Dedication – The foundation for Dhyaan – Dhaarana

पूर्ण समर्पण  – ध्यान-धारणा का आधार

 

‘शरीर और ध्यान का क्या सम्बन्ध है, कैसे अर्जुन को श्री कृष्ण ने पूर्णत्व प्रदान किया, ध्यान की क्या गहराई है और इस सब का आधार गुरु के प्रति पूर्ण रूप से समर्पण ही है। जब गुरु शिष्य का भेद समाप्त हो जाता है और शिष्य के हृदय में गुरु रूपी धड़कन ही चलती है तो वह शिष्य सजग, साक्षी भावी से ध्यान के उच्चतम स्तर को प्राप्त करता हुआ पूर्णत्व प्राप्त कर लेता है। वह अपने आप में अद्वितीय बन जाता है।’

 

इस ओजस्वी आलेख का एक-एक शब्द ध्यान से पढिये और यह सम्भव है कि हम ध्यान के महासागर में उतर कर गुरु से एकाकार हो जायें-

 

ध्यान और शरीर दोनों अलग-अलग हैं, इस शरीर के माध्यम से ध्यान नहीं हो सकता, शरीर तो केवल बाह्य तरंगों को स्वीकार करता है, और अपनी तंरगों को दूसरों की ओर प्रेषित करता है, जिसके माध्यम से उसके मन के भाव या अन्दर के विचार स्पष्ट होते हैं, कि वह क्रोध कर रहा है, प्रेम कर रहा है या घृणा कर रहा है, सुख का भाव है या दुःख का भाव है। बाहरी तरंगों के आदान-प्रदान की ये छोटी-मोटी अवस्थाएं देह अवस्था में प्राप्त होती हैं।

 

शरीर तो अपने आप में बहुत छोटा सा भाग है – जिसकी उम्र साठ साल है, पचास साल है, सौ साल है। शरीर के माध्यम से ध्यान प्राप्त नहीं किया जा सकता, इस शरीर से उसका कोई सम्बन्ध नहीं है… फिर भी प्राण को अवस्थित होने के लिए कोई आधार चाहिए, उस आधार को शरीर कहा गया है। किसी देवता को बैठने के लिए सिंहासन होना चाहिए, उस सिंहासन को शरीर कहा गया है, वह सिंहासन अपने-आप में देवता नहीं है…. सिंहासन केवल इसलिए है जिससे कि उसके ऊपर देवता स्थापित हो सकें, बैठ सकें।

 

शरीर भी एक सिंहासन है – जिस पर प्राण अवस्थित है, शरीर तो एक धरातल है – जिस पर अद्वितीय विभूति अवस्थित है, शरीर वह माध्यम है – जिस पर ईश्‍वर अंश, देवता ब्रह्म या जो कुछ भी है वह एक रूप में, एक आकार में खड़ा है।

 

– इसलिये खड़ा है क्योंकि, दूसरे आकार को समझने के लिए एक आकार ग्रहण करना जरूरी है – एक आकार ही दूसरे आकार को समझा सकता है। एक पशु ही दूसरे पशु को समझा सकता है। एक बन्दर दूसरे बन्दर को समझा सकता है… एक बन्दर एक गाय को नहीं समझा सकता। ठीक इसी प्रकार से एक मनुष्य ही दूसरे मनुष्य को समझा सकता है।

 

– और ब्रह्म को भी इसीलिए शरीर धारण करना पड़ता है जिससे – उसके समान जो दूसरे मनुष्य हैं, उनको आसानी से समझाया जा सके। इसलिए राम को भी एक शरीर धारण करना पड़ा है, अतः उच्चकोटि के सद्गुरु को भी एक शरीर धारण करना पड़ता है… और वैसी ही अवस्था में रहना पड़ता है, जिस अवस्था में आस-पास के लोग रहते हैं, जिससे कि वे समझ सकें, और उसे अपना ही एक हिस्सा मान सकें… मान सकें और उसकी बात सुन सकें… सुन सकें और समझ सकें।

 

हजारों – लाखों व्यक्तियों में से कोई एक बिरला ऐसा निकल जाता है, जो उनकी उंगली पकड़ कर आगे बढ़ने की क्रिया प्रारम्भ कर लेता है। हजारों – लाखों व्यक्तियों में से किसी एक में ही चेतना प्राप्त होती है, जो उनकी उंगली पकड़ कर आगे बढ़ने की क्रिया प्रारम्भ कर लेता है। हजारों-लाखों व्यक्तियों में से किसी एक में ही ऐसी चेतना होती है, जो उनकी वाणी को समझ सकता है। हजारों-लाखों व्यक्तियों में से किसी एक में ही ऐसे भाव जाग्रत होते हैं, जब वह सद्गुरु की, उस अद्वितीय व्यक्तित्व की उंगली पकड़ सकता है, उनके पास रह सकता है… उनके साथ चलने की क्रिया प्रारम्भ करता है, वह पहचान लेता है, उसकी आंख पहचान लेती है – ‘यह व्यक्तित्व साधारण नहीं है।’

 

– इसने साधारण मनुष्य का शरीर तो धारण किया है, इसके क्रिया-कलाप भी वैसे ही हैं, जैसे एक आम गृहस्थ के होते हैं, इसका रहन-सहन भी वैसा ही है, जैसे एक आम गृहस्थ का होता है, इसे भी हानि-लाभ, सुख-दुःख व्याप्त होता है, यह भी उदास होता है, रोता है, चिन्ता करता है, मगर फिर भी वह इन सबसे परे है।

 

-और इसीलिए वह इस विश्‍व की विभूति है, उसको पहचानने के लिए शरीर की आंखों से काम नहीं चलेगा, उसको पहचानने के लिए मन की आंखें खोलनी पड़ेंगी, उसको पहचानने के लिए ध्यान की अवस्था में जाना होगा – और जो व्यक्ति ध्यान की अवस्था में जाता है, उसको तब विराट रूप का अपने-आप में दर्शन हो जाता है।

 

अर्जुन, कृष्ण को एक सामान्य आदमी ही समझ रहा था, वैसा ही रोता हुआ, वैसा ही उदास होता हुआ, वैसा ही मित्र, वैसा ही प्रेम करता हुआ। मगर कृष्ण ने जब अर्जुन को ध्यान की सातवीं अवस्था में पहुंचा कर, अपने-आप को उसके सामने खड़ा किया तो, अर्जुन एक बार ही में समझ गया – ‘ये सामान्य मनुष्य नहीं हैं, ये अपने-आप में एक अद्वितीय विभूति हैं।’

 

सद्गुरु चाहें तो किसी योग्य व्यक्ति को छलांग लगवा कर सातवीं अवस्था में पहुंचा सकते हैं, जैसे कृष्ण ने व्यामूढ़ अर्जुन को, मोहग्रस्त अर्जुन को एक छलांग के माध्यम से ध्यान की अवस्था तक पहुंचा दिया… और पहुंचाते ही उसकी जो हजार-हजार आंखें जाग्रत हुईं, उसके माध्यम से वह कृष्ण… सामान्य दिखाई देने वाले कृष्ण के विराट रूप को देख सका।

 

ठीक उसी प्रकार सद्गुरु, वह अद्वितीय विभूति, यदि चाहें तो किसी भी शिष्य, किसी भी व्यक्ति को ध्यान की उस अवस्था में पहुंचा सकते हैं, जहां उस व्यक्ति के सामने वास्तविकता स्पष्ट हो जाती है, उसकी अद्वितीयता स्पष्ट हो जाती है, उसकी महानता स्पष्ट हो जाती है।

 

प्रश्‍नः क्या स्त्री और पुरुष की ध्यान की विधियां अलग-अलग हैं?
देहगत अवस्था में ही स्त्री और पुरुष का भेद है, जब मनुष्य देह से आगे की स्थिति में पहुंचने लगता है, तब पुरुष और स्त्री में कोई भेद नहीं रह पाता। यह तो शरीर का भेद है, यह तो तलछट का भेद है, यह आत्मा का भेद नहीं है, यह प्राणों का भेद भी नहीं है – जब भेद ही नहीं है, तो फिर ध्यान की विधियां भी अलग नहीं हो सकती। जो स्त्री है, वही दूसरे शब्दों में पुरुष है, जो पुरुष है, वही दूसरे शब्दों में स्त्री है।
तुम स्त्री और पुरुष को अलग-अलग रूपों में… शरीर की आकृति और बनावट के कारण अलग-अलग देख रहे हो। आध्यात्मिक और चेतनात्मक दृष्टि से तो दोनों में कोई अन्तर है ही नहीं। दोनों एक ही स्थिति में, एक ही प्रकार की भाव-भूमियों पर खड़े हैं।
उच्चकोटि की स्त्रियां भी हुई हैं – कात्यायनी, मैत्रेयी, चैतन्या, वैचार्या, गौतमी… ये सब अपने आप में अद्वितीय विभूतियां थीं, उतनी ही ब्रह्म को प्राप्त होती हुई, उतनी ही मनुष्यता को प्राप्त होती हुई, उतनी ही ध्यान अवस्था को प्राप्त होती हुई, जैसे कि एक ॠषि हुआ है। इसलिए पुरुष और स्त्री को अलग-अलग देखना आध्यात्मिक दृष्टि से सम्भव ही नहीं है। केवल बाह्य रूप से, केवल शारीरिक अवस्था से हम उसमें विभेद करते हैं – यह तो ऊपरी भाग है, यह तो ऊपरी भेद है, आन्तरिक रूप से तो कहीं कोई भेद है ही नहीं।
– इसलिये जिस तरीके से पुुरुष ध्यान कर सकता है, ठीक उसी प्रकार से एक स्त्री भी ध्यान की उस अवस्था तक पहुंच सकती है। जिस प्रकार से एक ही छलांग में एक सद्गुरु, एक कृष्ण, अर्जुन को सातवें स्थल पर पहुंचा सकते हैं तो… किसी स्त्री को भी पहुंचा सकता है, इसलिए इन दोनों के लिए ध्यान की विधि अलग-अलग संभव ही नहीं है।

 

प्रश्‍नः कहते हैं कि ध्यान की गहराई में उतरना चाहिए, यह गहराई में उतरना क्या है… इस गहराई में कैसे उतर सकते हैं?
– मैं इसका उत्तर ऊपर दे चुका हूं, गहराई में उतरने का तात्पर्य यह नहीं है कि कुएं में छलांग लगानी है। गहराई में उतरने की भावना यह भी नहीं है, कि हम झटके से एक स्थान से दूसरे स्थान पर या एक सीढ़ी से दूसरी सीढ़ी पर पहुंए जाएं। यहां मेरे कहने का तात्पर्य है – हम एक स्थिति से दूसरी स्थिति की ओर बढ़ते हैं, जो पहली स्थिति है ‘देहगत स्थिति’ उससे दूसरी स्थिति में पहुंचें, फिर तीसरी स्थिति में पहुंचें, फिर चौथी स्थिति में पहुंचें… और ऊपर मैंने बताया – उन सातों स्थितियों में से क्रमशः उतरते हुए, जिस जगह हम खड़े होते हैं – वह ध्यान की अवस्था है, वह पूर्णानन्द की अवस्था है। इसी तरीके से, अभ्यास के माध्यम से उन सातों अवस्थाओं को प्राप्त करते हुए, हम उन स्थितियों को प्राप्त कर सकते हैं, जिसे शास्त्रों में, वेदों में –
– ‘ब्रह्मानन्द’ कहा गया है।
– जिसको ‘पूर्णानन्द’ कहा गया है।
– जिसको सही अर्थों में ‘आनन्द’ की संज्ञा से विभूषित किया गया। इस गहराई में उतरने का अपना ही एक आनन्द है, अपना ही एक अलौकिक सौन्दर्य है। ज्यों-ज्यों हम बाहर की ओर बढ़ते रहते हैं, त्यों-त्यों झुर्रियां समय के प्रभाव से आती रहती हैं, त्यों-त्यों विषाद के कण मुंह पर आते रहते हैं, त्यों-त्यों चेहरे पर कुरूपता आती रहती है… मगर ज्यों-ज्यों हम अन्दर उतरते रहते हैं, त्यों-त्यों चेहरे की तेजस्विता बढ़ती रहती है, चेहरे का प्रभाव बढ़ता रहता है, चेहरे का और शरीर का सौन्दर्य बढ़ता रहता है। अन्दर से जो रश्मियां इस शरीर को भेद कर प्रवाहित होती हैं, वे आस-पास के वातावरण को स्वच्छ और पवित्र बना देती है।
यदि एक आश्रम में चाहे चालीस या पचास शिष्य हों, और चाहे अच्छे से अच्छे व्यक्ति हों, मगर उनके पास यदि एक सद्गुरु नहीं होता तो, पचासों शिष्य अपने-आप में मृत अवस्था में अनुभव करते हैं। उनको ऐसा लगता है कि, जैसे-हम मरे हुए हैं… चलते तो हैं मगर काम करने में उतना जोश नहीं रहता… बात करने में वह क्षमता नहीं आ पाती, क्योंकि… उनके बीच में वह तत्व निकल जाता है, जिस तत्व को ‘गुरु’ कहा गया है, जिस तत्व को ‘सद्गुरु’ कहा गया है।
ऐसी स्थिति में हम बाह्य दृष्टि से भी पहचान सकते हैं कि – यह व्यक्ति अलौकिक है या सामान्य है। सामान्य गुरु या सामान्य साधु आश्रम से चला जाए, तो शिष्य प्रसन्न होते हैं – यह चला गया, अब हम अपनी मनमौजी कर सकेंगे, मनमर्जी से कूद सकेंगे, नाच सकेंगे, मजे से खा-पी सकेंगे… और दौड़ सकेंगे, जो कुछ करना होगा अच्छा या बुरा कर सकेंगे।
और दूसरा, ‘सद्गुरु’ होता है, जिसके जाने से विषाद उत्पन्न होता है, दुःख उत्पन्न होता है। आंख में आंसू झलकने लगते हैं, ऐसा लगता है, जैसे शरीर तो है, पर प्राण निकल गया – यह दोनों (सामान्य गुरु और सद्गुरु) में अन्तर होता है।
पूरे महाभारत काल में केवल एकमात्र कृष्ण ही दिखाई दे रहे थे, एक अकेला व्यक्तित्व, जो आडम्बर युक्त नहीं था, प्राण तत्व युक्त था। ठीक आश्रम में भी एक अद्वितीय विभूति… एक सामान्य दिखाई देने वाला व्यक्तित्व (सद्गुरु) भी अलग हट जाता है, दूर चला जाता है… चाहे पांच किलोमीटर, चाहे पांच सौ किलोमीटर… चला जाता है, तो ऐसा लगता है, कि सब कुछ ठहर गया है, सब कुछ समाप्त हो गया है, शिष्य मृतप्राय से हो जाते हैं, उनमें धड़कन नहीं रहती, चेतना नहीं रहती।
बाहरी आंखों से ही हम ऐसी स्थितियों का अनुभव कर सके हैं, कि – यह व्यक्ति साधारण है या अलौकिक है, और ऐसे व्यक्ति के माध्यम से हम अपने चित्त की अनेक वृत्तियों को पार करते हुए अन्तरमन की गहराई में उतर सकते हैं।

 

प्रश्‍नः कृपया आपने जो ध्यान की अवस्थाएं समझाई हैं, क्या यह हमें कम समय में सम्भव है?
– मैंने अभी आपको समझाया, समय इसके लिए अपने-आप में कोई महत्वपूर्ण तथ्य नहीं है, यह तो एक छलांग है – आप में कितनी हिम्मत है, आप कितनी गहराई तक छलांग लगा सकते हैं। यदि आप डरपोक हैं तो धीरे-धीरे कदम बढ़ायेंगे, यदि आप साहसी हैं, तो एकदम से छलांग लगा देंगे। यदि आप कायर हैं, तो धीरे-धीरे अपना हाथ गुरु के हाथ में सौंपेगे। यदि आप दृढ़ चित्त हैं, तो एकदम से अपना सर्वस्व गुरु को सौंप देंगे। आप अपने-आप को कितना खोलते हैं, यह आप पर निर्भर है, आप अपने-आप को कितना सौंपते हैं, यह इस बात पर निर्भर है, कि जितना आप खुलेंगे, उतना ही आप आगे बढ़ेंगे, जितना अपने को सौपेंगे उतना ही आप गहराई में उतर सकेंगे।
यह कोई एक पाठशाला नहीं है कि, पहली क्लास के बाद दूसरी, फिर तीसरी और चौथी क्लास पार करने पर ही सोलहवीं क्लास पास कर सकते हैं। यह तो एक क्रिया है, यदि सद्गुरु की कृपा हो गई, यदि उन्होंने अहसास कर लिया कि – यह व्यक्ति मुझे समझने की क्रिया का अहसास करने लगा है… यदि उनको यह विश्‍वास हो गया कि, यह मेरे जीवन में प्रवेश करने लगा है… यदि सद्गुरु को यह विश्‍वास हो गया, कि यह मुझमें लीन होने की क्रिया प्राप्त करने लगा है… जब सद्गुरु यह अनुभव करने लगते हैं कि, मेरे पांव में कांटा चुभा है और इसको दर्द अनुभव हुआ है… यह शरीर से अलग हटकर प्राणों से जुड़ने की क्रिया प्रारम्भ कर रहा है।
– और जब प्राणों से जुड़ने की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है, तो धीरे-धीरे आत्मसात् होने की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है, जैसे- दूध में दूध मिलाने से एकरस हो जाता है, जैसे – नदी बहकर पूर्णरूप से समुद्र में समाकर एक हो जाती है.. और समाने के बाद हम चाहें तो भी नदी के पानी को समुद्र से अलग नहीं कर सकते हैं, यह नहीं बता सकते, कि यह लोटे भर पानी नदी का है या समुद्र का है, क्योंकि दोनों एकाकार हो जाते हैं।
शिष्य की भी यही अवस्था है, जब वह नदी की तरह अपने-आप में निश्‍चिन्त होकर यह विचार कर लेता है कि, मुझे मिल जाना है, रुकना ही नहीं है, चाहे जो कुछ भी हो-खारी हो जाऊंगी, तो खारी हो जाऊंगी… मेरा नाम मिट जाएगा, तो मिट जाएगा – और ज्यों ही वह समुद्र में मिली, उसका गंगा नाम मिटा, वह समुद्र देवता हो गई। उसका मीठा पानी समाप्त हो गया और वह खारे पानी में बदल गई… उसकी उसे कोई परवाह नहीं, क्योंकि समाप्त होकर वह अपने-आप में महासमुद्र कहलाई, फिर छोटी सी नदी नहीं कहलाई, वह परमब्रह्म में लीन हो गई।
-और शिष्य की भी यह अवस्था है, जब वह अपने-आप को हटाकर पूर्णरूप से सद्गुरु के प्राणों में लीन होने की क्रिया प्रारम्भ कर लेता है… और लीन हो जाता है, तो सद्गुरु एक ही छलांग में उसको उस अवस्था तक पहुंचा देते हैं, जो ध्यान की अवस्था है, जो पूर्णता की अवस्था है, जो चैतन्यता की अवस्था है।
– वह जितना गुरु पर विश्‍वास करता जाता है, उतना ही गुरु उसको आगे बढ़ाता रहता है।
– वह जितना उसमें एकाकार होता रहता है, उतना ही गुरु उसको आगे ठेलता रहता है – यह शिष्य पर निर्भर है कि, वह अपने-आप को पूर्णरूप से समर्पित करता है या अधूरा समर्पित करता है।
आधा-अधूरा समर्पण है, तो गुरु तटस्थ भाव से, द्रष्टा भाव से देखता रहता है – उनके विकारोंे को, उसके चित्त को, क्योंकि वह समझ जाता है कि, इसने अपने प्राणों को मेरे प्राणों में समाहित करने की दस प्रतिशत क्रिया की है – तो वह दस प्रतिशत ही उसे गहराई में उतारता है… इसके आगे वह उतार भी नहीं सकता… उसके लिए सम्भव नहीं।
मगर जिस क्षण गुरु यह निश्‍चय कर लेता है, कि अब मुझे इसको उठाकर परम अवस्था तक पहुंचा देना है, तो फिर भले ही शिष्य में कितने ही विकार हों, फिर भले ही वह शरीर की अवस्था पर जिन्दा हो, किसी भी स्थल पर हो – गुरु उसको उठाता है ओर सीधे ही उसे उस ध्यान के महासमुद्र में उतार देता है… जो क्षीर सागर है… जहां पूर्णब्रह्म विराजमान हैं, जहां शेषनाथ की शय्या पर ब्रह्म लेटे हुए हैं, जहां पूर्णता उनके चरण दबा रही होती है – उस अवस्था पर सद्गुरु चाहें तो सामान्य, अधम अजामिल जैसे पापी को भी एक छलांग में वहां उतार सकते हैं।
– ये दोनों स्थितियां हैं, शिष्य की तरफ से भी और गुरु की तरफ से भी। शिष्य कितना अपने-आप को सौंपता है, गुरु कितना उसको उठाकर फेंकता है – दोनों बातें एक-दूसरे पर निर्भर हैं, यह दोनों का आपसी और आन्तरिक समझौता है, ज्यों-ज्यों शिष्य आगे बढ़ता है, गुरु भी उसको सहारा देकर आगे बढ़ाता रहता है… इसलिए वहां – उस ध्यान की गहराई में एक सैकण्ड में भी पहुंच सकते हैं… और पांच हजार वर्षों में भी पहुंच सकते हैं। यह शिष्य के क्रियाकलापों पर, उसके चिन्तन पर… और सही शब्दों का प्रयोग करूं, तो समर्पण पर निर्भर करता है।
समर्पण के माध्यम से ही गुरु निश्‍चित कर सकता है कि, मुझे इसको ध्यान की उस अवस्था में पहुंचाना है, जिसे ‘ब्रह्मतत्व’ कहा गया है, जिसको ‘पूर्णता’ कहा गया है, जिसको ‘पूर्णमदः पूर्णमिदं’ कहा गया है, जिसको ‘परमहंस अवस्था’ कहा गया है, जिसको ‘ईश्‍वर’ कहा गया है।
– जब एक मनुष्य ईश्‍वर बन जाता है, तब जीवन की सर्वोच्च स्थिति बन जाती है।
– जब एक नर-नारायण बन जाता है, तब जीवन की एक सर्वोच्च स्थिति बन जाती है।
– जब एक अदना सा व्यक्तित्व पूर्णता प्राप्त कर लेता है, तब पूरा संसार उसकी ओर ताकने लग जाता है, तब हजारों-लाखों लोगों का कल्याण करने में वह समर्थ हो पाता है, फिर भले ही वह गृहस्थ में दिखाई दे – वह शादी भी कर सकता है, वह हानि-लाभ, सुख-दुःख में हंसता-मुस्कराता हुआ रहता है, मगर इसके साथ ही साथ वह अपने-आप में पूर्णरूप से सजग भी रहता है।
– आवश्यकता तो उस जगह पर पहुंचने की है… और उस जगह पर पहुंचने की क्रिया अत्यन्त कठिन है। उस जगह पहुंचने के लिए केवल एक ही शब्द का प्रयोग किया जा सकता है, वह है – ‘समर्पण’।
समर्पण के पहले गुरु सैकड़ों बार उसकी परीक्षा लेता है, हजारों बार उसकी परीक्षा लेता है, जैसे – सोने का मुकुट बनाने से पहले सोने को सैकड़ों बार तपाया जाता है, उसे आग में झौंका जाता है… उसको कूटा जाता है, बार-बार उसको तोड़ा जाता है, खींच कर तार बनाया जाता है, मगर फिर भी वह सोना उफ् नहीं करता, क्योंकि उसने समर्पण कर दिया है स्वर्णकार के हाथों में… और स्वर्णकार उसको ऐसा मुकुट बना देता है, जो मनुष्य नहीं देवताओं के सिर पर शोभायमान होता है। इसीलिए कबीर ने कहा है –
गुरु कुम्हार शिष कुम्भ है गढ़ि गढ़ि काढ़े खोट।
भीतर भीतर सहज के बाहर बाहर चोट।
जिस प्रकार कुम्हार घड़े को बनाते समय उस पर बाहर से चोट करता रहता है और अन्दर से उसे सहारा दे कर सम्हालता रहता है, ठीक इसी प्रकार गुरु भी देखता रहता है – मैं ऐसा कहता हूं, तो क्या करता है? यदि मैं इसको तोड़ता हूं, तो यह कहां जाकर खड़ा होता है? यदि मैं इसकी परीक्षा लेता हूं, तो यह कितना कच्चा बनता है?
… और शिष्य निरन्तर सजगता के साथ जुड़ा रहने की प्रक्रिया करता है। इस कशमकश में जो शिष्य जीत जाता है, वही सफल हो जाता है, उसे ही गुरु दोनों हाथों में उठाकर सीधे ध्यान की अवस्था में पहुंचा देते हैं। शिष्य जितना टूटेगा, जितना समर्पण की कसौटी पर खरा उतरेगा, उतना ही गुरु उसको एक-एक सीढ़ी पार कराता हुआ आगे तक पहुंचा देंगे।

 

प्रश्‍नः आपने ‘सजगता’ शब्द का प्रयोग किया है और ‘साक्षीभाव’ शब्द का भी प्रयोग किया है, यह सजगता और साक्षीभाव क्या है?
‘सजगता’ का तात्पर्य है – हर समय अपने-आप को सजग रखना, हर समय मन में विचार रखना कि, मुझे उस जगह पहुंचना है, जहां पर मेरी पच्चीस पीढ़ियां नहीं पहुंच पाई, मैं पैदा होकर मरना नहीं चाहता, मैं कुछ अलग हटकर रहना चाहता हूं, मैं कुछ ऐसा करना चाहता हूं जो अपने-आप में अद्वितीय हो, जो मेरी पच्चीस पीढ़ियों में नहीं हुआ है। जिस समय यह भाव आता है, और जो इस भाव को निरन्तर मानस में बनाये रखता है, वह ‘सजग’ रहता है। उसको यह मालूम होता है – मेरा लक्ष्य क्या है? उसको यह मालूम होता है – मुझे क्या करना है?
और फिर सजगता के लिए उसको अपने मां-बाप, भाई-बहिन, सम्बन्धी-रिश्तेदारों से मोह छोड़ना पड़ता है, क्योंकि वह या तो गुरु से मोह रख सकेगा या फिर अपने परिवार से मोह रखेगा – क्योंकि ये दोनों तीर के अलग-अलग धु्रव हैं। तीर तो एक ही है, मगर तीर का अगला हिस्सा नुकीला है, धारदार है… और पीछे का हिस्सा फलक है। यदि शिष्य फलक में रहेगा तो पीछे ही रहेगा, जिस प्रकार से पीढ़ियां समाप्त हुईं, उसी प्रकार वह भी समाप्त हो जाएगा, वैसे ही श्मशान की यात्रा कर लेगा।
जो अगले नुकीले भाग पर है, उसको चुभेगा भी, दर्द भी होगा और सजग भी रहेगा… और सजगता जीवन की श्रेष्ठता है, जो बड़ी मुश्किल से प्राप्त होती है। जो सजग रहेगा, उसे निरन्तर यह ध्यान रहेगा – ‘मुझे समर्पण करना है।’ वह चाहे कुछ भी आदेश दे – ‘मुझे इस पर विचार नहीं करना है, कि गुरु ने मुझे क्या आदेश दिया है? क्यों आदेश दिया है? यह उनका काम है। यदि मैं समझ जाऊंगा, तो फिर मैं खुद ही गुरु न बन जाऊंगा ?
मैं तो एक शिष्य हूं, मैं तो मिट्टी का एक लौंदा हूं, वह मुझे क्या बनाना चाहते हैं, यह तो वे ही जानें… मैंने अपने आपको उनके हाथों में सौंप दिया… घड़ा बनायेंगे… सुराही बनाएंगे… दीपक बनाएंगे… बनाएंगे तो जरूर। यदि दीपक बनाएंगे तब भी मैं अंधकार को दूर कर सकूंगा। सुराही बना देंगे – तब भी मैं सैकड़ों लोगों की प्यास बुझा सकूंगा। मिट्टी को चिन्तन करने की आवश्यकता नहीं है, सजग रहने की आवश्यकता है, कि मुझे निरन्तर कुम्हार के हाथों में रहना है।
‘साक्षीभाव’ का तात्पर्य है – सब कुछ सामने होते हुए भी निरन्तर द्रष्टा भाव में रहें, जैसे – सिनेमा हॉल में बैठा आदमी पिक्चर को देखता रहता है, उसके चेहरे पर, मन पर कोई विकार या कोई सुख-दुःख व्याप्त नहीं होता, क्योंकि उसे यह मालूम है, मैं टिकट लेकर यहां बैठा हूं और मुझे तीन घंटे बाद यहां से बाहर निकल जाना है – यह साक्षीभाव है।
इसी प्रकार जीवन में भी मां के प्रति, भाई के प्रति, बाप के प्रति, पत्नी के प्रति, सम्बन्धियों के प्रति केवल साक्षीभाव रखना है। जो उसमें लिप्त नहीं है, जो देखता रहता है, मां कहती है – उसका भी कहना मानना है, पत्नी कहती है – उसका भी कहना मानता है, सबका कहना मानता है, मगर अपने-आप में सजग रहता है – यह मेरा लक्ष्य नहीं है, ये कह रहे हैं, मैं सुन रहा हूं, ये कह रहे हैं, मैं कर रहा हूं, बस खत्म।
-मेरा मूल लक्ष्य इनके बीच में स्वयं को समाप्त करना नहीं है।
– इस शरीर के तल पर जीवित रहकर समाप्त होना नहीं है।
इस शरीर के तल से नीचे उतर कर उस जगह पहुंचना है… जहां पहुंचने पर ‘ब्रह्मत्व’ प्राप्त होता है… जहां पहुंचने पर ‘ईश्‍वरत्व’ प्राप्त होता है… जहां पहुंचने पर ‘नारायणत्व’ प्राप्त होता है… और उस जगह पहुंचने पर ही पूरा संसार उसे देखेगा, और आने वाली पीढ़ियां उसकी सराहना करेंगी, उसकी ही नहीं अपितु उसके माता-पिता की भी, उसके कुटुम्ब की भी, उसके परिवारजनों की भी।
जब कृष्ण को स्मरण करते हैं तो राधा को भी स्मरण करते ही हैं, कृष्ण को स्मरण करते हैं तो, यशोदा और नन्द को भी स्मरण करते हैं, क्योंकि वे उनसे जुड़े हुए हैं।
वह व्यक्ति जो सजग है, सद्गुरु के चरणों के लीन होकर ध्यान अवस्था और समाधि तक पहुंचता है, तो उसके साथ-साथ उसके मां-बाप भी अपने-आप सम्मान योग्य बन जाते हैं, धन्यभागी बनते हैं, अहोभागी बनते हैं, गर्व करते हैं… और उस पीढ़ी का वह एक वरदायक व्यक्तित्व बनता है, क्योंकि अपनी पीढ़ी में वह उस जगह पहुंचा है, जो अपने-आप में ध्यान की पूर्ण अवस्था है, जिसको ‘पूर्णमदः’ कहा गया है, फिर भी वह साक्षीभाव से इस संसार में बना रहता है, निरन्तर उनके बारे में सोचते हुए भी वह शरीर से गुरु के चरणों में बना रहता है, क्योंकि सिंहासन तो वही है, जिस पर देवता को स्थापित करना है, जब सिंहासन ही प्राप्त नहीं होगा, तो देवता का कहां स्थापन होगा? जब सिंहासन ही हजार मील दूर होगा, तो फिर देवता को कहां स्थापित किया जाएगा?
इसलिए विचार मां-बाप, भाई-बहिन के प्रति रखते हुए भी वह साक्षीभाव से देखता रहता है – मां अपना सुख-दुःख भोगती रहती है, बाप अपना सुख-दुःख भोगता रहता है – जिसका जैसा कर्म है वह उसी प्रकार फल भोग रहा है, वह खड़ा खड़ा देखता रहता है… मगर अपने सिंहासन रूपी शरीर को, गुरु के हाथों में ही रखता है, क्योंकि गुरु उस सिंहासन पर, वह मूर्ति स्थापित करने जा रहे हैं, जिस मूर्ति को ‘ईश्‍वर’ कहा गया है, जिस मूर्ति को ‘देवता’ कहा गया है, जिस मूर्ति को ‘ब्रह्म’ कहा गया है।

 

प्रश्‍न : ब्रह्मचर्य क्या है? क्या गृहस्थ व्यक्ति भी ध्यान कर सकता है? साधु क्या है, क्या ध्यान के लिए साधुता या ब्रह्मचर्य आवश्यक है?
-ब्रह्मचर्य का तात्पर्य गलत लगा लिया गया है, और सैंकड़ों वर्षों से इस शब्द की जितनी दुर्गति हुई है, उतनी किसी शब्द की हुई नहीं है। हमने अविवाहित रहने को ब्रह्मचर्य मान लिया है – जो कुंआरा है, वह ब्रह्मचारी है। जबकि, ब्रह्मचर्य का तात्पर्य है – जो ब्रह्म के अनुसार चले, जो ब्रह्म जैसा आचरण करे, वह ब्रह्मचारी है। जब व्यक्ति ब्रह्म तक पहुंचेगा, तभी ब्रह्मचर्य अवस्था प्राप्त हो पाएगी।
ब्रह्मचारी का ध्यान से कोई सीधा सम्बन्ध नहीं है, ध्यान के लिए जरूरी नहीं है कि वह ब्रह्मचारी बने ही, क्योंकि ध्यान की अन्तिम अवस्था ब्रह्मचर्य है… जब वहां पहुंचेगा, तब वह ब्रह्मचारी कहला सकेगा, प्रारम्भ में ब्रह्मचारी कैसे कहला सकेगा? प्रारम्भ में तो शरीरचारी कहलाएगा, ब्रह्मचारी या ब्रह्मचर्य तो बहुत बाद की अवस्था है क्योंकि ब्रह्म को जानकर, उसके अनुसार चलने की क्रिया जो करता है, वह ब्रह्मचारी है।
– और साधुता का तात्पर्य… भगवे कपड़े पहनने की क्रिया को साधुता नहीं कहते हैं, जो एकाग्र रह सकता है, जो निर्विकार रह सकता है, जिसके मन में, जिसके चित्त में किसी प्रकार का विकार उत्पन्न नहीं होता, जो किसी स्त्री को देखकर मोहान्ध नहीं होता, जो विषय-वासनाओं में लीन नहीं होता, जो अपने-आप में साक्षीभाव सीख गया है, जिसने अपने-आप को साध लिया है, जिसने मन को साध लिया है- वह साधु है।
यह आवश्यक नहीं है कि, केवल साधु ही ध्यान कर सकता है… और सही अर्थों में कहा जाए तो, साधु ध्यान कर ही नहीं सकता, क्योंकि साधु ध्यान करेगा तो, उसकी आंखों में विकार उत्पन्न होगा, क्योंकि उसने उन इच्छाओं का दमन किया है, जो काम की इच्दा है… और दमन की हुई चीज तो वापस उभरेगी ही। ज्योंही वह आंख बंद करेगा, उसके सामने लकड़ी की फोटो खड़ी हो जाएगी, वह ध्यान की अतल गहराइयों में उतर सकता है।
इसका तात्पर्य यह नहीं है कि, संन्यासी नहीं उतर सकता। यदि वह सही अर्थों में न्यास कर चुका है, छोड़ चुका है, साक्षीभाव में आ चुका है तो, वह संन्यासी है, और यदि वह संन्यासी है तो, वह ध्यान की गहराई में उतर सकता है। इसलिए ध्यान के लिए… न कुंआरा रहने की जरूरत है… न विवाह करने की जरूरत है… न स्त्री होना जरूरी है… न हिमालय में जाना जरूरी है… आप किसी भी स्थिति में हों… मगर आपके अन्दर एक तीव्र लालसा हो, इच्छा हो, एक भावना हो, एक दृढ़ निश्‍चय हो – समर्पण का।
यहां तीनों चीजें आवश्यक हैं। एक पहला, ‘साक्षीभाव’ – जहां आप अपने परिवार को साक्षीभाव से देखते हुए सद्गुरु के पास खड़े हैं।
दूसरा, ‘समर्पण’ – अपने आप को साक्षीभाव में रखते हुए मन से, विचारों से, प्राणों से, भावनाओं से अपने आप को समर्पित करें और समर्पण के बाद आपके पास सोचने का, निर्णय करने का, कोई चिन्तन, कोई क्षमता नहीं है।
गुरु क्या कर रहा है? इसकी तुम्हें गणित करने की जरूरत नहीं, गुरु क्या कह रहा है, तुम्हें यह देखने की जरूरत है।
और तीसरा, ‘प्रबल इच्छाशक्ति’ – मुझे इसी जीवन में इस शरीर से आगे बढ़कर उस जगह पहुंच जाना है, जो पूर्णत्व प्राप्ति की जगह है, जो अपने-आप ध्यान की जगह है।

 

प्रश्‍नः क्या ध्यान में जप करने से जल्दी सफलता और सिद्धि मिलती है?
– जब आप ध्यान में पहुंच गये, तब जप हो ही नहीं सकता, फिर कोई चिंतन नहीं रहेगा। एक तरफ आप आंख बंद करेंगे और दूसरी तरफ आप लक्ष्मी की माला जपेंगे… आपका चिन्तन, आपकी विचारधारा तो लक्ष्मी में हैं, माला में है, फिर ध्यान कहां हुआ?
ध्यान का ध्येय है ‘न’, जहां कुछ भी अहसास नहीं है, शरीर का भी, प्राणों का भी और मन का भी… कुछ है ही नहीं, तो फिर माला कहां से आ गई? लक्ष्मी कहां से आ गई? फिर मंत्र-जप कहां से आ गया?
-ध्यान जहां है, वहां पर मंत्र-जप की आवश्यकता नहीं है।
– ध्यान जहां है वहां पर किसी प्रकार के क्रियाकलापों की आवश्यकता नहीं है।
– क्योंकि इनको तो हम पहले शरीर पर ही छोड़ चुके हैं, और वहां से आगे बढ़कर हमने जिस भाव-भंगिमा को स्पर्श कर लिया, वहां यह धन-दौलत वगैरह सब सामान्य सी बात है, क्योंकि उसके सामने स्वयं लक्ष्मी साकार उपस्थित होगी ही। ॠद्धि-सिद्धि, महाकाली, छिन्नमस्ता, भुवनेश्‍वरी, धन-वैभव, यश-प्रतिष्ठा तो उसके चरणों में रहेंगे ही, क्योंकि वह उस स्थान पर है, जिसको ‘पूर्ण’ कहा गया है, भौतिक रूप से भी, आध्यात्मिक रूप से भी और राजसी रूप से भी।
‘जनक’ अपने-आप में पूर्ण राजा थे, उनकी सैकड़ों रानियां थीं, परन्तु उसके बाद भी वे पूर्ण ब्रह्मचारी थे। ‘कृष्ण’ सोलह हजार रानियों के पति होते हुए भी पूर्ण ब्रह्मचारी थे, क्योंकि वे ब्रह्म को जानने की क्रिया करते थे। इसलिए पत्नी होना या प्रेमिका होना अथवा पति होना, इन बातों का ब्रह्मचारी होने से कोई मतलब नहीं है। इसलिए ध्यान में माला, मंत्र-जप की आवश्यकता होती ही नहीं और जहां पर मंत्र-जप है, वहां ध्यान नहीं है। ध्यान और बाहरी क्रियाकलाप दोनों अलग-अलग तथ्य हैं।

 

प्रश्‍नः मन में कामुक और बुरे विचार उठते रहते हैं, इनको दबाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
मन में कामुक और बुरे विचार इसलिए उठ रहे हैं, क्योंकि आप ने स्वयं को पहचानने की क्षमता को भुला दिया है। आपको इस बात का अहसास नहीं है कि हीरा क्या है, और कंकड़ क्या है? उज्ज्वलतम हीरा कोयले की खदान से ही निकलता है। जहां कोयला पैदा होता है, वहीं हीरा पैदा होता है, एक ही धरती पर एक ही खान में, किन्तु उसे पहचानने की क्षमता होनी चाहिए। यह इस बात पर निर्भर है कि, आप कंकड़-पत्थर चुनते हैं, कोयला चुनते हैं या हीरा चुनते हैं – यह तो आपकी इच्छा की बात है, और यदि ऐसे विचार मन में हैं, तो इनको दबाने की आवश्यकता नहीं है, दबाने से तो ये और ज्यादा उभर कर सामने आयेंगे। गेंद को पृथ्वी पर जितना जोर से मारेंगे, वह उतनी ही ज्यादा दबेगी, और वह जितनी ज्यादा दबेगी, उतनी ही ज्यादा उछलेगी… इन विचारों को दबाने की आवश्यकता नहीं है।
यदि आपके कामुक विचार हैं, तो आप उनको रूपान्तरित कर सकते हैं। यदि स्त्री की तरफ मोहान्ध हैं, तो आप नदी की तरफ मोह करिए, आप फूल की तरफ अपने-आप को झुकाइए, आकाश में टिमटिमाते तारों से बात करना सीखिए, वासन्ती हवा से बात करने की क्रिया सीखिए, पेड़ों के झुरमुट के बीच में बैठकर अपने-आप  का काम में रूपान्तरण हो जाएगा, क्योंकि जो काम, जो धारणा, जो विकार आप स्त्री के शरीर में देख रहे थे, वह प्रकृति में देखने लग जाएंगे… आपको नदी उतनी ही सुन्दर दिखाई देने लगेगी, आपको गुलाब के फूल से प्रेम होने लगेगा, आपको वासन्ती हवा से प्रीत होने लगेगी, आपको टिमटिमाते हुए तारों में एक अजीब सी आनन्द की अनुभूति होने लगेगी।
इसलिए इन कामुक और बुरे विचारों को दबाने की आवश्यकता नहीं है, इनको रूपान्तरित करने की आवश्यकता है… और रूपान्तरित करने के लिए संगीत आपका सहारा बन सकता है, चित्रकारी आपका सहारा बन सकती है, गायन आपका सहारा बन सकता है, प्रकृति आपका सहारा बन सकती है… और सबसे ज्यादा आप अपने-आप का सहारा बन सकते हैं। जब आप अपने-आप से प्रेम करने लगेंगे, फिर आपको दूसरों से प्रेम करने की जरूरत ही नहीं होगी। जब आप अपने-आप के प्रति मोहग्रस्त होंगे, तो आपको दूसरों के प्रति मोहग्रस्त होने की जरूरत ही नहीं रहेगी। इसलिए इन विचारों को दबाने की आवश्यकता ही नहीं है, इन्हें रूपान्तरित करने की आवश्यकता है। यह बाहरी भेद है, रूपान्तरित करना भी बाहरी भेद है, यह विचार आना भी बाहरी भेद है, और बाहरी भेदों को अपने प्रयत्नों से रूपान्तरित किया जा सकता है।

 

प्रश्‍नः क्या कोई ऐसा मंत्र-जप या विधि है, जिससे जल्दी से जल्दी ध्यान लग जाए?
-पिछले पच्चीस हजार वर्षों में ऐसा कोई मंत्र-जप या ऐसी साधना विधि नहीं बनी है, जिसके द्वारा जल्दी से जल्दी ध्यान लग जाए। ध्यान ऊपर तलछट से हो ही नहीं सकता, और मंत्र-जप ऊपरी तलछट जैसे ही होते हैं, ऐसे विचारों से युक्त होते हैं, ऐसी इच्छाओं से युक्त होते हैं… जैसे – मेरी इच्छा है, मैं लखपति बन जाऊं, क्योंकि मैं लक्ष्मी की साधना करता हूं, और लक्ष्मी का मंत्र जप कर रहा हूं… यह ऊपरी तलछट का चिन्तन है। मैं बलवान होना चाहता हूं, मैं ताकतवान होना चाहता हूं, मैं शत्रुओं को परास्त करना चाहता हूं, इसलिए मैं बगलामुखी मंत्र-जप कर रहा हूं… यह ऊपरी तलछट है।
और ऊपरी तलछट अपने-आप में बाहरी कार्यों पर नियन्त्रण प्राप्त करने की अदम्य इच्छा है, वह चाहे लोभ हो, चाहे काम हो, चाहे क्रोध हो, चाहे वासना हो… और जहां ऐसा है, वहां ध्यान नहीं हो सकता। ध्यान के लिए इन वस्तुओं की आवश्यकता है ही नहीं, मंत्र-जप से ध्यान संभव ही नहीं है, ध्यान के लिए तो अपने-आप को भुला देना पड़ेगा। जिसने अपने-आप को भुला दिया, उसने ध्यान की ओर पहली बार कदम बढ़ा दिया।
-सजग रह कर अपने दोनों हाथों को सद्गुरु के हाथों में सौंप देने की क्रिया को ध्यान की पहली स्थिति कहते हैं।
-अपने आप को उनके चरणों में समर्पित कर देने की क्रिया को ध्यान की दूसरी सीढ़ी कहते हैं।
– अपने आप को मिटा कर उनमें पूर्णरूप से लीन होने की क्रिया को तीसरी सीढ़ी कहते हैं।
– उनके सुख और दुःख में ही अपना सब कुछ समझने की क्रिया को ध्यान की चौथी स्थिति कहते हैं।
– और इसके लिए कोई मंत्र-जप है ही नहीं, इसके लिए कोई माला है ही नहीं, इसके लिए किसी भी प्रकार के क्रियाकलाप की आवश्यकता है ही नहीं।
इसलिए मंत्र-जप के माध्यम से ध्यान नहीं हो सकता, ये अधकचरे साधु, पाखण्डी पंडित ऐसा मंत्र दे सकते हैं – ध्यान के लिए मंत्र करते समय या राम-राम करते समय आप ध्यान में लीन हो जाएंगे, यह भ्रम है, यह धोखा है, यह छल है, यह गुमराह करने की प्रवृत्ति है, क्योंकि जहां विचार है, वहां ध्यान नहीं हो सकता, जहां कुछ पाने की इच्छा है वहां ध्यान नहीं हो सकता।
जो सब कुछ छोड़ देता है, वह सब कुछ प्राप्त कर सकता है। टुकड़ों-टुकड़ों में खाने से सब कुछ प्राप्त नहीं हो सकता, क्योंकि हम कंकड़-पत्थर तो इकट्ठे कर सकते हैं, मगर मूल रूप से जो कुछ प्राप्त करना है, उसको खो देते हैं। ज्योंही हम पत्नी को प्राप्त करना चाहते हैं, ज्योंही हम पुत्र को प्राप्त करना चाहते हैं, तो इस रूप में कंकड-पत्थर ही हम इकट्ठे करते रहते है। एक पत्नी, दो पत्नी, दस पत्नियां, बीस पत्नियां, प्रेमिकाएं, बीस प्रेमी, पांच लाख रुपये, दस लाख रुपये – ये सब कुछ तो ऐसा ही है, जो यहीं पर है, आगे तो कुछ जा नहीं सकता, दरवाजे तक भी नहीं जा सकता, वहां तो आपकी अर्थी अकेली ही जाएगी।
वह धन जो अद्वितीय है, जिसको आनन्द कहा गया है, वह इन चीजों से नहीं प्राप्त हो सकता, इन चीजों को छोड़ने पर ही अखण्ड आनन्द की प्राप्ति हो सकती है। जिसने अखण्ड प्राप्त कर लिया, उसके सामने ऐसे ध्येय तो कंकड़ पत्थर की तरह ही हैं। वह ठोकर मार देगा हीरों को, क्योंकि उसके सामने तो सैकड़ों राजा-महाराजा हाथ जोड़कर खड़े रहते हैं… और उसे राजा-महाराजाओं की भी जरूरत नहीं है… लक्ष्मी तो उसके चरणों में बैठ कर उसके पांव दबाती रहती है… उसके सामने तो सैकड़ों सिद्धियां हाथ बांधे खड़ी रहती हैं… क्योंकि वह नर से नारायण बना है।
और आप ज्यों ही नर से नारायण बनेंगे, त्योंही लक्ष्मी आपके चरणों में रहेगी। आप शांत समुद्र बन सकेंगे, तभी आप उस जहर… जो शेषनाथ का जहर है; उस पर आराम से लेट सकेंगे, जहर आपके शरीर में व्याप्त नहीं हो पाएगा, बाहरी संसार का जहर भी आपके शरीर को नुकसान नहीं पहुंचा सकता।
इसलिए ऐसी किसी भी विधि के माध्यम से भूलकर भी ध्यान की ओर बढ़ने की कोशिश मत करना, क्योंकि वह समय का अपव्यय होगा।

 

प्रश्‍नः धारणा क्या है?
– ध्यान से आगे की जो स्थिति है, वह ‘धारणा’ है। धारणा का मतलब है – ‘मैंने अपने-आप को अपने-आप में अवस्थित कर लिया है, मैं अपने-आप में लीन हो गया हूं।’
ध्यान तक तो गुरु तुम्हें अपने साथ ले जाता है, उसके बाद गुरु तुम्हें छोड़ देता है। गुरु तुम्हें उस जगह ले जाकर खड़ा कर देता है, जहां गुरु बनने की क्रिया शुरू हो जाती है। जब तक तुम शिष्य हो, तब तक तुम उसकी उंगली पकड़कर चल रहे हो, मगर ध्यान की अन्तिम अवस्था पर पहुंचा कर गुरु तुम्हें छोड़ देता है, क्योंकि उसे मालूम है – अब मैं उसे गुरु बनाने की ओर प्रवृत्त कर रहा हूं, उसको मैं सूर्य बनाने की ओर प्रवृत्त कर रहा हूं। अभी तक तो यह दीपक था, मगर अब इसमें इतनी क्षमता आ गई है कि, जो कुछ मैंने दिया है वह खो नहीं सकता, इसके हृदय में जम गई है मेरी बात।
ध्यान की जिस अवस्था में वह पहुंचा है, उस अवस्था से वापस नहीं आएगा। संसार में रहेगा भी तो, साक्षीभाव में ही रहेगा, एक दिखावे के रूप में ही रहेगा, क्योंकि वह भी इस संसार का ही प्राणी है, परिवार का एक सदस्य है। साक्षीभाव के बीच में वह उस परिवार के साथ हंसता, रोता, मुस्कराता हुआ, छल करता हुआ, गीत गाता हुआ, नृत्य करता हुआ और उदास होता हुआ दिखाई देगा। यह बस बाहरी क्रियाकलाप इसलिए, कि वह संसार में है, वह परिवार में है।
मगर अन्तःस्थल में वह ध्यान की अतल गहराइयों में है, धारणा में है। पूर्णता के साथ में है, अब यह वहां से हट नहीं सकता। अब बाहरी मोह-माया इसको व्याप्त नहीं हो सकती, अब यह मुझसे परे नहीं हो सकता, अब इसके हटने की क्रिया नहीं है।
जब उसमें द्रष्टा भाव आ जाता है… तब गुरु उंगली छोड़ देता है, तब गुरु उसका हाथ छोड़ देता है। जब वह धारणा शक्ति में खड़ा हो जाता है, उसके पांव में मजबूती आ जाती है, तब वह आगे की स्थिति प्राप्त कर लेता है… और जहां आगे की स्थिति प्राप्त होती है, वहां स्थिरता आने लग जाती है, जब हृदय में धारणा शक्ति प्रारम्भ हो जाती है, तब वह विचलित नहीं होता, तब किसी सुन्दर लड़की को देखकर उसके हृदय में वासना जाग्रत नहीं होती, तब किसी धन के ढेर को देखकर उसमें लोभ व्याप्त नहीं होता।
इस अवस्था में पहुंचने पर, इससे आगे का कदम है – धारणा शक्ति। यहां पहुंचने के बाद वह पीछे हटता ही नहीं है। जिसने एक बार उस आनन्द को चख लिख, उसे ऐसा लगेगा-बहुत गन्दा समाज है, घिनौना और घटिया, झूठ, छल और कपट से भरा हुआ… वह उस जगह अवस्थित हो जाता है, जहां अवस्थित होने की क्रिया को ‘धारणा’ कहते हैं।
धारणा शक्ति ध्यान के आगे की क्रिया है, वहां ध्यान अपने-आप आगे बढ़ेगा, उस समय उसको फिर गुरु की जरूरत नहीं है, क्योंकि उसके आगे वह अपने-आप में सद्गुरु बनने की क्रिया की ओर बढ़ता है। वह स्वयं अपने-आप में रूपान्तरित हो जाता है… तब उसमें रूपान्तरित होने की क्रिया प्रारम्भ हो जाती है। वह नर से नारायण बनने की ओर आधी से ज्यादा दूरी पार कर लेता है, और धीरे-धीरे परिवर्तित होता हुआ धारणा शक्ति में पहुंचते ही वह अपने-आप परमहंस अवस्था में पहुंच जाता है।
‘परमहंस’ – हंस के समान स्वच्छ और निर्मल, जिसमें किसी प्रकार का मैल नहीं है, छल नहीं है, झूठ नहीं है, कपट नहीं हैं, मोह नहीं है… और किसी भी प्रकार की आसक्ति नहीं है… गोपियों के बीच में रह कर कृष्ण अपने-आप में योगेश्‍वर है… राधा से प्रेम करता हुआ भी वह अपने-आप में ब्रह्मचारी है… हजारों रानियों का पति होते हुए भी वह अखण्ड ब्रह्मचारी है – और महाभारत का युद्ध करते हुए भी अपने-आप में जगद्गुरु है – ‘कृष्णं वंदे जगद्गुरुम्’ यह स्थिति धारणा शक्ति के माध्यम से ही सम्भव है।
धारणा शक्ति तक पहुंचने के लिए कुछ प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन ध्यान तक पहुंचने के लिए तो सद्गुरु की जरूरत है, और ध्यान के आगे धारणा तक पहुंचने के लिए सद्गुरु नहीं है, क्योंकि वहां तो अकेले ही यात्रा करनी है, क्योंकि वहां से आगे का रास्ता उसका राजपथ है, कोई पगडंडी नहीं है, अटपटी जगह नहीं है, अस्पष्ट नहीं है, यह सीधा राजपथ है, जहां चलते रहना है… उस पथ पर अपने-आप उसके पैर बढ़ेंगे… अपने-आप उसकी मस्तियां बढ़ेंगी… और वह अपने-आप उस जगह खड़ा हो जाएगा – जिसे परमहंस अवस्था कहा गया है।

 

प्रश्‍नः पल-पल, चौबीसों घंटे सजग कैसे रहा जा सकता है?
– चौबीसों घंटे सजग रहने के लिए किसी प्रकार का प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं है, तुम्हें साक्षीभाव से रहना है, सजग तो तुम्हारे अन्दर जो गुरु है, वह रहेगा। जब गुरु को तुमने अपने अन्दर धारण कर लिया तो, वह अपने-आप में सजग है ही, क्योंकि वह गुरु शरीर नहीं है, क्योंकि वह गुरु तो परमहंस से भी ऊपर की अवस्था है – वह ‘नारायणत्व’ की अवस्था है, वह ‘ब्रह्मत्व’ की अवस्था है, वह ‘पूर्णत्व’ की अवस्था है… जब वह अन्दर है, तो जितनी बार भी हृदय धड़केगा, तो सद्गुरु की ही धड़कन होगी, ‘गुरु’ शब्द के बिना हृदय धड़क ही नहीं सकता, धड़कन तभी होगी जब गुरु होगा… क्योंकि गुरु उस धड़कन के साथ एकाकार हो जाता है।
प्रत्येक धड़कन के साथ गुरु को सजग रहना पड़ता है – कहीं छल, झूठ, कपट या दूसरी मलिन चीज उसकी धड़कन के साथ नहीं धड़के… सजग तो गुरु को रहना है, तुम्हें साक्षीभाव से रहना है, क्योंकि सजगता तुम्हारे नेत्रों में और शरीर में नहीं है, सजगता तुम्हारी धड़कन में है… और धड़कने के लिए हृदय को कहना नहीं पड़ता – तुम धड़को… वह तो ऑटोमेटिक क्रिया है, आप सोते हैं तब भी हृदय धड़केगा ही, आप जागते हैं तब भी हृदय धड़केगा, आप कार चला रहे हैं तब भी हृदय धड़केगा… और जब वह धड़केगा… और गुरु जाग्रत है, अतः वह अपने-आप तुम्हें जाग्रत रखेगा ही। पल-पल तुम्हें उस रास्ते पर बढ़ाएगा ही। आवश्यकता केवल इतनी ही है कि, तुम्हें अपनी धड़कन में गुरु को एकाकार कर देना है। यह सजगता जीवन की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

 

प्रश्‍नः क्या धर्म के माध्यम से ध्यान व धारणा संभव है?
-धर्म हमारी चीज नहीं है, हमने धर्म को स्वीकार नहीं किया है, धर्म तो हम पर थोप दिया गया है। मेरे मां-बाप हिन्दू थे, इसलिए मैं हिन्दू बन गया, और यदि मैं मुसलमान के घर जन्म लेता, तो ऑटोमेटिकली मुसलमान बन जाता – इसका अर्थ है, मैंने सोच-विचार कर धर्म को धारण नहीं किया है। यह तो जिन मां-बाप के घर में जन्म लिया और वे जो थे, वही मुझे बनना पड़ा, इसलिए धर्म आन्तरिक प्रवृत्ति नहीं है।
धर्म बाह्य प्रवृत्ति है… और जो बाह्य प्रवृत्ति है, उसके माध्यम से ध्यान प्राप्त नहीं हो सकता, वह शरीर की अवस्था है, हमारा शरीर हिन्दू है… हमारा शरीर मुसलमान है। जब शरीर समाप्त हो जाएगा, तब तुम न हिन्दू रहोगे, न मुसलमान रहोगे, क्योंकि शरीर है तो तुम्हारा धर्म है… क्योंकि शरीर के माध्यम से तुमने धर्म को पहचाना है।
मैं हिन्दू हूं, इसलिए मुझे मंदिर के सामने झुकना चाहिए। मैं मुसलमान हूं, इसलिए मुझे मस्जिद के सामने झुकना चाहिए। यह ‘हूं’ शब्द अहंकार का द्योतक है, अहंकार तुम्हारे शरीर में है, शरीर तुम्हारा धर्म है – ‘शरीरं धारयति स धर्मः’।
– जो शरीर धारण कर सकता है, वह ध्यान कैसे बना सकता है, ध्यान तो उसके बहुत आगे की चीज है, सातवें तल पर है। इसलिए धर्म के माध्यम से ध्यान की अवस्था प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए ध्यान के लिए –
– न हिन्दू है, न मुसलमान है, न ईसाई है, न सिख है।
– न निराकार है, न साकार है, न सगुण है, न निर्गुण है।
– न देवता है, न दानव है, न राक्षस है।
– न भाई है, न बहन है, न सम्बन्धी है, न रिश्तेदार है।
कुछ भी नहीं है, इसलिए धर्म के माध्यम से तुम ध्यान प्राप्त नहीं कर सकते, धर्म के माध्यम से धारणा भी संभव नहीं है, यह तो केवल बाह्य शरीर की अवस्था है… और शरीर की अवस्था के माध्यम से शांति और ध्यान को प्राप्त नहीं किया जा सकता।

 

प्रश्‍न : कई साधु-संत और गुरु ध्यान की और धारण की अलग-अलग विधियां बताते हैं, जबकि आपकी पद्धति सर्वथा अलग है, तो क्या वे सभी पद्धतियां गलत हैं?
मेरी राय में कोई पद्धति गलत नहीं है। वह व्यक्ति गलत है, यदि उसे ज्ञान नहीं है, यदि वह केवल शब्दों के माध्यम से ही आपको भ्रमित करता है, तो वह गलत है… पद्धति गलत नहीं है। तिब्बत में ध्यान करने की विधि अलग है, वहां पर इन चित्त अवस्थाओं की आवश्यकता है ही नहीं, उन लामाओं की पद्धति बिल्कुल हटकर है – उसके माध्यम से  भी ध्यान की अवस्था प्राप्त होती है।
इसलिए मैं यह नहीं कहता – कोई विधि गलत है। विधि तो सभी सही हैं मगर यदि व्यक्ति को ज्ञान नहीं – उस साधु को, योगी को या गुरु को ज्ञान नहीं है तो, वह जो कुछ देता है अधूरा देता है, वह गलत है… और आजकल अधिकांश हमें कचरा ही प्राप्त होता है, क्योंकि उन्होंने सही रास्ते को चुना ही नहीं और सही रास्ते पर चले ही नहीं… उन्होंने तो केवल भगवे कपड़े पहने, पाखण्ड किया, चोटी रखी, त्रिपुण्ड लगाया, जटा बढ़ा दी, बाहरी वेश बदल दिया, बाहरी कपड़े बदल दिये… और बाहरी कपड़ों के माध्यम से कोई साधु या संत नहीं बन सकता।
बाहरी क्रिया-कलापों से वह साधु-संत नहीं बन सकता, और जब वह साधु-संत है ही नहीं, तो फिर उसके विचार अपने-आप में मिथ्या हैं, क्योंकि वह उस रास्ते पर चला ही नहीं… जब वह इस रास्ते पर चला ही नहीं, तो फिर वह बता ही नहीं सकता – ‘ध्यान क्या चीज है?’
वह तो शब्दों के माध्यम से केवल भ्रमित कर सकता है, और शब्दों के माध्यम से तो कोई भी किसी को धोखा दे सकता है, छल कर सकता है, शब्दों के माध्यम से कोई भी किसी के सामने, किसी भी प्रकार का पाखण्ड प्रदर्शन कर सकता है… शब्द अपने-आप में ध्यान नहीं हैं।
मैं किसी भी विधि को गलत नहीं कहता हूं। इसलिए उन व्यक्तियों को वे चाहे साधु हैं, चाहे संन्यासी हैं, चाहे योगी हैं, चाहे हिमालय में रहने वाले हैं, चाहे दिल्ली में रहने वाले हैं, प्रश्‍न यह नहीं है, कि वे कहां रहते हैं? प्रश्‍न यह है कि, क्या वे सही अर्थों में जानकार हैं?
यदि वे जानकार है, और उनको किसी अन्य विधि का ज्ञान है, तो वे सही हैं बारह सौ विधियां हैं ज्ञान प्राप्त करने की, एक-दो विधि नहीं, इस संसार में बारह सौ विधियां हैं… और सभी बारह सौ विधियां अपने-आप में प्रामाणिक हैं।
देखना यह है – उस व्यक्ति के पास खाली शब्दों की लफ्फाजी है या सही विधि है। देखना यह है, कि क्या वह रास्ते पर चला हुआ है या केवल भ्रमित कर रहा है। इसलिए मुझे किसी साधु-संन्यासी से विरोध नहीं है, मुझे केवल उसके अहंकार से विरोध है, उसकी नासमझी से विरोध है, उसकी लफ्फाजी से विरोध है, वह जो भ्रमित कर रहा है, उससे विरोध है।

 

प्रश्‍नः समाधि क्या है?
जब ध्यान के बाद व्यक्ति धारणा शक्ति में पहुंच जाता है, तब गुरु अपने-आप में निश्‍चिन्त हो जाता है – अब यह अपने रास्ते पर निरन्तर गतिशील होगा ही, क्योंकि बाहरी संसार की कोई विषय वासना, कोई भावना इसको गंदा नहीं कर सकती, इसको मैला नहीं कर सकती, इसको हटा नहीं सकती… और वह उसका साथ छोड़ देता है… मगर वह देखता रहता है सजग दृष्टि से कि, वह सही रास्ते पर किस ढंग से बढ़ रहा है, क्योंकि उसको बराबर गतिशील बनाए रखना भी आवश्यक है, यदि आगे गतिशील नहीं होगा, तो फिर पीछे की ओर हटेगा, गति तो है ही, चाहे आगे की ओर हो, चाहे पीछे की ओर हो।
यदि वह आगे की ओर गतिशील नहीं हुआ, तो पीछे की ओर वापिस लौटकर एक साधारण सी स्थिति में आ सकता है, यह डर है… उस गुरु को भी डर रहता है, इसलिए वह उस जगह खड़ा रहता है, जहां ध्यान की क्रिया समाप्त होती है… और उसको धारणा की ओर बढ़ा देता है… ज्योंही वह पीछे हटता है, त्योंहि गुरु उसको धक्का देखर धारणा की ओर बढ़ा देता है। यद्यपि ऐसे क्षण बहुत कम होते हैं, मगर फिर भी एकाध बार ऐसा हो सकता है।
इसलिए गुरु की क्रिया बहुत कठिन होती है, उसको बिल्कुल सजग रहना पड़ता है… और उस समय फिर भी उसके मन में एक ही बात रहती है, कहीं वह अधोगामी नहीं बन जाए, इसलिए उस जगह गुरु बिल्कुल सजग खड़ा रहता है, जहां पीछे की ओर एक खतरनाक ढलान होती है।
मगर ऐसा बहुत कम हो पाता है, जिसने एक बार उस आनन्द को चख लिया, अनुभव कर लिया, वह इन विषय-वासनाओं में लीन हो पायेगा…? वह तो बढ़ेगा ही और निरन्तर बढ़ता रहेगा और जब धारणा शक्ति मजबूत हो जाती है, तो गुरु निश्‍चिंत हो जाता है – वह राजपथ पर है, क्योंकि उसकी आगे की क्रिया, पूर्णता की क्रिया-समाधि है। समाधि का मतलब है – अपने-आप को पूर्णरूप से विस्मृत कर देना। समाधि के पांच अर्थ हैं –
समाधि का अर्थ है – अपने-आप को पूर्णता तक पहुंचा देना।
समाधि का अर्थ है – पूरे ब्रह्माण्ड से अपने-आप को एकाकार कर देना।
समाधि का अर्थ है – समस्त ब्रह्माण्ड में शरीर विचरण करना।
समाधि का अर्थ है – समस्त ब्रह्माण्ड को अपनी आंखों से देखना।
समाधि का अर्थ है – उस ब्रह्माण्ड की, किसी भी हलचल में हस्तक्षेप करके उसको अपने या सामने वाले के अनुकूल बना देना।
जब ऐसा हो जाता है, तो फिर मृत्यु उसे नहीं छू सकती, क्योंकि वह मृत्यु से ऊपर उठ जाता है, काल से भी ऊपर उठ जाता है, फिर समय उसको स्पर्श नहीं करता, फिर दो सौ साल, पांच सौ साल, हजार साल उसके सामने कोई मायने नहीं रखते। दस हजार साल भी उसके लिए उतने ही होते हैं, जितना कि एक सैकण्ड या एक मिनट होता है, फिर वह अजन्मा होता है, निर्विकार होता है, निश्‍चिन्त होता है।
यह अलग बात है, यदि वह चाहे कि मुझे जन्म लेने का भाव प्रदर्शित करना है… जन्म लेना और अवतरण होना दोनों ही अलग-अलग चीजें हैं। कृष्ण ने जन्म नहीं लिया, कृष्ण अवतरित हुए, ऐसा लगा देवकी को – कृष्ण मेरे गर्भ से उत्पन्न हुआ… ऐसा अहसास हुआ। वेदव्यास ने कहा है – नवें महीने तक भी देवकी को यह अहसास ही नहीं हुआ कि, वह गर्भवती है।
अचानक उसकी आंख खुलती है, तो सामने रोता हुआ कृष्ण उसे दिखाई देता है… और उसका मातृत्व, वात्सल्य जाग्रत हो जाता है… उसके स्तनों से दूध निकलने लग जाता है… वह अपने सीने से उसको लगा लेती है… यह जन्म लेने की क्रिया नहीं है… यह अवतरित होने की क्रिया है… उस एक क्षण के लिए वह विस्मृति में डूब गई… क्षणमात्र में एक ऐसी घटना घटित हो गई, जो अपने-आप में अद्वितीय है… और उस अद्वितीय घटना में उच्चतम स्थिति का व्यक्तित्व अवतरित हो गया। समाज ने उसको ‘जन्म’ कहा, पर योगियों ने उसको ‘अवतरण’ कहा।
समाधि अवस्था तक पहुंचा हुआ व्यक्ति जन्म नहीं लेता। वह चाहे तो अवतरित हो सकता है। उसका चेहरा अपने-आप में देदीप्यमान हो जाता है, वह अपने-आप में उस आनन्द को प्राप्त कर लेता है, जिसे वेदों ने –

 

पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णात् पूर्णदमुच्यते
पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्ण मेवा वशिष्यते।

 

उस पूर्ण में यदि पूर्ण मिला दें, तब भी पूर्ण रहेगा और यदि निकाल दें, तब भी पूर्ण ही रहेगा, क्योंकि ब्रह्माण्ड पूर्ण है, यह पृथ्वी पूर्ण है, मनुष्य पूर्ण है… और वही मनुष्य यह यात्रा पूर्ण करता हुआ उस समाधि अवस्था तक पहुंच जाता है… बूंद अपने-आप में समुद्र बन जाती है – इस बूंद से समुद्र बन जाने की क्रिया को ‘ध्यान, धारणा और समाधि’ कहते हैं।
वास्तव में ही वे व्यक्ति – वह चाहे पांच साल का हो, वह चाहे साठ साल का हो, वह चाहे बालक हो या बालिका हो, वह चाहे यौवनवती हो, वह चाहे वृद्धावस्था को प्राप्त हो… अवस्था का कोई भेद नहीं है, यदि किसी व्यक्ति का सौभाग्य हो कि, उसको जीवन में सद्गुरु मिलें, कोई अद्वितीय व्यक्तित्व मिले, तो इस रास्ते पर गतिशील हो… मगर उसकी पहचान बहुत कठिन है… कठिन इसलिए, क्योंकि वह हमारे समाज का ही एक अंग बनकर रहता है, हमारे समाज की तरह ही वह हंसता है, रोता है, खिलखिलाता है… और उसके बावजूद भी वह अपने-आप में अलग बना रहता है, अपने अन्दर साक्षीभाव रखता हुआ।
लोग उसको कामी कह सकते हैं, लोग उसको दुराचारी कह सकते हैं, उसको गालियां दे सकते हैं, उसको हल्का कह सकते हैं… बार-बार उनके मन में विभ्रम पैदा होता है… और इस भ्रम को ही माया कह सकते हैं। ऐसा व्यक्ति बार-बार अपने आस-पास के परिवेश पर माया का आवरण डालेगा, क्योंकि वह हजार लोगों की भीड़ को उस जगह नहीं पहुंचा सकता… संभव नहीं है उसके लिए, वह तो उन हजारों कंकड़ों से दो-चार हीरे ही छांटेगा… और उन दो-चार हीरों को छांटने के लिए बार-बार उसको माया का आवरण डालना ही पड़ेगा। ज्योंही माया का आवरण डाला त्योंही आस-पास के व्यक्ति, शिष्य, समुदाय सोचेंगे-यह व्यक्ति इतना महान हो ही नहीं सकता… संभव ही नहीं… यह तो सामान्य आदमी है… यह भी बीमार पड़ता है… यह भी उदास होता है… यह भी चिन्तित होता है, फिर इसमें महापुरुष जैसे कौन-कौन से चिह्न हैं? इसका उत्तर मैं इस लेख में पहले भी दे चुका हूं –
– जिसके पास बैठने से ही एक आनन्द, एक सुख की अनुभूति होती है।
– जिसके पास बैठने से एक तृप्ति सी अनुभव होती है।
– जिसके पास बैठने से एक पूर्णता अनुभव होती है।
– जिसके चले जाने से एक खालीपन का अहसास होता है, जैसे सब कुछ तो वही है, लेकिन सब कुछ खत्म हो गया, यह घर वही है, आश्रम वही है, क्रिया वही है, भोजन भी वही है, सब वही है… मगर वह आनन्द की अनुभूति नहीं है। शरीर तो वैसे का वैसा है मगर उसमें स्पन्दन नहीं है।
उस स्पन्दन को ‘गुरु’ कहते हैं… उस स्पन्दन को ‘पूर्णत्व’ कहते हैं… और ऐसे पूर्णत्व प्राप्त व्यक्तित्व को आप पहचान सकें… और आपका सौभाग्य हो कि, आप उस के पास पहुंच सकें… आपका अहोभाग्य हो कि, वह आपको अपना ले, और यह आपके जीवन की सर्वोच्च निधि है, यदि वह आपको-अपने पास खींच ले।
यह हजारों-हजारों जन्मों के पुण्य की प्रतीति है कि, वह आप की उंगली पकड़ कर उस रास्ते पर गतिशील करे – जो रास्ता मनुष्यता से समाधि अवस्था तक का है, जो रास्ता बूंद से समुद्र बनने की प्रक्रिया है, जो रास्ता जमीन से गौरी-शंकर पर्वत के शिखर तक पहुंचने की क्रिया है।
और जब आप गौरी-शंकर के शिखर पर पहुंच कर खड़े हो ेसकेंगे, वह आपके जीवन का श्रेष्ठतम क्षण होगा, तब पूरे विश्‍व की आंखें आप पर टिकी होंगी।
आप सभी मेरे साथ उस गौरी-शंकर शिखर तक पहुंचें, संसार की आंखें आपकी ओर टिकी हों, आपके मां-बाप धन्य हों, पिछली और आने वाली पीढ़ियां गौरव के साथ आपको अपना कह सकें… और मेरे हृदय में आपकी अवस्थिति बन सके… मेरे हृदय में आप स्थापित हो सकें।

 

मैं ऐसा ही आपको आशीर्वाद देता हूं।
सदगुरुदेव परमहंस स्वामी निखिलेश्वरानंद जी
Dedication – The foundation for Dhyaan – Dhaarana

 

“What is the relationship between “Body and Dhaarana”, How Shree Krishna bestowed Totality to Arjun, What is the depth of Dhyaan, and the basic foundation of all this is complete surrender to Guru. When the slightest difference between Guru and disciple gets quashed, and disciple’s heart beats in complete resonance with Gurudev, then that disciple achieves Completeness and Totality through the highest state of Dhyaan by becoming an alert observer.

 

Read each word of the this scholarly article and merge with Gurudev by scaling the depths of Dhyaan –

 

Dhyaan and human body are two different entities, you cannot achieve Dhyaan through this body. A body can only recognize physical waves, and transmit own vibrations to others, to spell out its inner thoughts or emotions

viz anger, love, hate, happiness or sadness. These minor feelings or sensations are expressed by body through these physical waves.

 

The body is a very small object, with a lifespan of 60 years, 50 years or 100 years. One cannot achieve Dhyaan through the body, it is not linked at all to the body…A medium is vital to sustain life, and such a container is called as a body. A God requires a throne to station Himself, such a seat is known as a body. The throne is not the God in itself…., it exists only so that the God can seat on it, and manifest Himself.
Body is a similar container or throne – bearing and sustaining the life. Body is the basic foundation – holding the distinctive being, body is the medium –on which the fragment of God , Brahma or whatever it is, in whatever form it is, exists.

 

-It exists there, because it is necessary to assume a shape to comprehend other shapes, only a form can teach other forms. A animal can explain to other animals. A monkey can teach other monkeys…. A monkey cannot teach a cow. Similarly only a human can communicate with other humans.
– And Brahma has to assume a human form, so that He can easily impart knowledge to similar human beings. So Ram had to take a human form, so Higher level SadGurudev has to take a birth in human form … and live in similar conditions and situations as other humans .. so that they comprehend Him, recognize Him as one of them… interact and talk to Him…listen to and understand His teachings…
Only one among millions imbibes His teachings and progresses forward on the path. Only one among millions awakens self, and moves forward on the taught path. Only one among millions has the activated subconscious to comprehend Him, Only one among millions stimulates his emotions, leading him to realize SadGurudev, accompany Him … starts to advance with Him … his mind distinguishes, his eyes recognizes that – ‘This Personality is not plain ordinary’,

 

-He has assumed the body of an ordinary mortal, his daily chores are similar to other individuals, he lives like a normal average person, he also experiences various feelings like pleasure-sorrow, gain-loss, he also becomes sad, he also cries, he also gets anxious, but even then he is far away from it all.
– And, therefore He is distinctive in this world, you cannot identify Him with mortal physical eyes, you will have to open the eyes of your mind, you will have to get into Dhyaan to understand Him – and when anyone meditates into deep Dhyaan, he automatically witnesses His Magnificence.

 

Arjun was treating Krishna like an ordinary mortal, someone who sobs, grieves, supports, loves , similar to others around him. However, when Krishna took him to Seventh stage of Dhyaan, let him witness the spectacle, then Arjun realized immediately – This is not an ordinary mortal, this is a Distinctive Persona…

 

If SadGuru wishes, He can elevate anyone to the Seventh stage, like Krishna did to confused Arjun; elevated the attached Arjun to the Dhyaan state in a split fraction of second,.. And upon attaining this state, thousands of his eyes got awakened, and he could view Krishna, ordinary looking Krishna, in the actual divine form.

 

In a similar fashion, SadGuru can, This eminent Persona can, if He wishes, transport any disciple, any person, to the Dhyaan state, wherein one may realize clarity, realize His Divinity, and His Greatness.

 

Q. Are there separate methods to attain Dhyaan for men and women?
There is a physical difference between man and woman in the body form, when a person progresses ahead of the bodily form, into the deep soul state, then there is no differentiation between man and woman. This is a mere difference of human body, at a basic outer level there is no difference at soul state, or at life state. When there is no difference, then there is no difference in Dhyaan procedures. One, who is a woman is a man; and one, who is a man, is a woman.
You view the man and woman as different forms… you differentiate due to different body structures and shapes. However, there is absolutely no difference at the spiritual or metaphysical level. Both are at same state, with similar set of feelings and emotions.
There have been illustrious women in the past – Katyayini, Meitreyi, Cheitanya, Veicharya, Gautami – all of these were distinguished personalities, they realized Brahma, and attained a similar state of humanity, and a similar state of Dhyaan, like a Rishi. So, it is not even possible to perceive man and woman as different from the spiritual perspective. We can discern only at the physical level, body level – This is the external base, the outer shell. There is no differentiation at the spiritual level.
-Thus, the procedure of attaining Dhyaan for a man, is absolutely same as for a woman. The SadGuru, Lord Krishna can elevate Arjun to Seventh Stage in a single step, similarly, He can elevate a woman. So, it is not possible to have different Dhyaan procedures for man and woman.

 

Q. We have heard that one should dive deeper into Dhyaan, what is this depth of Dhyaan, How to attain this depth?
-I have answered this above, attaining depth does not mean jumping into a well. The meaning of attaining depth is also not to move swiftly from one place to another place, from one step to another step. The gist of my explanation is – We progress from one stage to next stage, the first stage is “Body form”, progress to second stage, then onto third stage, fourth stage, and so on.. And as elucidated above – Advancing stepwise into those Seven phases, the state which we reach, that state is Dhyaan state, the Totality state. Using this process, by gradual practice, realizing those seven states, we can attain the level which has been mentioned in Shashtras, in Vedas as –

 

-the Brahmanand State
-Totality and Completeness

 

-This is what has been defined as the actual “Joy”. There is a unique joy, a divine beauty in diving these depths. As we advance externally, we get wrinkles due to time and age, the worry lines on our forehead deepen, and our face keeps becoming uglier. … but as we advance internally, our aura develops, our face radiates, the beauty of our face and our body enhances. The rays emanating from the inside through this body, make the surrounding atmosphere pure and clean.
If there are forty or fifty disciples in an Ashram, and even if all of them have are excellent personalities, but if they do not have a SadGuru, all the fifty will feel soulless. They sense as if they are dead … working but without any enthusiasm or joy, unable to talk convincingly, because the vital link, the link called Guru, the link known as SadGurudev is absent.
There is a simple way to check this – whether a person is ordinary or divine? If an ordinary Guru or an ordinary sage moves out of Ashram, then the disciples rejoice – in his absence we can do as we wish, enjoy eating, dancing or any other pleasures easily as per our choice .. we will do whatever we wish to do – good or bad.
However, when a “SadGuru” departs, then everyone feel sorrow, feel grief. Tears come out of eyes in mourning, one feels that one has a body but the inner soul is gone – This is the difference between the both (ordinary Guru and SadGuru)
Only Krishna was visible in the entire Mahabharata period, a single personality, without any limitation, but full of life and vitality. Similarly, if in a ashram, a deific personality … an ordinary looking person (SadGuru) walks out, goes away, five Kilometer or five hundred Kilometers … moves out , then everyone seems to be a state of shock, everything seems to have finished, disciples become deathlike, all energy and vitality vanishes.
We can perceive and understand from our own external eyes whether a persona is ordinary or divine, and whether though this persona, we can attain the depths of Dhyaan after conquering various negativities of our mind.

 

Q. Please, the Dhyaan stages which you have explained, is it possible to attain these in a short time period?
-I described a while ago, time is not a factor in this process, this is like a jump.
-How courageous you are, how deep can you dive. If you are afraid, then you will step forward slowly; however if you are bold, you will dive immediately. If you are coward, then you will attach yourself to Guru very sluggishly. If you are brave-heart, then you will completely dedicate yourself immediately to Gurudev. How much you open yourself, it is your choice, how much you offer yourself. It is dependent on you, that the more you offer, the higher you will progress, the more you dedicate, the deeper you will dive.
It is not a school-class that you will complete first class, then second and third class, and moving on complete the sixteenth class. This is a divine process, if you attain blessings of SadGurudev, if He recognizes that – this person has started to comprehend me … if He believes that , this person has started to enter my life…. If SadGurudev starts believing that this person has started to merge into me… When SadGuru senses that a thorn pricked His legs, and this person felt pain … then the person has moved ahead from body to soul relationship.
-And when the soul start to merge, then one starts to realize oneself, like mixing milk into milk makes them into one, like a river vanishes after merging into the sea … and after the merger, we cannot separate the water of river from the water of the sea. We cannot differentiate whether the water is the vessel is of river or of sea, because both have become one.
The disciple also is in similar state, when he thinks like a river, when he decides that like a river, I have to merge myself, without stopping, whatever happens – doesn’t matter even if I become salty sea water … if my existence disappears, or let it vanish … and as the river Ganga merged into the sea,, she stopped being Mother Ganga, and became Samundra Devta. Her sweet water lost its sweetness and turned into the salty water… She is not worried, because after merger she became an ocean, she is no longer a small river, she has merge into the ParBrahma.
-And the disciple also is in a similar state, when he starts eradicating himself, to merge completely into the Divine soul of SadGurudev … and when he merges, then SadGurudev swiftly transports him in one go into the divine state, the Dhyaan state , the state of Completeness, the state of Awakening.
-And the more he starts trusting Guru, the further he progresses on this path.
-And the more he merges his being into Him, the stronger Guru pushes him – it is the choice of the disciple whether he wishes to submerge himself completely or incompletely.
If the dedication is incomplete, then the Guru watches him unpassionately – his faults, the shortcomings of his mind, because He realizes that he has tried only ten percent to amalgamate – then he dives only ten percent into Dhyaan … he cannot dive more … it is not possible.
But the moment Guru decides that He has to uplift this person to the Param State, then even if the mind of the disciple is crammed full of deficiencies and shortcomings, even if he is alive at body level, at any place – Guru hoists him and elevates him into the deep depth of Dhyaan ocean … the Kshir Sagar … the abode of Poorn Brahma … where Brahma is lying on Sheshnaga … where Totality is pressing His feet — at that state –if SadGuru wishes, He can elevate an ordinary, immoral sinner in a fraction.
-There are two processes, both from the disciple side and also from the Guru’s side. How much a disciple offers himself, how much the Guru elevates a disciple – both situations are intertwined with each other, this is a mutual internal agreement between both, As the disciple dedicates more, the Guru also offers support and push … and so … one can reach the deep state of Dhyaan in a second … or in five thousand years. This depends on the commitment of, the mindset of , and the actual dedication of the disciple.
Dedication is the measure for Guru to decide whether I have to elevate this disciple to the Deep depth of Dhyaan, the Brahma Tatva, the Completeness, the “Poornmadah Poornmidam”, the Paramhansa state, and the state of Divinity.
-When a person becomes God, then this is the peak phase of life
-When a Nar becomes Narayan, then this is the peak phase of life.
-When an ordinary mortal attains Divinity and Totality, then the entire world looks up to him, he acquires capability to provide welfare to thousands and millions, even if he looks like an ordinary person, he may marry, keep smiling in profit-loss, pleasure-pain situations, but he is always alert towards his Totality and Completeness.
-The main purpose is to reach that stage… and it is very tough to reach that stage. Only one word holds the key to reach that level, and that word is – Dedication
The Guru tests and assesses hundreds of times about the dedication, or puts him to test even thousands of times. Gold is put though molten heat, battered, crushed, smashed, and stretched into wires hundreds of time during the process of creating a crown. … But gold never flinches, never wavers, because it has dedicated itself completely, into the hands of the skilled artisan, and the artisan goldsmith turns it into such a magnificent crown, that it becomes more appropriate for Gods rather than humans. Hence Kabir has mentioned –
Guru Kumhaar Shishya Kumbh Hai Gadi Gadi Kade Khot |
Bhitar Bhitar Sahaj Ke Bahar Bahar Chot ||
A potter keeps on pounding the pot from outside, while supporting it carefully in the inside, similarly the Guru keeps on noticing – When I order something, how does he response? If I hit him, then how does he act?
If I examine him, then how weak is he?
…And the disciple perseveres and continuously sustains the process of committing himself to the Guru. The disciple, who wins this struggle, attains success, the Guru picks him up with both hands and sends him directly to the Dhyaan state. The more a disciple gets battered, the deeper he proves his dedication, the higher step of Dhyaan he will achieve with grace of Gurudev.

 

Q. You have mentioned “Focused” and “Observer” words. What is the meaning to these words?
“Focused” means – Staying Alert, Being attentive at all times, always be aware, always remember that I have to achieve the state which my 25 ancestral generations could not accomplish, I do not wish to die after taking birth, I want to live distinctively, I wish to make a difference, do something unique and distinct, which has not occurred in my 25 ancestral generations. When he gets this feeling, and the feeling unceasingly stays in his mind, then he is in the ”Focused” state. He always remembers – What is my mission? He knows – What do I need to accomplish?
And to retain this focus, he has to eradicate the attachment with his mother-father, brother-sister and family-relatives, because he can be committed to either his Gurudev or to his family – as these are two separate loci of the arrow. There is only one single arrow, but the frontal portion is pointed sharp… and the rear portion is softer. If the disciple stays at the hind, then he will always be behind, like his forefathers, he will also vanish, and will similarly travel to his grave.
The one at the sharp pointed front, he will feel pain, will undergo agony, and will also stay focused … and this Concentration is the best quality of life, which one obtains after multiple struggles and toils. The one with unwavering attention will always be alert… ‘I have to stay steadfast committed, whatever instruction I receive’. I do not need to ponder over what instruction I have been given? Why have I been given this command? That is His work. If I were to comprehend this, then won’t I myself become the Guru?
I am a disciple, a little lump of loam, Only He knows, what He wishes to make of me. … I have offered myself unto His hands…He will turn me into a…a pot …a jug … a lamp … will surely turn me into something. If He creates a lamp of me, then also I will be able to remove darkness. If He fashions me into a jug, then also I will be able to satiate thirst of thousands. The lump does need to concern itself, it just needs to stay focused that I should always stay in potter’s hand.
“Observer” means – noticing everything dispassionately, like – a person sitting in cinema-hall watches the movie, his face or his mind does not register any emotion of happiness-sadness, because he knows, I have entered this cinema-hall with an entry ticket and I have to exit after 3 hours – This is the “Observance”.
Similarly in life, one should be a detached watcher towards mother, sibling, father, spouse or relatives. One who is not involved or mixed, who views, obey whatever the mother commands, listen to wife and do her bidding, you have to listen to all and follow their directions, but have stay focused and alert – this is not my aim, they speak, I listen, they order, I execute, that’s all.
-My primary mission is not to end my life among them.
-I do not wish to finally die with this human body like others.
He has to dive from the body into the depth of soul… where one attains Brahmatava… where one achieves Ishwartava… where one obtains Narayantava… and after accomplishing that stage, the entire world will watch, and coming generations will applaud, not just him, but also his parents, his family, his clan.
When we think of Krishna, we also automatically think of Radha, when we remember Krishna, we also get reminiscence of Yashoda and Nand, because they are intertwined with Him.
The person who is completely focused, he who dedicates himself to holy feet of Gurudev and attain Dhyaan state onwards to Samadhi, his parents also become similarly entitled to respect, become glorious, become magnificent, achieve esteem … and he becomes a blessed personality of his generation, because in his generation he has attained the state, the Completeness of Dhyaan, accomplished “Poornmidah…” , and yet he stays as a dispassionate observer in this world, his body is continuously lost in thoughts about Gurudev with unwavering dedication, because the base foundation is the body, wherein the Gods have to be seated, if there is no throne, then how will the Gods be consecrated. When the throne itself is thousands of miles away, then how will one install Gods on it.
Hence, his thoughts are with his parents and siblings, though with an detached observance touch – mother undergoes her own cycle of pleasure-pain, the father undergoes his own cycle of pleasure-pain, everyone lives the fruits of his or her own karmas, and he watches dispassionately … but he offers his throne like body to his Gurudev … as Gurudev is going to consecrate the holy idol, the deity called God, the deity known as Divinity, the deity termed as “Brahma”.

 

Q. What is Brahmacharya or celibacy. Can a married person perform Dhyaan? What is a Sage or Sadhu? Is it necessary to be a Sage or Celibate to practice Dhyaan?
-People have misunderstood Brahmacharya, and in the last hundred years, this word has been completely mauled like none other. We have termed an unmarried person as a Celibate or Brahmacharya – one who is a bachelor has been called as a celibate. Whereas, actually, Brahmacharya or Celibacy means – one who practices as per Brahma, one who leads life in accordance with Brahma. When a person realizes Brahma, only then can he attain the Brahmacharya state.
There is no direct relationship between Brahmachari and Dhyaan, it is not mandatory for one to become Brahmacharya to attain Dhyaan, because the pinnacle peak of Dhyaan is Brahmacharya … When one reaches there, only then he can be called Brahmacharya. How can anyone be called Brahmacharya at the starting stage itself? Initially, he will be called Sharirachari or a person with body form; Brahmachari or Brahmacharya is a very higher state; because one who comprehends Brahma, and leads life in accordance with Brahma, is the Brahmachari.
-And the meaning of Sadhuta or Sagehood… Anyone wearing ochre robes is not a Sage or Sadhu, one who can concentrate, live detachedly without any emotions or wishes, whose mind, whose thoughts are never sinful or lustful, who doesn’t get influenced by sight of a woman, who is completely aloof from the vile wishes and temptations, one who has become completely detached observer, who has completely controlled himself, whose mind is fully in his control – is a Sadhu.
It is not necessary that only a Sadhu can practice Dhyaan… and if you delve deeper, then we realize that … a Sadhu cannot practice Dhyaan, because if a Sadhu starts Dhyaan, then his eyes will get vile thoughts, because he has tried to forcefully control his vile temptations, the lustful temptations… and something forcefully controlled will always return back. The moment he closes his eyes, he will visualize the image of a woman, how can he dive deep into the Dhyaan process.
This does not denote that a Sage or Ascetic cannot enter Dhyaan. If he has really detached himself, purified himself, attained detached observance, then he is real ascetic and if he is a true ascetic then he can enter the depths of Dhyaan. Thus, to attain Dhyaan… you do not need to be celibate .. do not need to marry … do not need a spouse … do not need to go to Himalayas … in whatever state you are … but if you have a deep desire, wish, commitment, yearning – for dedication.
We require three items. First, “Detached Observer’ – where you stay with SadGurudev while watching your family with aloofness.
Second, “Dedication” – Offer yourself through your mind, thoughts, feelings and emotions while maintaining detached observance, and after dedication you do not have any capability to think, to decide, to contemplate or reflect.
What is Guru doing? You do not need to be anxious about it, what Guru is teaching, you need to see and understand.
And third “Strong Willpower” – In this life, I will progress myself from this human body to that exalted state, which is state of attaining Wholeness and Totality, which is the Dhyaan platform in itself.

 

Q. Does Chanting Mantras during Dhyaan provides quicker Success and Siddhi?
-When you have reached Dhyaan state, then you cannot chant Mantras, your mind becomes thoughtless. On one side you close your eyes to enter thoughtless state, and on other side, you start chanting Lakshmi mantra with a rosary… your thoughts, your feelings are with Lakshmi, in rosary. Then how did you concentrate on Dhyaan?
Dhyaan indicates “Na” or “Nothing”, where there is no feeling, neither of body, nor of mind and nor of thoughts. … There is absolutely nothing, then where did rosary come from? Where did Lakshmi manifest from? Where did Mantra-chanting come in?
-Where there is Dhyaan, there is no need of chanting mantras.
-Where there is Dhyaan, there is no need for rites or rituals or processes.
-Since we have already abandoned these items to our body, which we have left, and progressed inwards, to reach the exalted state, where wealth and riches seem trivial things, because Goddess Lakshmi is Herself manifested to him in Her full form. Riddhi-Siddhi, Mahakali, Chhinmasta, Bhuvaneshwari, wealth-luxury, fame-esteem are all waiting at his feet, because he has arrived at a level, which is called “Totality”, from material perspective, from spiritual perspective, and from royal perspective as well.
“Janak” was a whole king in himself, he had hundreds of queens, and yet he was a complete Brahmachari. “Krishna” was husband of Sixteen thousand queens and yet was a complete Brahmachari, because he practiced the process of comprehending “Brahma”. Therefore for a Brahmachari, it does not matter having a wife, having a husband or having a lover. So rosary and mantra-chanting have no space in Dhyaan and there is no Dhyaan at a place which has mantra-chanting. Dhyaan and physical body functions are two separate entities.

 

Q. We keep getting sinful and lustful thoughts in our mind, what should we do to eradicate them?
You are getting vile and lustful thoughts in your mind, because you have forgotten the capability to comprehend yourself. You do not have the skill to distinguish between diamond and an ordinary stone. The bright sparkling diamond is mined only in the coal mines. The diamond originates at the same place where coal gets formed, in the same pit, in the same mine, but one must have the capability to recognize them. This depends on the fact that whether you prefer to choose ordinary stones, or coal or diamond – this is an expression of your wishes, and if you have such thoughts in your mind, then you do not need to forcefully disregard them, ignoring them will only make them to re-emerge with more powerful force. If you bounce a ball to ground strongly, it will get more flattened, and the more it gets flattened, it will bounce and jump with a similar high energy. … You do not need to push out these thoughts.
If you have lustful thoughts, you can transfer them. If you are longing for woman, then you yearn towards river, you crave yourself towards a flower, learn to talk with twinkling stars in the sky, start chatting with the spring air, sitting among the foliage of trees … the lustful thoughts will automatically change over, because the lust, the desire, the feelings which you were perceiving in a female body, you will start noticing in the mother nature … you will notice that the river is similarly beautiful, you will start loving the rose flower, you will develop attachment with the air of spring, you will experience a strange joy in the twinkling stars in the sky.
So you should not shove down these lustful and vile thoughts, you just need to convert them …. And to convert, you may take support of music; sketching and drawing may assist you, singing may help you, nature may aid you… and more than anything else, you yourself can support yourself. When you start loving yourself, you do not need others to love. When you crave for yourself, you will not need to yearn towards any other. So you do not need to push down these thoughts, you need to transfer them, convert them. This is the outer differential, the conversion is also outer differential, getting these thoughts is also the outer differential and you can convert these external differentials with your own efforts.

 

Q. Is there any Mantra-chanting or procedure, which can help us in attaining Dhyaan quickly?
-There is no such Mantra-chanting or Sadhana-procedure which can help you in attaining Dhyaan quickly. You cannot realize Dhyaan from the outer-shell case, and mantra-chanting is like the outer-shell case, are filled with such thoughts, are packed with such wishes … like – I wish to become a millionaire, because I practice Lakshmi Sadhana and I am chanting Lakshmi mantra …. This is a belief from the external-shell. I desire to become strong, I wish to become powerful, I aspire to defeat my enemies, so I am performing Baglamukhi mantra chanting … this is nothing but outer-shell.
And the external-shell has the unwavering desire to control the physical aspects, which may be greed, can be lust, may be anger or can be immorality …. And where these are present, there cannot be any Dhyaan there. You do not need these objects to practice Dhyaan, Dhyaan is not possible through mantra-chanting, you will have to lose yourself to attain Dhyaan. The one who lost himself, he took the first step towards Dhyaan.
-The First stage of Dhyaan is to dedicate your both hands into Gurudev’s hands while remaining completely focused and alert
-The process of offering yourself completely at His feet is the Second stage of Dhyaan
-The Third stage of Dhyaan is the process of losing yourself completely and immersing yourself wholly into Him.
-Comprehending everything into His pleasure and pain is the Fourth stage of Dhyaan.
-And there is no mantra to chant for this, there is no rosary to use for this, there is no need of any rite or ritual for this.
So you cannot achieve Dhyaan though chanting of mantras, these half-ignorant Sadhus and ill-informed Pundits can give any such mantra – To attain Dhyaan, you need to chant a mantra or chant Ram-Ram, this is a myth, this is a fraud, this is a deception, this is a way to mislead others, because Dhyaan cannot exist in presence of thoughts; where one has wishes, Dhyaan cannot exist there.
One who leaves everything, he can achieve everything. You cannot obtain the entire food in small bits and parts; because we can accumulate stones and pebbles, but the object which we should aspire for, we lose sight of it. The moment we desire a spouse, the moment we desire children, we keep collecting stones and pebbles in these forms. One wife, two wives, ten wives, twenty wives, lovers, ten lovers, five lakh rupees, ten lakh rupees, all of these are the items which belong to here, which will stay here, will not accompany you, will not be able to even get out of the door, with your coffin. Your bier will go alone.
The wealth, which is invaluable, which is termed as Joy, you cannot obtain it with these things, you may experience everlasting Joy only after detaching yourself from these objects. One who has achieved the exalted state, all of these objects are mere stone-pebbles for him. He will kick out the diamonds, because hundreds of kings and emperors pay tribute to him… and he does not need those hundreds of kings-emperors, because Lakshmi sits at his feet to press his legs….hundreds of siddhis wait for him with bated breath…. Because he has become Narayan from Nar.
And the instant you become Narayan from Nar, at the same moment, Lakshmi will find abode at your feet. You can become a peaceful ocean, then you can withstand the poison… the Sheshnag’s venom, you can lie down peacefully on this poison, the venom will not be able to affect you, the other poison of society will also not be able to cause any harm to you or your body.
Therefore, do not even try to achieve Dhyaan by following these methods, this will be a certain wastage of your time.

 

Q. What is Dhaarana?
The state beyond Dhyaan, is called “Dhaarana”. Dhaarana means – I have immersed myself totally into myself, I have submerged myself.
The Guru takes you till the Dhyaan state. He leaves you after the Dhyaan state. Guru puts you on a platform, where the process of becoming a Guru gets initiated. As a disciple, you will progress holding Guru’s finger tightly, however Guru takes a leave after the last stage of Dhyaan, because He knows that – I am now guiding him to become a Guru, he is on the path to become a Sun. He was a simple lamp till now, but now he has acquired the capability, he will not forget or lose whatever I have taught, my instructions are now firmly etched on his heart.
After reaching this stage of Dhyaan, he will not be able to fall back. Even if he lives in the society, he will live as a detached observer, as an isolated show-piece, because he is part of this society, he is a member of the family. He will laugh, cry, smile, cheat, sing, dance, grieve , with utter aloofness, all as a part of the family. He will put on this outer display, because he belongs to the society, he belongs to a family.
But, in his inner soul, he has attained depths of Dhyaan, has achieved the Dhaarana state. He is there will full Totality and Completeness, and he cannot move away from there. Now he will not be influenced by the worldly affairs, he cannot create distance with Guru, it is not possible to fall down now.
When he becomes indifferent, … then the Guru makes him independent, lets go of his finger, frees his hand. He stands firmly on his legs at the Dhaarana state, sure of himself, and now he progresses further… and as he makes further advances, the stability starts, the Dhaarana Shakti gets activated in his heart, he does not waiver, he doesn’t lose control and lust after seeing a young girl, he doesn’t become greedy on seeing pots of money.
After reaching this level, the next stage is – Dhaarana Shakti. After reaching this, he doesn’t tumble back. One who has tasted this joy, he will realize – This society is very dirty, full of filth and murk, bursting with lies, cheating and plotting … he attains the stability, the process of attaining this stability is called “Dhaarana”.
Dhaarana Shakti is the next stage after Dhyaan, where the Dhyaan will deepen by itself, one does not need Guru now, because now one is on the path to become a SadGurudev. He gets completely transferred in himself… the conversion process starts. He crosses the halfway mark of the journey from Nar to Narayan, and by steady transformation, onwards from Dhaarana Shakti, he will progress to “Paramhans” state.
“Paramhans” – clean and pure like a Hans or swan, which does not have any taint, is absolutely free from lies, cheating, deceit, or attachment, and has a complete absence of bonds of any kind … Krishna is Yogeshwar even when surrounded by Gopis, he is a complete Brahmachari after loving Radha … He is a firm celibate even as a husband of thousands of queens – and is a JagadGuru even while fighting the Mahabharata war – ‘Krishna Vande JagadGurum’, it is possible to achieve this phase only with Dhaarana Shakti.
One does not need to try anything to achieve this Dhaarana Shakti, but one requires guidance and assistance of SadGurudev to attain Dhyaan state, and SadGurudev is not present in the segment from Dhyaan to Dhaarana Shakti, because one as to make this journey alone, because the way onwards is the Rajpath, a golden highway, instead of an off-beat-trail, an unknown track, or an unclear way, it is a straight highway, where one has to continuously advance…. And he will automatically reach the stage – which is known as Paramhans State.

 

Q. How can one continuously remain alert, at each moment, for all 24 hours?
You don’t need to do any special exertions to stay alert and attentive for all 24 hours, you have to remain aloof, the Guru within you, will stay ever-alert. When you have imbibed Guru within you, then He is totally vigilant, because that Guru is not a body, Guru is a state even higher than Paramhans state – this is “Narayantatva” state, this is “Brahmatatva” state, this is “Poornatva” state … when He is inside, then He will beat with each beat of your heart, the heart cannot beat without the “Guru” vibration, the heart-beat will occur only in close presence of Guru … because Guru merges and becomes one with the heart-beat.
The Guru has to become alert with each heart-beat – to ascertain that any lie, cheating, intrigue or any other contaminated emotion does not mix with the heart-beat …. The Guru has to stay ever-attentive, you have to remain aloof, because alertness is not in your eyes or body, alertness is in your heart-beat … and heart does not have to do anything special to beat – it is an automatic process, it beats even when we sleep, it will beat even when we are awake, it will beat even when we are driving a car …. And it will continue to beat … and Guru is Awakened, so He will keep you awakened on His own. He will guide you at every moment to the golden path. You only need to merge your each heart-beat completely and wholly with Guru. This alertness is a major achievement of the life.

 

Q. Is it possible to achieve Dhyaan and Dhaarana through religion?
-Religion is not ours, we have not accepted the religion, it has been thrust on us. My parents were Hindus, so I became a Hindu, and if I had taken a birth in a Muslim home, then I would have automatically become a Muslim – This means that we have not acknowledged the religion consciously. I had to take the religion of the parents and the family where I was born, so religion is not an inner divinity.
Religion is an outer process … and any physical, external process, cannot lead us to Dhyaan, it is a state of a body, one body can be a Hindu one … or a Muslim one. When this body dies, then you are no longer a Hindu or a Muslim, because you have a religion because you have a body … because you can identify religion only with your body.
I am a Hindu, so I should bow before a temple. I am a Muslim, so I should kneel before a mosque. This “am” word is an indicator of the ego, this arrogance is in your physical body, your body is your religion – “Shariram Dhaarayati Sa Dharmah”.
One who thinks about body, how can he enter Dhyaan, Dhyaan is very deep, it is located at the seventh stage. Thus one cannot attain Dhyaan state by practicing religion. So, to achieve Dhyaan, there is –
– No Hindu, No Muslim, No Sikh or No Christian
– No Abstract, No Form, No presence or Absence of Aspects
– No God or No Demon
– No Brother, No Sister, No Family or No Relatives
Absolutely nothing is required, so you cannot attain Dhyaan through your body, you cannot reach the Dhaarana state through your physical body, the physical body has its limitations… and you cannot attain peace and Dhyaan using the external body.

 

Q. Many Sages and Gurus elucidate different techniques to attain Dhyaan and Dhaarana, and your method is completely different, then are all those techniques wrong?
I do not believe that any technique is wrong. The instructor is wrong, if he has half-baked knowledge and he confuses you through semantics of different words, then he is incorrect… the process is not wrong. Tibetans have a different procedure, they do not consider these mental states at all, those Lamas use a completely separate process – and one can attain Dhyaan state though their practices.
Therefore I do not state – that any method is wrong. All the methods are correct, but if the person does not have knowledge – if that Sage, Yogi or Guru does not have full knowledge, then whatever he imparts, is incomplete, is incorrect … and today mostly we obtain only half-baked knowledge, because they did not choose the right path and they did not advance on the right path … they assumed that only the ochre robes, rites, braids, head-marks, long hairs, changing outer appearance, changing external garments… and one cannot become a learned person by changing physical clothes or forms.
He cannot transform into a learned Sage-Ascetic by changing the outer forms, and when he is not a learned person, then his thoughts are fake in themselves, because he did not walk down on that path…. When he himself did not travel on this path, then he cannot guide – “What is Dhyaan?”
He can only confuse using the different semantics of words, and anyone can swindle using word play, can cheat you, anyone can trick you, by playing with complex words…. The words themselves are not Dhyaan.
I do not term any process as wrong. So those people, who might by Sages, or Ascetics, or Yogis, living in either Himalayas, or Delhi. The important question is not where they live? The pertinent point is , whether they have full knowledge?
If they have full knowledge, and they know about any other method, they are absolutely correct. There are Twelve Hundred different procedures to attain Dhyaan, not one or two, there are twelve hundred processes … and all of these twelve hundred processes are completely authentic and reliable.
You need to check – Whether that person only have a stock of words, or knows the correct process. You have to verify whether he has actually walked on the path, or is he just confusing. So I do not have anything against any sage or ascetic, I have issue only with their ego, their ignorance, their misguidance … I am against the confusion and muddle which they create.

 

Q. What is Samadhi?
When an individual advances to Dhaarana Shakti after Dhyaan, then the Guru becomes contented – That now he will surely progress on the path, because any material desire, and emotions will not infest him, cannot pollute him, cannot waver him … and He makes him independent … but he keeps watching, with close attention, his actions and evolution on the route, because it is important to make continuous progress, if he doesn’t advance forwards, then he will fall down, there surely will be some movement, either towards forward or backward direction.
If he doesn’t take the forward course, then he may slip down to the mortal ordinary state, this is the fear.. the Guru is also afraid, so He remains stationed at the phase where Dhyaan process completes, and shoves him to Dhaarana… if the disciple slips back, then the Guru thrusts him to Dhaarana. Such incidents are seldom, but they are still probable.
Therefore the Guru’s work is very tough, He has to be fully attentive at all times…. And He always fears, about the slipping down of the disciple, so the Guru is ever alert and watching, at the vertex where there is a possibility of sliding down the steep slope.
But it occurs very rarely, one who has tasted Joy, experienced it, will he slide down to lusts and desires …? He will advance, and will continue making steady progression, and when the Dhaarana Shakti matures, then the Guru becomes confident – he is on the Golden Rajpath, because the next stage, is the Samadhi stage of Completeness. Samadhi means – Completely losing self. There are five meanings of Samadhi –
Samadhi means – Taking oneself to Completeness and Totality
Samadhi means – Merging oneself with the entire universe
Samadhi means – physically moving across the entire universe
Samadhi means – watching the entire universe with your eyes
Samadhi means – ability to influence any activity in the universe, to modify it as per your desire
And when this occurs, then death cannot touch him, because he moves up a level higher than death, moves above the Time, time cannot impact him, then Two Hundred years, Five Hundred years or a Thousand years do not matter. The Ten Thousand year period is same to him as a second or a minute, then he becomes Immortal, becomes Abstract, becomes Confident.
It is a different story, if he wishes to display the emotions of taking birth … taking birth and becoming manifest are two separate things. Krishna did not take birth, He manifested Himself, Devaki felt – that Krishna took birth from her womb… had sensed this. Vedvyas has stated that – Devaki didn’t sense Krishna in her womb for 9 months.
Suddenly she opened her eyes, and found a crying baby Krishna… and her maternal, nurturing emotions awakened… her mammary glands filled with milk … she clung Him to her bosom.. this is not a birth process … this is a manifestation process… she got lost in this for a moment… an event took place within a second, which was wonderful … and an admirable personality manifested within that extraordinary moment. The society called it “Birth”, but the Yogis called it “Manifestation”.
A person who has achieved Samadhi state does not take birth. He may manifest, whenever he desires. His face has a distinctive aura, he is always filled with Joy, which Vedas have stated thus –

 

Poornmadah Poornmidam Poornaat Poornadmuchayate |
Poornasye Poornmadaaye Poorn Mewa Vashishyate ||

 

If we mix Totality in that Totality, it will stay as Totality, and if we take it out, even then it will stay Totality, because Universe is completeness, this Earth is whole, the human being is whole. … and the same human being travels down this golden path to reach the Samadhi stage… the drop becomes an ocean in itself… this process of turning a drop of water into an ocean is called “Dhyaan, Dhaarana and Samadhi”.
The person, he may be of five years, or of sixty years; might be a boy or a girl; could be a young or old person; these states do not matter, if a person is fortunate enough to get a SadGuru in life, meet an exalted personality, then we can travel down this route… but it is very difficult to recognize such a persona.. difficult because, he lives similarly to others in the society, he laughs, cries and experiences emotions like any other … and in spite of this he stays aloof, like a detached observer.
People may abuse him, they may mistreat him, call him names, belittle him … they keep getting this misperception in their minds, and this misperception is called Maya or illusion. Such a person will repeatedly cast illusion on folks around him, because he cannot take a mob of thousands to that state, it is just not possible, he will pick up a couple of diamonds from those thousands… and he will have to cast illusions repeatedly to choose those handpicked few. As soon as he casts illusion, the people, disciples, society around him will feel that this person cannot be so magnificent… not possible… he is a normal, ordinary person… he also falls sick… he also grieves… he also worries, then what quality of a notable has he got? I have already answered these questions earlier in the article –
We sense a spring of Joy whenever we sit beside Him.
We feel contented on sitting beside Him.
We experience Totality on sitting beside Him
We sense an emptiness in His absence, like everything is same as before, but everything has vanished, the house is the same, the ashram is the same, the process is the same, the food is the same, everything is same… but that feeling of Joy is no longer there. The body is still there, but it is now devoid of vibrations.
This vibration is called as “Guru”… this pulsation is called “Totality”… and may you recognize such a Completeness persona… and your fortunes take you to Him… your luck makes Him take you, and this is the best gift of your life, if He pulls you towards Him.
This signifies the result of combined blessings and goodness of thousands of births that He, holds your finger and advances you on to the golden path – the route from Humanity to Samadhi, the transformation from a mere drop into an ocean, the passage from ground zero to the peak of Gouri-Shankar mountain.
And when you stand on the summit of the Gouri-Shankar mountain, this will be ideal moment of your life, then the entire world will be watching you with bated breath.
All of you accompany me to the peak of the Gouri-Shankar mountain, you enter the limelight of the entire world, your parents get blessed, the upcoming and past generations call you as one of them… and you create a place in my heart… you reside in my heart.

 

I bless you thus.
SadGurudev Paramhans Swami Nikhileshwaranandji
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