process, asana, mudra, meditation and the chants. The worthy disciple hears, learns, contemplates and practices the Guru-words and Veda-verses to achieve self-realization.

 

Presence under Gurudev’s wings to obtain Diksha

The scriptures mention that a curious person desiring discipleship (Diksha Receipt) should practice and assimilate various spiritual thoughts and feelings, before appearing before Shree Guru. The first verse of Vedant Sootra “Athato Brahma Jigyasa” clearly elucidates that this leads to a curiosity (desire) to understand the divinity of Lord Brahma. The chief emotions, adoption and assimilation of which, generates suitability to understand Brahma are –

(1)       Nityaa-Nitya Vastu Vivek – Understanding of which objects in this universe are Nitya (Immortal) and which are Anitya (Transient/Perishable). Brahma (Soul) is Nitya. Illusion (World) is Anitya.

(2)       Ihaamutra Fal Bhog Viraag – Knowledge that the indulgences and luxuries of not only earth, rather of all universes like heaven (Swarg) are transient and temporary. This leads to a sense of detachment towards them.

(3)       Sham-Damaadi Arjan – Acquiring Wisdom (i.e. Nitya Wealth) by controlling Sham (i.e. Mind) and Dam (i.e. Senses)

(4)       Activation of strong desire to obtain liberation (Awakening of Mumuksh emotion) – Resolve to realize self (attaining salvation) in this rare human birth itself.

 

The tradition of  physical presence with Shree Guru and divine Brahmavidhya spiritual teachings has been constantly continuing since the dawn of the creation. The omniscient Gurus (sage, wise, saint) performed penance and lived in the ashrams in ancient ages. The curious disciples used to solicit Diksha through praying for Brahmavidhya knowledge by humbly seeking shelter of a Kshotriya and Brahmanisht sage with folded hands offering Samidha (Wooden plank for sacrifice havan).

“Sa Guru Mevabhigachchhet, Samitpaani, Kshotriya, BrahmanishthaH:”

Then the Guru started educating the disciple on Brahmavidhya after evaluating his merit and abilities.

Aadi Guru Shankaracharya has directed on this topic that –

“Guru Mewacharya Sham Damaadi Sampann Mabhigachchhet

Shashtragyopi Swatantren-Brahmagyananveshanan Na Kuryaat”

A disciple should go to Gurudev only after development of Sham-Damaadi abilities. A disciple should not do arbitrary searches for Brahmagyaan even after obtaining deep knowledge of the scriptures.

Shree Vasudewanand Saraswati states in his Vedaant treatise on the subject of seeking SadGurudev cover that –

“Visharadan Brahmanishtham-Kshotriyam Guru Maakshreyat”

The disciple must seek refuge under a Guru who understands Shabd-Brahma and is capable of Brahman-realization.

 

Signs of Shaktipaat (Kundalini Activation)

The external and internal signs (qualities) which a disciple develops after Shaktipaat are explained in the scriptures as –

“DehpaataH: Tatha KampaH: – Parmaanand Harshane

Swedo, Romanch Ityet – Shaktipaatsya Lakshanam”

Meaning Shaktipaat leads to disciple’s Dehpaat (Body falling on ground). Multiple vibrations are generated within the body. The disciple starts laughing loudly after obtaining extreme joy. The thrill in the body and excessive sweat is also a sign of Shaktipaat. Additionally, excessive sleep, fainting and turning of mind are also signs of Shaktipaat. The famous treatise “SutSanhita” on this subject has explained various signs in Brahmageeta as –

“PraharsaH: Swaranetrang Vikriyaa Kampanan Tatha

StomaH: Sharirapaatshrach Bhramanam Chodgatistatha

Adarshnan Cha Dehasya … Nigrahaanugrahe ShaktiH:”

The most significant signs among all these is “Getting Dehpaat” i.e. the body of disciple instantly falls on the ground after Shaktipaat and he continues to move around in smooth motion for a long time. The scriptures describe its importance as –

“Shishyasaya Dehe Viprendra-Dharinyaan Patate Sati

PrasaadaH: Shankarstasya-Dwija Sanjaat Ev Hi”

Viz. when the disciple’s body falls to the ground, it should be considered as divine grace of Lord Shiva. Such a disciple gets gratified with blessings from SadGurudev.

“Tasya Prasaad Yuktasya… Tam Suryodayo Yatha”

Thus entire ignorance of a Shaktipaat-receipt-disciple get destroyed in the same way as the darkness vanishes after the sunrise.

When the energy enlightens through divine blessings of SadGurudev then the Sadhak does not need to practice asana, pranayama or mudra. The awakened kundalini starts squirming to reach Brahmarandh above. The different processes which take place during this wriggling are itself asana, mudra, bandh and pranayama. The opening of the energetic path causes all actions to automatically occur and the mind gets extreme stabilization.

Only the action needed by a Sadhak, occur, the other extra acts do not occur.

The sadhak does not undergo any trouble or pain during these yogic processes. There is no reason to fear any unknown.  The illuminated power gets everything done through the sadhak as per his nature. The processes emanating from this energetic Shaktipaat leads to a disease-free body, and even major incurable diseases get cured.

 

But the commencement of this sadhana grants joy. Once this energetic power gets activated, it continues to strive to make the sadhak achieve self-realization. Even if a sadhak crosses multiple births, a once awakened kundalini never becomes dormant again.

The prominent symptoms and signs found within a Shaktipaat accomplished (Kundalini Jagran) sadhak, as described in the Scriptures are –

Vibration in the muladhaar, extreme energy in the body, automatic kumbhak pranayama, vision of stars in the eyes, focus of eye-sight towards third-eye, being in a state of joy all the time, sense of revolution of neck and body upon eye-closure, capability to speak in multiple languages (known or unknown), automatic pronouncement of stotras and kirtan-words, premonition of future events during meditation, understand the essence of Vedas and Upanishads very rapidly, and a joyous state in the body, mind and spirit at the prayer time in morning, afternoon, evening and night.

It is clearly seen that a sadhak automatically develops on the path to divinity from humanity after obtaining Shaktipaat Diksha from SadGurudev.

 

Diksha Time (Appropriate Time for Granting Diksha)

“Na Tithim, Na Vratam, Pooja Na Sandhya Na Jap-Kriya

Yadeivechchha Tada Diksha Guroragya NuroopataH:”

The later scriptures were clear that if a Guru is capable to grant Shaktipaat, then whenever He is pleased to grant Diksha to His disciple, that time itself becomes the most auspicious time-period. Any time period (Day of week, Day of Fortnight, Day of Month, Tithi, Nakshatra, Lagna and Rashi) spontaneously becomes auspicious upon the desire and pleasure of Shree Guru.

Guru Purnima, Akshaya Tritiya, Akshaya Navami, Ganga Dussehra, Cheitra Trayodashi, Falgun Shukla Navami, Basant Panchami and Ashiwan Krishna Chaturdashi have been considered as auspicious dates. Panchami, Saptami, Ashtami, Navami, Chaturdasi and Poornima have also been considered particularly auspicious.

 

Selection of suitable Mantra for Diksha –

If we think about the mantra granted to disciple for regular chanting after accomplishment of Shaktipaat (Kundalini Activation), then we realize that whatever mantra the ever-powerful Brahmanisht Guru grants, that itself becomes the most auspicious and the ultimate excellent. Because He would have obtained that mantra through the Guru-tradition and it would be self siddh.

 

Appropriate location for Diksha

“Goshalaya, Gurorgrehe-Devaagare Cha Kanane

Punyakshetre Tathodhyane-Naditeere Cha Dikshanam”

The scriptures state that there is no consideration of suitable auspicious-time if Diksha is taken in Kaashi, Prayag, Kurukshetra, Shreeparwat, Shaktipeeth (Four major ones) and Twelve Jyotirlings. It is considered auspicious to obtain Diksha on the shores of the sacred rivers, dense forests and mountains. Moreover it is best to obtain Diksha in the Guru’s house, in Goshala (cowshed), God temple, garden and under Bilwa or Dhaatri trees.

 

Responsibilities of the disciple

The relationship between Guru-disciple continues across multiple births after grant of Diksha, whereas a relationship of a son with his father terminates after the death of the father. A disciple has to stay ever-alert and ever-ready with pure mind, words and actions, to continue this unique divine relationship. The Tantra-scriptures clearly state that Guru is akin to Lord Shiva for a disciple. If Lord Shiva gets angry then Guru can protect you, but even Lord Shiva cannot protect you if Guru gets angry.

“Shive Rushte Gurustraata – Guro Rushte Na Kaschana”

 

A disciple should be ever-ready to gratify such a great Guru and –

  • Should consider Guru words as Divine mantras and should continue mantra chanting without any confusion or doubt.
  • Should not cross Guru’s shadow, Guru’s garments or Guru padukas.

“Guruchchhaya Shaktichchhaya Surachchhaya Na Langhayet”

  • Should always respect Shree Guru spouse and their family members.
  • Should not walk in front, rather should always walk behind Shree Guru at a respectable distance.
  • Should not turn back upon leaving, rather should walk backwards.
  • Should always behave politely and humbly towards Gurudev. Should not show off one’s knowledge, wealth-prosperity, prestige or influence. Should not be egoistic about your family, race or position.

“Abhimaano Na Kartavyo – Jaati Vidhya Dhanaadikam”

  • Should not sit with feet towards Gurudev and should not engage in wit-humor.
  • Should not perform mantra chanting, prayer or worship after reaching Guru-abode, since Guru-abode is akin to “Kailashtirth” for a disciple and nothing else is needed after reaching there.
  • The disciple should strive to stay in personal contact with Gurudev after Diksha, and should obtain guidance after appraising Him of  spiritual experiences. The scriptures have described in detail about meeting Gurudev as –

Ek Gram SthitaH: ShishyaH: Trisandhyam Pranamed Gurum…

Atidoor GrihaH: ShishyaH: Yadeichchhasya Tada Vrajet

  • Should be always ready to serve Guru and  should obey His each and every instruction. Should offer food, garments, money-wealth etc. from time to time to keep Guru gratified.

The scriptures state for such fortunate Guru-Divine-feet-loving disciples –

“Yasya Deve Parabhakti – Yatha Deve Tatha Guro

Tasyeite Kathita Arthaa – Prakashyante MahatmanaH:”

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